Akhand Gyan

Monthly Magazine

प्रथा का अर्थ- अनर्थ

... थोड़ी सी भी मिलावट नहीं चलेगी! रूस की परम्पराओं में एक अनोखी परम्परा है। इसके अंतर्गत एक अजीब खेल खेला जाता है। इस खेल में कुछ पुरुष एकत्र होकर एक समूह बनाते हैं। समूह के प्रत्येक व्यक्ति को तीन लोगों के लिए एक-एक बोतल वोदका ( रूसी शराब) बनानी होती है। इसके बाद शुरू होता है- पीने का दौर। इस प्रथा में हर कोई शराब पीने में डूब जाता है। व्यक्ति तब तक पीता है, जब तक कि वह अचेत होकर गिर नहीं जाता। इस खेल में व्यक्ति किसी भी प्रस्ताव को मना नहीं कर सकता। क्योंकि मना करने का मतलब है- अन्य प्रतियोगियों का अपमान! इस विचित्र सी परम्परा का एक नियम यह भी है कि शराब का एक गिलास पीकर रखने और दू…

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एक-के-बाद एक या एक-साथ!

'आज का दिन आपके लिए शुभ होगा। आपको इस कार्य में सफलता मिलेगी... राहु की दशा आपके जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसलिये यदि आप सफलता को पाना चाहते हैं, तो यह उपाय करें... यह जगह, यह नम्बर, यह रंग सफलता पाने के लिए शुभ रहेंगे...' अक्सरां जब ऐसे वाक्य हम अपने राशिफल में देखते हैं, तो खुश हो जाते हैं। खुश हों भी क्यों न? भला कौन सफल नहीं होना चाहता? किन्तु विडम्बना यह है कि सफलता के पैमाने राशिफल में लिखे वाक्य नहीं हुआ करते। सफल व्यक्ति केवल अपने भाग्य के भरोसे नहीं बैठा करते। सफलता को प्राप्त करना पड़ता है। पर कैसे? क्या आप जानना चाहते हैं कि सफलता प्राप्ति व उसे कायम रखने का कौन सा तरी…

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प्याज़-लहसुन खाएँ न खाएँ-आपका निर्णय है!

कढ़ाई में तेल डालें। प्याज़ और लहसुन को पतला-पतला काट लें। तेल में जीरा डालें और फिर कटे हुए प्याज़-लहसुन को छोंक दें। धीमी आँच पर उन्हें तब तक भूनें, जब तक वे हल्के सुनहरे न हो जाएँ। उसके बाद कढ़ाई में भाजी डाल दें...। आमतौर पर हर व्यंजन विधि में आपको यही पढ़ने को मिलता है। लज़ीज़ आहार यानी प्याज़-लहसुन का तड़का! विश्व भर में ऐसे भोज-लोलुप समाज हैं, जो प्याज़-लहसुन के बिना भोजन की कल्पना भी नहीं कर सकते। स्वाद तो रही एक बात! भोजन-विशेषज्ञों ने स्वास्थ्य की दृष्टि से भी प्याज़-लहसुन के बहुत फायदे बताए हैं। अनेक-अनेक व्याधियों की औषधि प्याज़-लहसुन को ठहराया गया है। इन पर खूब शोध भी हुए हैं। अ…

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दिव्य अनुभूतियाँ कैसे हो सकती हैं?

वर्तमान में, वैज्ञानिकों की जिज्ञासा केवल 'भौतिक' स्तर तक ही सीमित नहीं रही है। वे 'अलौकिक' या 'आत्मिक' स्तर पर भी खोज करने में लगे हुए हैं। इसके लिए उन्होंने कई ऐसी तकनीकों और उपकरणों का आविष्कार किया है, जिनके द्वारा वे दिव्य अनुभवों को प्राप्त कर सकें। जैसे- ... एडिसन तकनीक थॉमस एडिसन का नाम कौन नहीं जानता? वे एकमात्र ऐसे वैज्ञानिक हैं, जिनके नाम पर 1093 पेटेंट हैं। विद्युत, बल्ब तथा फोनोग्राफ जैसे सैंकड़ों आविष्कार करने के बाद, वे चाहते थे एक ऐसा आविष्कार करना जिससे वे अपनी रचनात्मकता और उत्पादक क्षमता को बढ़ा सकें। इसके लिए उन्होंने 'Hypnagogia' तकनीक को अपनाया। यह तक…

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बुरा मानें या न मानें?

अरे होली है! होली के दिन अगर कोई आपके ऊपर रंग डाले तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल नहीं। अगर कोई पिचकारी से रंगों की बौछार करे, तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल नहीं। अगर कोई खुशी में झूमे-नाचे, तो क्या बुरा मानने वाली बात है? बिल्कुल भी नहीं। तभी तो जब गुब्बारा पड़ता है, कपड़े भीगते हैं, अलग-अलग रंगों और डिज़ाइनों में चेहरे चमकते हैं- तो भी सब यही कहते हैं- 'भई बुरा न मानो, होली है!' लेकिन यदि रंग की जगह लोग एसिड फेंकने लग जाएँ... खुशी में झूमने की जगह नशे में होशो-हवास खोकर अश्लील और भद्दे काम करने लग जाएँ... पर्व से जुड़ी प्रेरणाएँ संजोने की बजाए, हम अंधविश्वास और रूढ़िव…

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जहाँ मृत्यु भी मंगल है!

भारतीय संस्कृति में तीर्थ-स्थलों का विशेष स्थान रहा है। यहाँ जनमानस मलिन से पवित्र होने की मनोकामना लेकर आते हैं। इन्हीं तीर्थों में से एक है- 'काशी'। काशी के संदर्भ में, स्कंदपुराण (4/96/123) में वर्णित है- विद्यानां चाश्रयः काशी काशी लक्ष्मयाः परालयः। मुक्तिक्षेत्रमिदं काशी काशी सर्वा त्रयीमयी।। अर्थात् गंगा के तीर पर स्थित पावन धाम काशी विद्या, लक्ष्मी, और मुक्ति से युक्त एक सम्पन्न क्षेत्र है। 'वरुणा' और 'असी' नामक उपनदियों के संगम स्थल इस 'वाराणसी' या 'काशी' का उल्लेख महान फ्रांसिसी  इतिहासकार ' आहला द एन्यूल' ने भी खूब किया- 'काशी हमेशा से ही प्राची…

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आभा मंडल आकर्षक कैसे बनता है?

विज्ञान एक बहुत ही विशाल सागर है, जो कई वैज्ञानिक तथ्यों की नदियों के मेल से बना है। हमने अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका के माध्यम से कई बार दर्शाया है कि यह विज्ञान रूपी सागर अपने अंदर अनेकानेक बहुमूल्य आध्यात्मिक मोतियों को सहेजे हुए है। इस बार हम पुन: इस सिंधु की गहराई में उतरते हुए आपके समक्ष लाए हैं, मनोरंजन व समाजविज्ञान से जुड़े कुछ ऐसे प्रयोग जिनमें अध्यात्म के महान सूत्र संजोए हुए हैं। ... हेलो इफेक्ट 'हेलो इफेक्ट' एक ऐसा 'प्रभाव' है, जिससे एक द्रष्टा किसी इंसान या व्यक्ति के गुणों को देखकर उसकी ओर आकर्षित हो जाता है और उसे पसंद करने लगता है। मनोवैज्ञानिक एडवर्ड थ…

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सर्दी में एक्यूप्रेशर के सरल उपचार

अमेरिका के सी.डी.सी. (Centre for Disease Control and Prevention) ने कुछ आँकड़े जारी किए, जिनके अनुसार- 60 मिलियन (6 करोड़) बच्चों को स्कूल से.छुट्टी लेनी पड़ी!! 50 मिलियन (5 करोड़) कामकाजी लोगों की जमी-जमाई नौकरी/ व्यवसाय प्रभावित हुआ!! 25 मिलियन (ढाई करोड़) डॉलर का नुकसान हुआ, जब अलग-अलग सेक्टर के कर्मचारियों की कार्य-क्षमता कम हुई!! काफी भीमकाय आँकड़े हैं! इन्हें पढ़कर जिज्ञासा होती है कि आखिर क्यों इतने बच्चों की नियमित शिक्षा प्रभावित हुई? कार्यक्षेत्रों और कार्य क्षमताओं में यह उथल-पुथल क्यों मची? सेंटर ने खुलासा किया कि इनका कारण स्वास्थ्य में गिरावट है, जिसकी जड़ में बहुत ही सामान्य रोग हैं- सर्दी, ज़ुकाम, खाँसी …

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स्थिर मन ही स्थायी सफलता का आधार!

घर और ऑफिस के कार्यों से लदी ज़िन्दगी अक्सरां हमारे शरीर के साथ-साथ मन को भी थका देती है। किंतु इससे पहले कि यह मन की थकान हमें हमारी सफलता से दूर ले जाए, आवश्यक है कि हम इस थकान को ही अपने जीवन से दूर कर दें। इसके लिए हम खोजते हैं उन पलों को, उन बातों को, उन विचारों को, उन उदाहरणों को जो हमें प्रेरणाएँ दे जाएँ। अंग्रेजी भाषा में प्रेरणा को 'Inspiration' कहते हैं। 'Inspiration' का एक अर्थ  'Breath-in' यानी 'साँस लेना' भी होता है। तो हम कह सकते है कि प्रेरणाएँ हमारे लिए साँस लेने की तरह ज़रूरी हैं। क्योंकि प्रेरणा से भरे प्रसंग, दृष्टांत, उदाहरण इत्यादि हमारे समस्या से भरे जीवन को सुकून की साँस …

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यूनान में कब और कैसे पहुँचे-श्रीकृष्ण?

यूनान में श्रीकृष्ण प्रमाण पुरातत्त्व विज्ञान से! 1970 के दशक में, अफगानिस्तान के अय-खनुम जिले में, पुरातत्त्व विशेषज्ञों ने एक बड़ी खोज की। वहाँ की गई खुदाई में उनको लगभग 180 ई.पू. के चाँदी के सिक्के मिले। इन चोकोर सिक्कों के दोनों तरफ दो आकृतियाँ उकेरी हुई थीं। विश्लेषण करने पर सिक्के के एक तरफ श्रीकृष्ण और दूसरी तरफ बलराम चित्रित मालूम हुए। श्रीकृष्ण ने एक हाथ में छह आरे वाला चक्र और दूसरे में शंख पकड़ा है। श्री बलराम ने एक हाथ में हल और दूसरे में मूसल थामा हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि सिक्के के दायीं तरफ 'राजाने' और बायीं तरफ 'अगथुक्लयेश' अंकित है। इसका अर्थ हुआ, 'यूनान…

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मकर संक्रांति पर करें अंतर्यात्रा

पाठकों! आप जानते ही होंगे की जनवरी माह की 14 तारीख को मकर संक्रांति का उत्सव पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। अधिकांश लोग यूँ तो इस पर्व को सिर्फ फसल-कटाई के त्योहार के तौर पर समझते और मनाते हैं। पर क्या आप जानते हैं? दक्षिण भारत में इस दिवस का महात्म्य अत्यंत पावन और आध्यात्मिक है। खास कर केरल प्रदेश में यह दिन भगवान 'अय्यप्पा' को समर्पित है। इस दिन विश्व-भर से करोड़ों भक्त भगवान अय्यप्पा के दर्शन करने के लिए सबरीमाला मन्दिर तक की यात्रा तय करते हैं। पौराणिक इतिहास भगवान अय्यप्पा की कहानी पर प्रकाश डालता है। कहते हैं कि दुर्गा द्वारा महिषासुर वध के बाद 'म…

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संकल्प के आगे नहीं कोई विकल्प!

हमारे वेदों और उपनिषदों में सृष्टि की उत्पत्ति संकल्प से होने का विवरण है। स्वयं भगवान ने सृष्टि के आरंभ में एक संकल्प धारण किया-  'एकोSहं बहुस्याम:'- मैं एक से अनेक हो जाऊँ। मानव उसी संकल्पवान ईश्वर की अनुपम और सर्वोत्तम कृति है। वह तो बना ही संकल्पवान होने के लिए है- 'संकल्पमयोSयं पुरुष:'। परन्तु क्या हमारे अंदर इतनी संकल्प शक्ति है कि जिस लक्ष्य का हम चयन करें, उसे प्राप्त करके ही रहें? अक्सरां हमलोग नववर्ष या वर्षगाँठ पर कोई न कोई संकल्प लेते हैं। लेकिन जितनी शीघ्रता से उन्हें धारण करते हैं, उतनी ही तेज़ी से वे टूट व बिखर जाते हैं। क्यों? किसी दार्शनिक ने इस विषय मे…

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रोबोट बना मानव या मानव बना रोबोट!

अक्षय- (यू.एस.से अपने पापा के साथ वट्स-एप चैट करते हुए)- हैल्लो पापा! पापा- अक्षय बेटा, कैसा है तू? अक्षय- सॉरी पापा, आपके मैसेज का जवाब थोड़ा देर से दे रहा हूँ... पापा- आज तो रविवार है... मुझे लगा तेरे ऑफिस की छुट्टी होगी... अक्षय- ऑफिस तो बंद था आज। पर पापा, आपको मालूम है, मैं कहाँ घूम कर आया? पापा- ज़रूर कोई नए गैजेट्स निकले होंगे... या फिर नई कार... तू इन्हीं चीजों के तो इर्द-गिर्द घूमता है... अक्षय- ग्रेट पापा! आप मुझे कितनी अच्छी तरह जानते हैं... आज मैं एक रोबोट एक्सपो में गया था। ओ माई गॉड पापा, मैं आपको क्या बताऊँ... ...  ...मेरा बस चले तो मैं सारे रोबोट खरीद लूँ। फिर वे ही मेरा सारा काम करेंगे। आ…

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विध्वंसकारी नहीं है, महादेव का डमरू

...अवश्य ही आपने भगवान शंकर की प्रतिमा को ध्यान से देखा होगा। महादेव एक हाथ में डमरू थामे रहते हैं। पर क्या कभी आपने इस बात पर गौर किया कि ऐसा क्यों? इस वाद्य यंत्र को धारण करने के पीछे भगवान का आशय क्या हो सकता है? क्या यह वाद्य यंत्र शिव की मात्र शोभा बढ़ाने वाला अलंकार है? आखिर भगवान आशुतोष के हाथ मे डमरू का क्या प्रयोजन? क्या यह मात्र एक डुगडुगी है, जो 'तांडव' करते महादेव के हाथ में सुशोभित होती है? या इस डमरू का बजना किसी विध्वंस की ओर इशारा करता है? विचारिए, भगवान शंकर मदारी तो नहीं, फिर हाथ में डमरू क्यों थामा? उत्तर गूढ़ है और आध्यात्मिक भी... अक्सर देखा गया है कि लोग भगवान …

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आओ प्रकृति से अपनी प्रवृति सँवारें!

प्रकृति से हमें जीवन जीने के लिए सबकुछ मिलता है- भोजन, हवा, पानी... और यहाँ तक कि अनमोल प्रेरणाएँ भी। जी हाँ! यदि हम प्रकृति को गौर से देखेंगे, तो उसमें ऐसे बहुत से सूत्र पाएँगे जो हम साधकों की प्रवृत्ति संवारने में सहायक हैं। आइए, इस माह अपने शारीरिक भोजन के साथ-साथ साधकता की खुराक का बंदोबस्त भी प्रकृति के ज़रिए करते हैं। ...   ...जीव का नाम 'प्रेयिंग मेंटिस' है यानी 'प्रार्थनारत कीट'। अपने नाम के अनुरूप यह बिल्कुल सादगी से अपने हाथों को हमेशा जोड़ कर रखता है। साथ ही, इसमें बहुत सी अन्य खूबियाँ भी मौजूद हैं। जैसे- यह जिस वातावरण में रहता है अर्थात जिस भी पेड़-पौधे का संग करता है…

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पंचदिवसीय उल्लास- दीपावली

दिवाली (कार्तिक अमावस्या) हम सभी जानते हैं कि अमावस्या की अंधेरी रात को हर्षोल्लास से भरा दिवाली पर्व मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन प्रभु राम आसुरी शक्तियों का वध करके अयोध्या लौटे थे। सांकेतिक अर्थ यही है कि जीवन की दु:ख भरी काली रात्रि में जब ईश्वर का पदार्पण हो जाता है, तो हर अशुभ घड़ी शुभ में परिवर्तित हो जाती है। दीपावली का यह दिन अन्य अनेक शुभ कारणों को भी लिए हुए है- 1. इस दिन न केवल प्रभु राम रावण का वध कर अयोध्या लौटे थे, अपितु इसी दिन तेरह साल बाद पाण्डवों का हस्तिनापुर लौटना हुआ था। 2. भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर इसी दिन हिरण्यकशिपु का वध किया था। 3. इसी दिन उ…

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चाहे कुछ भी हो... आगे बढ़ते रहो!

कौन कहता है कि लक्ष्य को पाना आसान होता है? मंज़िल के रास्ते में मुश्किलों के सैलाब भी आते हैं और चुनौतियों के बवंडर भी। कभी डर हमें रोकने की कोशिश करता है; तो कभी लालच अपने चंगुल में फाँसने के लिए हमें फुसलाता है। लेकिन कौन कहता है कि इन मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद भी मंज़िल तक नहीं पहुँचा जा सकता? जब दिल और दिमाग मे लक्ष्य को पाने का पागलपन हो और रगों में ईमानदारी रक्त बनकर दौड़ती हो, तब फिर इन अवरोधों को मुँह की खानी ही पड़ती है। इतिहास में ऐसी बहुत सी हस्तियाँ हुई हैं, जो अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जोश और जज्बे की सारी हदें पार कर गईं। जिन्होंने अपने जीवन में सिर्फ एक ह…

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आओ, दिव्य मित्र को ढूँढ़ें!

कवि एडगर ए गेस्ट ने अपनी एक कविता में इस प्रकार 'दोस्ती' को परिभाषित किया है। कविता की कुछ पंक्तियों के भाव इस प्रकार हैं- 'दोस्त वही है, जो दु:ख-सुख के पलों में सदैव आपके साथ खड़ा रहे। जीवन के उतार-चढ़ाव में, हर परिस्थिति में तुम्हारा संबल बन कर हिम्मत दे। आपके स्वप्न चाहे कैसे भी क्यों न हों, सच्चा मित्र तो सदा उनके पूर्ण होने की प्रार्थना करता है... ।' अब ज़रा विचार कीजिये- क्या वास्तव में दोस्त वही है, जो इन दावों पर खरा उतरे? जो रिश्ता इन सभी विशेषताओं को अपने अंदर समेट लेता है, क्या हम उसे 'सच्ची मित्रता' कह सकते हैं? शायद नहीं! वजह यह कि दु:ख-सुख सांझा करने के पीछे छिपा प्र…

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क्या सच में 'राहु' व 'केतु' हैं?

श्री मद्भागवत महापुराण में समुद्र मंथन की गाथा उल्लिखित है। समुद्र मंथन का मुख्य उद्देश्य था, अमृत की प्राप्ति। इसी हेतु देवताओं और असुरों ने आपस में संधि कर एक साथ समुद्र मंथन करने का निर्णय लिया। नागराज वासुकि को नेति ( रस्सी) बना कर मंदराचल पर लपेटा गया। फिर पूर्ण उत्साह व आनंद के साथ मंथन का कार्य प्रारंभ किया गया। ... परन्तु  अधिक भार  व आधाररहित होने के कारण मंदराचल समुद्र में धंसने लगा। मंदराचल को समुद्र में डूबने से बचाने के लिए भगवान ने कच्छप अवतार धारण किया।... तत्पश्चात असुर व देवगण बड़े वेग से समुद्र मंथन करने लगे। सबसे पहले समुद्र से हलाहल निकला। इससे चहुँ ओ…

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गणपति- सर्वश्रेष्ठ सी. ई. ओ.

सर्वोत्तम लीडर कैसा होना चाहिए? जानने और बनने के लिए आप भी सादर आमंत्रित हैं, इस वर्कशॉप में- प्रोग्राम- लीडर्स वर्कशॉप स्थान- प्रगति भवन तिथि- 1 सितम्बर, 2016 एक सज्जन ने बड़े ध्यान से इस विज्ञापन- पट (Hoarding) को पढ़ा।फिर अपनी पॉकेट से पेन निकाला और कार्यक्रम का पूरा विवरण अपनी डायरी में नोट कर लिया।... बड़ी-बड़ी कंपनियों के मैनेजर, सी.ई.ओ. और अन्य टीम लीडर सूट-बूट पहन कर बड़ी तहज़ीब से ऑडीटोरियम में बैठे हुए थे। ये सज्जन भी सबसे आखिरी पंक्ति में जाकर बैठ गए। कुछ ही देर बाद वर्कशॉप का शुभारम्भ हुआ।सबसे पहले मंच पर एक बहुत बड़ी कम्पनी के सी.ई.ओ. आए। अपने भाषण का आरंभ उन्होंने इन शब्दों से …

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कुशल कार्य का रहस्य!

श्री आशुतोष महाराज जी कहा करते हैं- 'समाज में अच्छी और प्रभावी योजनाओं की कमी नहीं है। अगर कमी है, तो श्रेष्ठ मानवों की जो उन योजनाओं को क्रियान्वित कर सकें।' जब किसी इमारत का निर्माण होता है, तो यह सुनिश्चित किया जाता है कि उसमें लगने वाली एक-एक ईंट पक्की हो। अगर उसके निर्माण में कच्ची ईंटों का इस्तेमाल होगा, तो वह इमारत कभी भी गिर सकती है। इसी प्रकार समाज को श्रेष्ठ बनाने के लिए उसकी एक-एक ईकाई अर्थात मनुष्य को श्रेष्ठ बनाना होगा। तभी एक सुन्दर व श्रेष्ठ समाज का निर्माण संभव है।  सब जानते हैं, श्रेष्ठ व्यक्ति अपने कार्य की गुणवत्ता से पहचाना जाता है। और कार्य की गुणव…

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ताकि हम आज़ाद भारत में साँस ले सकें!

प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को, हम भारतीय पूरे जोश व उल्लास से स्वतंत्रता दिवस मनाते है। यही वह तारीख है, जब सन् 1947 में अंग्रेज़ी हुकूमत से हम सभी को आज़ादी मिली थी। इतिहास की एक ऐसी उज्ज्वल सुबह, जब भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की कड़ी तपस्या रंग लाई थी। तब हर भारतीय के होठों पर गुंजायमान था, सिर्फ एक ही तराना- ' अब हम आज़ाद हैं!' पर हाँ, यह युग सत्य है कि इस आज़ादी को पाना आसान न था। इसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों को शूलों से भरे लम्बे रास्तों पर नंगे पाँव चलना पड़ा था। बेइंतहां ज़ुल्म और पीड़ा के दरिया को पूरी दिलेरी से पार करना पड़ा था। इस स्वतंत्रता के महासंग्राम में कई दिल दहला देने वाली…

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दिमाग की हार्ड-डिस्क कैसे करें दुरुस्त?

प्यारे बच्चों! आपको पता है एक राज़? भगवान ने हमारे शरीर में डाटा स्टोरेज (संग्रहण) के लिए कितने गीगा बाइट्स( Giga/Tera Bytes) की हार्ड डिस्क दी है? चलिए, आपको आपकी ही भाषा में इसका जवाब देते हैं। यह हार्ड डिस्क है, हमारा मस्तिष्क। इसकी इतनी क्षमता है कि यदि यह एक डिजिटल वीडियो रिकार्डर हो, तो इसमें इतने टी.वी. सीरियल संग्रहित किए जा सकते हैं कि आप लगातार 300 सालों तक टी. वी. देख सकें। परररर... इतनी अद्भुत क्षमता होने के बाद भी हम अक्सर यही कहते हैं- " मुझे तो परीक्षा में याद ही नहीं रहा। मैं भूल जाता हूँ।" ज़रा सोचिए! हमारे पास संग्रहण का इतना जबरदस्त इंतजाम है, फिर भी हम भूलने की बीमारी के शिका…

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कन्हैया के गुदगुदाते खेल

पृथ्वी लोक का एक भाग ब्रह्मलोक बना था। यह था- गोकुलधाम। ब्रह्मा जी ने नीचे झाँका और कारण टटोलना चाहा। अद्भुत... आला-निराला प्रेम का नज़ारा दिखाई दिया। हँसी के फव्वारे... मसखरी... ठिठोली- नटखट प्रेम का पूरा महाभोज यहाँ पक रहा था। हर पकवान में था, कृष्ण- रस का तड़का!... ... आइए, चलते हैं, गोकुल की प्रेमपगी बस्ती में... मिलते हैं, कन्हैया की धमाल-चौंकडी मचाने वाली गोप मंडली से! द्रष्टा बनते हैं उनके गुदगुदाते खेलों के और उनमें छिपे अलौकिक रहस्यों के! ...  कान्हा का पसंदीदा खेल- गो एवं गोवत्सों (बछड़ों) संग आनंद मनाना। ... एक दिन आनंदकंद ने एक नूतन लीला करने की ठानी। मैय्या रसोईघर में थी। सखियो…

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महाराज जी आएँगे ही आएँगे!

'अंधविश्वासी हो आप लोग! स्वार्थसिद्धि की थाप पर अंध-धारणाएँ फैला रहे हो! अवैज्ञानिक कोरे झूठ को आस्था-विश्वास का जामा ओढ़ा बैठे हो! यह तो दुनिया को बेवकूफ बनाना हुआ! आँखों में धूल झोंकना हुआ! बंद करो यह पाखंड! अपने गुरु की देह का ससम्मान संस्कार कर डालो!...' 28 जनवरी, 2014 की वह रात... जब गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी समाधिस्थ हुए- तब से ऐसे अनगिनत कटु और ह्रदयभेदी ताने समाज ने संस्थान पर बरसाए हैं। जवाब में, महाराज श्री के साधक-शिष्यों ने अपनी हज़ारों-हज़ार दिव्य अंतरानुभूतियाँ उन्हें सुनाईं, जिनमें उन्हें महाराज जी की समाधि और पुनः प्रकटीकरण का साक्षात दर्शन हुआ था। पर कौन समझा? त…

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वो तूफान, जो तूफानों से भिड़ गए!

महाकुंभ (उज्जैन, 2016) के आयोजन में एक अनोखा दृश्य देखने को मिला। दो तूफानों को आमने-सामने होकर एक-दूसरे से लोहा लेते देखा गया। एक तूफान था, जो प्रकृति की कमान से अंधड़ गति से छूटा था। घनघोर घटाएँ, चक्रवाती हवाएँ... झंझावाती बरसात ... मानो इंद्र ने कुपित होकर इस तपोभूमि पर वज्रपात कर डाला हो! सिंहस्थ का अधिकाँश भाग इस तूफान की चपेट में आ गया। कुछ शिविर तो पूरे के पूरे ढह गए। पंडाल उखड़ गए, तहत-नहस हो गए। तोरण द्वार धराशायी हो गए। लेकिन... इस प्रलयकारी मंजर में एक तपस्या-स्थली गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की भी थी। प्राकृतिक तूफान आते ही इस शिविर से उसकी टक्कर का दूसरा तूफान उठा। यह तूफ…

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तसल्ली से तराशा है गुरुदेव ने!

अध्यात्म की डगर, एक ऐसी डगर है जिस पर गुरु के बिना चल पाना असम्भव है। इस सफर का आरम्भ भी गुरु से है और अंत भी। सृष्टि ने आदिकाल से न इसमें कोई परिवर्तन हुआ है और न ही होने की संभावना है। बल्कि सांसारिकता के रास्ते पर भी यही पाया गया कि जब भी कोई व्यक्ति पूरी तबियत से गढ़ा गया, तो वह गुरु के हाथों ही गढ़ा गया! जब-जब भी किसी का सफल निर्माण हुआ, तो एक गुरु के सान्निध्य मेंही हुआ। जिस तरह कोई भी कुम्भ, कुम्हार के बिना नहीं गढ़ा जा सकता; कोई भी मूर्ति, मूर्तिकार के बिना अपने अस्तित्व को नहीं पाती; कोई भी चित्र, चित्रकार के बिना सजीव नहीं होता; कोई भी संगीत, संगीतकार के बिना झंकृत नहीं होता; को…

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गर्मियों की छुट्टियों में सुधारें विहार और व्यवहार!

प्यारे बच्चों! गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं। आप खूब मज़े कर रहे होगे और स्कूल से मिला होमवर्क भी जमकर कर रहे होंगे। इस माह की 'अखण्ड ज्ञान' भी आपको इन छुट्टियों का एक होमवर्क दे रही है। क्या हुआ? ...घबराइए नहीं! क्योंकि यह होमवर्क आपको शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक- हर स्तर पर सशक्त करेगा। यदि आपने पूरी तत्परता से इस गृहकार्य को पूर्ण किया, तो छुट्टियों के बाद आप एक नए क्रांतिकारी व्यक्तित्व के साथ स्कूल में प्रवेश करोगे! अब जानिए कि आपको क्या करना है? इस स्तम्भ में हम विहार और व्यवहार से सम्बंधित आपको 10-10 टिप्स दे रहे हैं। आपको प्रतिदिन एक सुझाव का अभ्यास करना …

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क्या आपने 'ऐसा' संगीत सुना है?

शनिवार, 18 जनवरी, 2014- सनडांस फिल्म समारोह रिलीज़ करता है- 'अलाइव इनसाइड: अ स्टोरी ऑफ म्यूज़िक एंड मेमोरी'! सारांश- 'माइकल बेनेट' की यह डॉक्युमेंटरी संगीत के सकारात्मक और प्रभावशाली असर को दर्शाती है।यह कि कैसे अल्ज़ाइमर के रोगियों की निराश ज़िंदगी में म्यूज़िक कारगर सिद्ध हुआ। फिल्म बयान करती है कि जो काम आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था के लिए असंभव सा है, उसको कितनी सहजता से संगीत सुनने मात्र से मुमकिन किया जा सकता है! 'फ्रेडरिक नीत्शू' कहते हैं, 'संगीत के बिना ज़िंदगी एक भूल है।' परन्तु अगर आज हम अपनी दृष्टि घुमाएँ, तो संगीत के कारण कितनी ही ज़िन्दगियाँ पतन की ओर खिसक रही हैं। न …

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क्या जीवन सचमुच इतना जटिल है?

आज की रफ्तार भरी दुनिया में हर कोई दौड़ता नज़र आता है। चाहे वह विद्यार्थी हो या नौकरीपेशा या व्यवसायी या फिर घर को संभालती महिला! हर कोई तेज़ी से भाग रहा है। पर इनमें से अधिकतर को नहीं मिल पाता- सफलता का मुकाम। मिलता है तो दु:ख, दर्द, निराशा और असफलता। इसलिए ज़रूरत है कुछ पल रुकने की। चिन्तन-मनन करने की। उन बातों को ग्रहण करने की, जो अत्यंत महत्वपूर्ण हैं- सफल और खुशहाल जीवन जीने के लिए। ... तेज रफ्तार ने हमारी असहनशीलता को भी तेज़ कर दिया है।ज़रा-ज़रा सी बातों पर हम नफरत के किले खड़े कर देते हैं। कहीं पर भी चले जाएँ- ऑफिस, घर या पार्टी में- सब जगह लोग एक-दूसरे की बुराई करते नज़र आते हैं। बस य…

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ईश्वर की सेना में सम्मिलित हो जाओ!

सत्य सदा विजयी होता है।  इस शाश्वत बात से शैतान भली प्रकार अवगत है। किन्तु इस सच्चाई को जानने के बाद भी उसके विद्रोह में कमी नहीं आती।  वह सत्य को झुठलाने का निरन्तर प्रयास करता है।  हर युग में शैतान/अज्ञानता का यह हठ ज़ारी रहता है।  ज़रथुश्त्र के समय में भी कुछ ऐसा ही हुआ। ज़रथुश्त्र पारसी धर्म के प्रवर्तक थे।  उनके जन्म से पूर्व ही दुष्कर्मियों को उनके आगमन की आहट हो गयी थी। ... इसलिए उन्होंने ज़रथुश्त्र के पदार्पण की संभावना को ही खत्म करना चाहा।  पर 'जाको राखे साईया मार सके न कोय !' ... आख़िरकार इस दिव्य आत्मा का आलिंगन कर धरा प्रफुल्लित हो उठी।  ... उनके रूप में …

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संघबद्ध होकर हमें चलना ही होगा ...

सद्गुरु श्री आशुतोष महाराज जी अपने शिष्यों को सम्बोधित करते हुए कहा करते हैं - " तुम सब में इतनी शक्ति है कि तुम चाहो तो पर्वतों का सिर झुका दो।  आँधियों का रुख मोड़ दो।  अगर तुम सब ब्रह्मज्ञानी संगठित हो जाओ, तो असम्भव भी संभव हो सकता है।  "... कहते हैं, एक मज़बूत इमारत बनाने के लिए मज़बूत ईंटों की ज़रूरत होती है।  पर यह अधूरा ज्ञान है।  चूँकि आप कितनी भी मज़बूत ईंटे क्यों न ले आएं, आप उनसे तब तक मज़बूत इमारत नहीं बना सकते जब तक उन ईंटों के बीच में सीमेंट न भर दिया जाए। ... संगठित होकर चलने के लिए ऐसे ही कुछ महत्वपूर्ण सूत्र हैं...   पहला - लक्ष्य के प्रति जागरूकता ! अगर हमारा ल…

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ग्रथों की अनखुली ग्रन्थियाँ!

...आइए चलते हैं, द्वापरकालीन युग की ओर। इस युग में महर्षि वेदव्यास जी ने रचना की थी, एक अद्भुत ग्रंथ- 'महाभारत' की। इसकी अभूतपूर्वता के कुछ अनखुले पक्षों से आज हम आपका परिचय कराना चाहेंगे। सर्वप्रथम इस ग्रंथ में 8800 श्लोक थे और इसका नाम रखा गया था- 'जय'। इस नामांकन के पीछे भी महान रहस्य है। उसी ग्रंथि को अब खोलते हैं-वेदव्यास रचित इस महान ग्रंथ में कुल कितने पर्व हैं?- 18 पर्व!  महाभारत का युद्ध कितने दिनों तक चला?- 18 दिन! इस युद्ध में कितनी अक्षौहिणी सेनाएँ सम्मिलित थीं?- 18 अक्षौहिणी सेनाएँ! युद्ध के पश्चात् जीवित रहने वाले योद्धा कितने थे?- 18 ( 15 पांडवों के, 3कौरवों के)! सारतः यह…

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आकस्मिक उपचार!

असावधानी या लापरवाही दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है। सावधानी से दुर्घटनाओं को बहुत हद तक कम किया जा सकता है। दुर्घटना में घायल व्यक्ति को जल्द से जल्द आवश्यक उपचार मिल जाने पर मृत्यु एवं अन्य खतरों से बचाया जा सकता है। अतः इस बार अखण्ड ज्ञान आपके लिए आकस्मिक दुर्घटनाओं में की जाने वाली प्राथमिक चिकित्सा के चुनिंदा सूत्र लेकर आई है। ... आग से जलना अक्सर गृहणियाँ रसोईघर में खाना पकाते समय  अपना कोई न कोई अंग जला बैठती हैं। वहीं बच्चे भी अनजाने में शैतानी करते हुए गर्म बर्तन को छूकर या गैस की आँच के नज़दीक आकर अपने को जला लेते हैं। दिवाली पर पटाखों से जल जाना भी एक साधारण घ…

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क्या हम भी ले पाएँगे कोई प्रेरणा?

मात्र एक इंसान ने बीस लाख से ज़्यादा अजन्मे शिशुओं की जान बचाई। क्या हुआ? चौंक गए! पर यह बिल्कुल सच है... आस्ट्रेलिया के जेम्स क्रीस्टोफर के खून में पाया गया- Rh(D)इम्यून ग्लोब्युलिन। यह दुर्लभ एंटीबॉडी ( रोग-प्रतिकारक) है। गर्भस्थ माताओं की देह में इस एंटीबॉडी का अभाव गर्भस्थ शिशुओं को रीसस रोग से पीड़ित कर उनकी मृत्यु का कारण बनता था। जेम्स ने अपने रक्त-प्लाज़्मा को इन माताओं को दान किया और उनके शिशुओं की रक्षा की। अभी तक जेम्स हज़ार से भी ज़्यादा बार अपने रक्त-प्लाज़्मा का दान कर चुके हैं। इसके लिए उन्हें ' Man with the Golden Arm' की उपाधि से विभूषित किया गया है। साथ ही 'जीवन बीमा कम्पनी' द्…

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विवेकानंद बनने के सूत्र!

इस माह अखण्ड ज्ञान पत्रिका आपके लिए भारत के क्रांतिकारी युवा संत स्वामी विवेकानंद जी के कुछ विशेष चित्र लेकर आई है। इनमें से अधिकतर चित्र मूल प्रतियाँ हैं, जो स्वामी जी के जीवन संघर्ष के विलक्षण पहलुओं को उजागर कर रही हैं। इन पहलुओं ने स्वामी विवेकानंद जी को आकार दिया; नरेन्द्र को विश्व-विजेता विवेकानंद बनाया। यह मौलिक चित्र स्वामी श्री रामकृष्ण परमहंस जी का है, जो अपने शिष्यों के मध्य उपस्थित हैं। परमहंस जी भाव-समाधि की अवस्था में लीन दिखाई दे रहे हैं। यह अवस्था उनकी ब्रह्म-निष्ठता की परिचायक है। केवल ठाकुर श्री रामकृष्ण परमहंस जी के समान सद्गुरु ही ऐसा सामर्थ्य रख…

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महा शिवरात्रि पर करे, शिव- तत्व की उपासना!

हाथ में जल पात्र, बेल पत्र इत्यादि लिए 'रावत' जी के कदम मंदिर की ओर बढ़े चले जा रहे थे। आज फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के उपलक्ष्य पर उन्होंने महाशिवरात्रि का व्रत जो रखा था। सो शिवलिंग का अभिषेक करने हेतु ही वे घर से निकले थे। पर मंदिर पहुँचने पर उनको श्रद्धालुओं की लंबी कतार देखने को मिली। उनकी बारी आते- आते लगभग डेढ़ घंटा बीत गया। शिवलिंग के निकट पहुँच कर उन्होंने ने भी बाकी सब की तरह उस पर बेल पत्र रखे और जल से अभिषेक किया। पर मन में प्रश्न कौंध उठे, आखिर यह सब क्यों? यह बेल पत्र, जल, दूध इत्यादि से अभिषेक... ऐसा क्यों? खैर, सवालों को किनारे करके वे सरपट घर की ओर मुड़ गए। रास्ते मे उन…

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खेलत रघुपति होरी हो!

होली के रंग विविध हैं। इन रंगों को खेलने के ढंग भी विविध हैं। ' होली' का त्यौहार रूढ़ियों के ढर्रे पर कभी नहीं चला। वह हर युग में नया वेश लेकर आया है। हर युगावतार की शैली में.नाचा है, थिरका है।...जैसा प्रांत, जैसी विभूति, जैसा भाव-वैसा ही रूप बनाकर फाग झूमा है। होली के इन अनेक रंगों और ढंगों में एक बात ' एक' सी रही है। वह है, प्रेम की। होली का उत्सव प्रेम का ही महोत्सव है। आएँ, होली की प्रेम-भीनी फुहारों में झूमें। अवध नगरी नववधू सी सजी थी। रंगोत्सव का प्रभाव धरा और गगन पर छाया था। राजभवन भी रंगभवन में बदल गया था। सूर्यवंश का राजसी परिवार बगीचे में एकत्र था। रघुवीर श्री राम जनक…

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कैसा संगीत हमारी 'प्ले लिस्ट' में हो?

क्या संगीत भी अच्छा- बुरा हो सकता है? संगीत के प्रोफेसर ' टिम फिशर' इसका उत्तर एक उदाहरण से देते हैं। वे कहते हैं- अंग्रेजी भाषा के वर्ण 'e' को लें। तो क्या यह अच्छा 'e' होगा या बुरा 'e'? या फिर दोनों में से कुछ भी नहीं? तीसरा विकल्प ही सही है। 'e' न्यूट्रल है- न अच्छा है, न बुरा है। पर जब इस मूल वर्ण को अन्य मौलिक वर्णो से जोड़ कर पंक्ति का निर्माण करते हैं, तो? मसलन ' Praise the Lord ( प्रभु का गुणगान करें)' या ' I hate God ( मैं भगवान से नफरत करता हूँ )'। स्पष्ट देखा जा सकता है कि पहला वाक्य सकारात्मक या अच्छा है; पर दूसरा वाक्य नकारात्मक या बुरा है। अत: 'e' न्यूट्रल है, मगर उसे जिस स्थान पर और ज…

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वेलेंटाइन युगल ऑफ त्रेता!

इस माह की 14 तारीख को विश्व-भर मे वेलेंटाइन दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन प्रेमी-युगल एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम का इज़हार वेलेंटाइन कार्ड, फूल, चॉकलेट आदि देकर करते हैं। अमेरिका के ग्रीटिंग कार्ड ऐसोसिएशन के अनुसार इस दिन लगभग एक अरब वेलेंटाइन कार्ड  पूरी दुनिया में लोग खरीदते हैं। भारत के युवा भी अब  इस विदेशी पर्व को मनाने की होड़ में हैं। पर क्या आज के आधुनिक प्रेमी जोड़े प्रेम के सच्चे अर्थ, उसकी गहराई व उसके मोल को जानते हैं?  हम आज आपको भारतीय इतिहास के ऐसे सच्चे प्रेमी-युगल की गाथा सुनाते हैं, जिन्होंने न एक-दूसरे को कभी वेलेंटाइन कार्ड दिया, न गुलाब के फूल भे…

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नई सोच की हरियाली!

अब रचनात्मकता का ज़माना है। हर क्षेत्र में नई सोच नए झण्डे फहरा रही है। नवीन विचारों में ही सृजनात्मकता है। लेकिन यह हमारे हाथ में है कि अपनी नई सोच  को हम कहाँ और किस क्षेत्र में लगाते हैं! पहनावे और खान-पान में लगाते हैं, तो यही नई सोच ' फैशन' बन कर छा जाती है। वैज्ञानिक या तकनीकी क्षेत्र में यह आविष्कार के रूप में उभर कर आती है। कॉर्पोरेट जगत में यह नये प्रोडक्ट्स और नए मुकामों की सीढ़ी बन जाती है। पर इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने रचनात्मकता के परों से स्वार्थ के परे उड़ान भर कर दिखाई है। उनकी यह उड़ान आधुनिकता की चमक-दमक से दूर प्रकृति के आँचल की ओर है। अपन…

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साधकों, धैर्य बनाए रखना!

सोचो, कैसा होता अगर हम आज स्कूल में दाखिला लेते और कल ही डॉक्टर या इंजीनियर बन जाते! आज बीज बोते और कल ही खेतों में बड़ी-बड़ी फसल लहलहाने लगती। घर से निकलते और निकलते ही ऑफिस पहुँच जाते... रास्ते में कोई लाल बत्ती न होती! सचमुच, तब ज़िन्दगी कितनी सुपरफास्ट होती! पर हकीकत में ऐसा नहीं होता! धैर्य, सब्र इंतज़ार- ये ज़िन्दगी के अटूट हिस्से हैं। आप चाहें तो भी इन शब्दों को अपने जीवन के शब्दकोश से हटा या मिटा नहीं सकते। मज़िल की ओर बढ़ेंगे, तो रास्ते में लाल बत्तियाँ तो आएँगी ही और हमें उन पर रुकना भी पड़ेगा। ठहरेंगे नहीं, हरी बत्ती होने तक का सब्र नहीं रखेंगे, तो फिर दुर्घटना के अंजाम को भी भुग…

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सोशल मिडिया से क्या खोया, क्या पाया?

दोस्तों! 'दिल खोल के बोल' नामक इस शो में आप सभी का स्वागत है। मैं हूँ रजत खन्ना और आज हम एक बहुत ही खास विषय पर चर्चा करने वाले हैं। एक ऐसा विषय, जो हम सब की ज़िन्दगी के साथ इस हद तक जुड़ चुका है जिसके बिना जीवन जीना सम्भव नहीं लगता। जी हाँ, आप बिल्कुल सही समझे- हम बात करने जा रहे हैं- सोशल मिडिया यानी फेसबुक, ट्विटर, वट्स-ऐप की! इस विषय पर बात करने के लिए एक खास पैनल हमारे स्टूडियो में मौजूद है। सोशल मिडिया का समर्थन करते हुए- आज की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं- रोहित जी। ये एक इंजीनियर हैं और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करते हैं। डॉ. ए. एल. अग्रवाल जी एक जाने-माने मनोचिकित्सक एव…

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'साधना' और 'सत्संग' का विज्ञान

उन्नीसवीं शताब्दी की बात है। विश्व-प्रसिद्ध रसायन शास्त्री लुई पाश्चर की ऑर्लीयन्स ( फ्रांस के मेयर और चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष) के संग बैठक हुई। चर्चा का विषय था- ' ईश्वर के नज़दीक लाने वाला विज्ञान'। गौर करने वाली बात है कि इस घटना को  लगभग  150 वर्ष बीत चुके हैं; पर आज भी जब हम अपनी  विज्ञान की पुस्तकें पढ़ते हैं, तो भगवान के नज़दीक लाना तो दूर  ये भगवान के अस्तित्व तक पर प्रश्नचिह्न लगाती दिखती हैं। किन्तु गुरुदेव आशुतोष महाराज जी कहा करते हैं- 'ब्रह्मज्ञान- जो विज्ञानों का भी विज्ञान है, ऐसी स्थिति में बेजोड़ समाधान देता है और आज की वैज्ञानिक शिक्षा  की उक्त कमी क…

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मन इतना चंचल क्यों है?

तिरुवण्णामलै ( अरुणाचल) की घाटी  मे श्री रमण महर्षि का आश्रम था। वहाँ बहुत से शिष्य अपने आत्म-विकास में रत थे। प्रतिदिन की भाँति रमण महर्षि प्रात: भ्रमण के लिए निकले कि अचानक उनके कदम अपने शिष्यों के साधना कक्ष की ओर बढ़ गए। सारे शिष्य साधना की मुद्रा में अपने-अपने कुश आसनों पर स्थिर होकर बैठे थे। रमण महर्षि एक माँ की भाँति  काफी देर तक बड़े ही प्रेम से अपने सभी शिष्यों को निहारते रहे। एकाएक उनकी दृष्टि अपने एक शिष्य पर पड़ी, जो बहुत ही अशांत प्रतीत हो रहा था। उसकी एकाग्रता बार-बार भंग हो रही थी। कभी वह पलकें झपकाता, तो कभी झुकता, कभी हाथों को खोलता... रमण महर्षि कुछ देर वहाँ रु…

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ठंडी बयार

सर्दियों ने धीमे-धीमे दस्तक दे दी है। ऐसे में भले ही आप थोड़े सुस्त हो गए हों, परंतु हम आपके लिए रैपिड-फायर( जल्दी- जल्दी पूछे गए) प्रश्न लेकर आए हैं। उत्तर 'हां' या 'न' में दें। 1. क्या आपका सुबह देर तक बिस्तर छोड़ने का मन नही करता? 2. क्या आजकल आप गरिष्ठ भोजन का सेवन बड़े चाव से कर रहे हैं? 3. क्या एक ज़माना हो गया है, आपको सूर्य देवता की गोद में बैठे हुए? 4. क्या आप नहाने का कार्यक्रम अकसरां एक दिन छोड़ कर करने लगे हैं? 5. क्या आप सैर पर जाने से कतराने लगे हैं? 6. क्या इन दिनों व्यायाम का आपने तर्पण कर दिया है? 7. क्या आप हर समय हीटर के आस-पास रहना पसंद करते हैं? यदि इस प्रश्नावली के किसी ए…

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आपका निर्णय कैसा होना चाहिए?

कॉर्पोरेट जगत में बहुत से लोगों ने अपनी किस्मत आज़माई है। ऐसी बहुत सी हस्तियों हुईँ, जिन्होंने सिफर से सफ़र शुरू किया और सफलता के ऊँचे शिखर तक जा पहुँची। वहीँ, ऐसे उदाहरणों की भी कतारें लगी हैँ, जहाँ अर्श से शुरुआत करके लोग फर्श पर आ गिरे। चाहे बात नीचे से ऊपर जाने की हो या ऊपर से नीचे आने की- दोनों पहलुओं में मुख्य भूमिका होती है- हमारे 'निर्णय' की। मात्र एक निर्णय हमारे बिज़नेस, प्रोजेक्ट, कम्पनी इत्यादि का इतिहास बदल सकता है। अगर आप कोई बिज़नेस चलाते हैँ या किसी कम्पनी के मालिक हैं या फिर किसी प्रोजेक्ट को संभाल रहे हैं, तो ज़रा एक बार अपने आप से ये प्रश्न पूछिए- -> क्या आपके न…

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जीव-जंतुओं ने सुनाई संगच्छध्वं की धुन!

ईश्वर द्वारा निर्मित इस प्रकृति का अंश प्रेरणादायक है। ज़र्रा-ज़र्रा मनुष्य को अमूल्य शिक्षाओं का पाठ पढ़ा रहा है। मानव चाहे तो आसपास के वातावरण व जीव-जन्तुओं से अनेक प्रेरणाएँ ग्रहण कर अपना चहूँमुखी विकास कर सकता है। तो चलिए, इस बार हम भी कुछ ऐसा ही प्रयास करते हैं। इस लेख के माध्यम से सृष्टि के विभिन्न जीव-जन्तुओं  द्वारा उच्चारित 'संगच्छध्वं' की धुन सुनते हैं। इन प्रेरक रत्नों को आत्मसात करने हेतु पग बढ़ाते हैं। ग्रेट बैरियर रीफ- समुद्री जीव-जन्तुओं  द्वारा निर्मित विश्व की सबसे विशाल चट्टान! इतनी विशाल कि अंतरिक्ष से भी दिखाई देती है। यह चट्टान आस्ट्रेलिया मेँ …

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भोजन किसमें पकाएँ व खाएँ?

प्रिय पाठकों! आज तक 'सेहत सार' स्तम्भ  आपको हृष्ट-पुष्ट- तंदुरुस्त रखने के लिए आपके समक्ष  भोजन, खान-पान, रहन-सहन आदि से सम्बन्धित सिद्धांतों व जानकारियों को प्रस्तुत करता आया है। परन्तु जैसे भोजन का हमारे तन-मन पर प्रभाव पड़ता है, ठीक वैसे ही भोज्य पदार्थों को  पकाने  और  सहेजने  वाले बर्तनों  का  भी  हमारे स्वास्थ्य में बहुत बड़ा योगदान है। एल्युमीनियम  के बर्तनों के लाभ/ हानि आजकल हर रसोईघर में हमें एल्युमीनियम के बर्तन जैसे प्रेशर कुकर, कढ़ाई, फ्राइंग पैन आदि दृष्टिगोचर होते हैं। क्योंकि भाग-दौड़ वाली ज़िन्दगी में एल्युमीनियम के बर्तनों में खाना बनाने क…

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भरत के मन के दीप- श्रीराम!

अश्विन शुक्ल की दशमी को यह धरा-धाम अत्यंत प्रफुल्लित हो उठी थी। उसके वक्ष-स्थल से एक दानवी शक्ति का विलोप जो हो चुका था। चँहु ओर ‘विजय' की धूम थी। एक हर्षौल्लास का वातावरण था। आज मानो हिंद महासागर  भी उछालें  मारकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रहा था। पर वहीं उत्तर में... सैकड़ों कोस दूर बहती सरयू नदी में न हलचल थी और न ही उल्लास! वह बिल्कुल शांत, निस्तब्ध, स्थिर वेग से आगे बढ़ती जा रही थी। चलायमान होते हुए भी उसके जल में न जीवन था और न ही उमंग। वह गुमसुम सी थी। बहते रहना उसका कर्त्तव्य था, सिर्फ इसलिए  बह रही थी। पर अचानक इस उमंगहीन बेला में जाने कहाँ से ठंडी हवा का एक झोंका आय…

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छठ पर्व पर डूबते व उगते सूर्य को नमन क्यों?

विविधताओं में एकता का प्रतीक है, हमारा भारतवर्ष। अनेक पर्वों व त्यौहारों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहाँ मनाए जाने प्रत्येक पर्व के भीतर मानवजाति के लिए अनेक प्रेरणाएँ व संदेश निहित हैं। हमारी सभी परम्पराऐं, रीति-रिवाज सांकेतिक रूप से हमें अंतर्जगत की ओर उन्मुख कर हमारा मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। इस माह में भी ऐसा ही एक अनूठा पर्व आ रहा है-' छठ', जो कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को पड़ता है। यह अनुपम पर्व भारत के अनेक राज्यों- झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, दिल्ली आदि में हर्षोल्लास से मनाया जाता है।... समय के साथ छठ पर्व विश्व भर में प्रचलित होता जा रहा …

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आने वाली सुबह शक्ति से युक्त हो!

कुछ साल पहले की बात है। नवरात्रों के विशेष दिन चल रहे थे। उन्हीं दिनों दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा' श्री देवी भागवत का' भव्य कार्यक्रम आयोजित किया गया था। मेरे मित्र इस संस्थान से जुड़े हुए हैं। उन्होंने गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी से ब्रह्मज्ञान की दीक्षा ग्रहण की थी। उन्हीं के आग्रह पर मैं भी देवी भागवत कथा सुनने उनके साथ गया। कथा के दौरान मंच से  'महिषासुरमर्दिनी स्तोत्रम' (श्री व्यास विरचितम् भगवती  स्तोत्रम) गाया गया। इसे मधुर लहरियों में गुँथकर पवित्र साध्वी बहनें गा रहीं थीं- सुरवरवर्षिणि... (अर्थात् नमन है आपको देवी माँ, जो देवों के लिए वरदानी …

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आफिस में आपसी झगड़ों से कैसे बचें?

प्रिय PEACE प्रतिनिधि, मैं एक कॉर्पोरेट हाऊस में एग्ज़िक्युटिव पोस्ट पर कार्यरत हूँ। कुछ महीने पहले ही मेरी ज्वाइनिंग हुई है। मैं 5 सदस्यों की एक टीम के साथ काम करती हूँ। परन्तु मेरी एक उलझन है, जिसके कारण मैं अपनी क्षमता अनुसार आउटपुट देने में स्वयं को असमर्थ महसूस करती हूँ। प्रोजेक्ट मीटिंग्स और डिस्कशन्स के दौरान अक्सर मेरे विचार सहकर्मियों के विचारों से टकराते हैं। अधिकतर मेरे किसी न किसी मुद्दे पर अनबन, मनमुटाव या बहस हो ही जाती है।ऐसा लगता है कि जैसे मुझे जानबूझ कर उकसाया जा रहा हो। अंतत: इन मीटिंग्स से कुछ उत्पादक परिणाम तो निकलते नहीं, बल्कि न चाहते हुए भी सहकर्मियो…

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सावधान! आपके भोजन में यह क्या है?

कुछ दिनों पहले मेरे पिताजी बाज़ार से हमारे लिए आम लेकर आए थे। हम सभी ने बडे़ ही चाव से रात्रि-भोजन में आम का सेवन किया। पर पता नहीं क्यों, हम सभी को उन आमों का स्वाद थोड़ा अजीब व ... लगा। लेकिन सभी के प्रिय आम अब खाए जा चुके थे। मगर अगली सुबह हम सभी के लिए अप्रिय साबित हुई। सभी बीमार पड़ गए। पिताजी के मुहँ में छाले उभर आए। दादी, भाई, माँ और मुझे 'दस्त'  और उल्टियाँ होने लगीं। सभी का पेट भयंकर गड़बड़ी का शिकार हो गया। हम सभी तुरन्त डॉक्टर के पास गए। वहाँ ज्ञात हुआ कि आमों में भारी मात्रा में 'कैल्शियम कारबाइड' के इंजैक्शन लगाए गए थे। उसी कारण हम सबकी ऐसी दुर्दशा हुई थी। क्लीनिक से आन…

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आदर्श मैनेजर- श्रीराम!

ज़रा कल्पना कीजिए एक ऐसी सुबह की, जब आपकी आँख खुली और आपका मन बड़ा प्रसन्न हुआ- 'वाह! आज तो अलार्म बजने से पहले ही मेरी आँख खुल गई!' टाइम देखने के लिए अपने साथ वाली टेबल पर नज़र डाली, तो वहाँ घड़ी नहीं रखी थी क्योंकि कल रात आप वहाँ अलार्म घड़ी रखना ही भूल गए थे। अब आपने दीवार पर टंगी घड़ी में टाइम देखा। यह क्या? ८.०० बज चुके थे! अॉफिस निकलने के लिए... केवल आधा घंटा शेष। आपको याद आया कि आज तो कंपनी के मैनेजर के साथ आपकी मीटिंग है। आप हड़बड़ाकर बिस्तर से लगभग कूद ही पड़े। ब्रश करने के लिए जल्दी से बाथरूम में गए। पर आपको ब्रश होल्डर में आपका टुथब्रश ही नहीं मिला!... तो आपने शोर मचाया। तब आपका बेटा ह…

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गुस्सा नहीं है अच्छा!

इटली के विख्यात कवि टैसो को किसी ने एक बार बहुत आहत किया। तब लोगों ने टैसो से पूछा-तुम उस व्यक्ति से बदला क्यों नहीं लेते, जिसने तुम्हारे साथ इतना बुरा किया? टैसो ने कहा- 'बिल्कुल ठीक कहते हो तुम सब! मेरा मन भी यही कह रहा है कि उसने मेरे साथ जो किया है, उसके बदले मैं उससे एक चीज़ तो लेकर ही रहूँगा...' पूछने वालों ने अनुमान लगाया- 'अ... अ... तुम्हारा मतलब है... उसका मान-सम्मान? ...उसकी सम्पति? या फिर... उसका जीवन ही?' टैसो- मैं उसके... ... अफ्रीका में रंग-भेद के चलते काले लोगों पर अत्याचार ज़ारी था। ऐसे में काले लोगों में जोश भरने के लिए अल्बर्ट अफ्रीका के जंगलों में गए। वहाँ पर एकत्रित काले लोग…

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रसोईघर का आधार- आटा, नमक, गुड़!

बूझो तो जानें- हर घर में ऐसा कौन सा कक्ष ऐसा होता है, जिस पर घर में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति का स्वास्थ्य निर्भर करता है? उत्तर- रसोईघर निःसन्देह, हर इंसान के स्वास्थ्य का रास्ता उसकी भोजनशाला से होकर गुज़रता है। स्वस्थ रहने के लिए चाहिए पौष्टिक आहार! और पौष्टिक आहार बनता है, रसोईघर में उपयोग की गई पौष्टिक खाद्य सामग्री से। तो चलिए सेहत सार की इस कड़ी में बात करते हैं उन पदार्थों की, जो रसोईघर में बनने वाले भोजन के आधारस्तम्भ हैं। सबसे पहले बात करते हैं उस पदार्थ की, जिसके बिना भोजन की थाली अधूरी है। भारत की एक पुरानी कहावत के अनुसार यह है- रोटी। ... आपको यह जानकर हैरानी होगी क…

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आइए, शपथ लें...

शास्त्र कहते हैं, एक शिष्य निरन्तर चलता है। इस 'निरन्तर' शब्द का अर्थ समझते हैं आप? ऐसा समर्पण, ऐसा चिंतन, ऐसी गति, ऐसी मति, ऐसा अरमान, ऐसा ईमान- जिसमें न कोई अटकन हो, न कोई अड़चन! न कोई रुकावट हो, न ही थकावट! एक ऐसा सिलसिला, जिसका आरम्भ तो है, पर अंत नहीं। वैसे भी, गुरु-भक्तों की डगर और उनका सफर तो हमेशा से संसार से जुदा ही रहा है... चाल में भी और अंदाज़ में भी! संसार में हासिल की गई किसी भी वस्तु पर निर्माण-तिथि के साथ समाप्ति-तिथि भी छपी होती है। सांसारिक नौकरी में भी यदि प्रवेश तिथि है, तो साथ में रिटायरमेंट तिथि भी है। पर ऐसा संसार में होता है, गुरु-दरबार में नहीं। यहाँ से प्राप्त किए ग…

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जीवन की भौं-भौं

एक घर के बाहर एक कुतिया रहती थी। पता नहीं, कहाँ से आयी थी! पर उसने उस घर के आगे के फुटपाथ को ही अपना घर बना लिया था। वह इतनी सीधी- सादी थी कि किसी ने कभी उसके भौंकने की आवाज़ तक नहीं सुनी थी। उनके माता-पिता को कभी भय नहीं होता था कि वह उनके बच्चों का कोई नुकसान कर देगी। फिर एक दिन, उसने उस घर के सामने वाले खाली प्लॉट में छ: बच्चों को जन्म दिया। प्यारे- प्यारे, छोटे-छोटे! उस घर के अड़ोसी-पड़ोसी उसका और उसके बच्चों का खाने-पीने आदि का ख्याल रखने लगे। पर जैसे-जैसे उसके बच्चे बड़े होने लगे, उस मोहल्ले की शांति खत्म होने लगी। कुतिया और उसके बच्चे दिन-रात भौंकते रहते। किसी की समझ में नहीं आ रहा थ…

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स्वास्थ्यवर्धक रेनकोट

ठक्-ठक्...चिलचिलाती ग्रीष्म ऋतु से राहत देने, मै सुहावनी वर्षा ऋतु आपके घर की चौखट पर दस्तक दे चुकी है। टिप-टिप करती मेरी बूँदे वनस्पति व आपको राहत पहुँचा रही हैं। पर अफसोस! आज मेरी रिमझिम बरसती  बूँदों में आनंद देने की उतनी शक्ति नहीं रही, जितनी पहले होती थी। कारण कि दूषित पर्यावरण की वजह से आज मेरे साथ आते हैं, कई  संक्रमण और बीमारियाँ! पर इस बार बारिश में आप लोगों का स्वास्थ्य खराब न हो, इसलिए मैं चाहती हूँ कि आप मेरे आते ही ये स्वास्थ्य-रक्षक  रेनकोट ज़रूर पहन लें। आँखों का रेनकोट बरसात के मौसम में आँखों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस समय प्रकृति में तरह-तरह के वायरल सं…

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जो साध्य साध लेंगे, वे श्रेष्ठ बन सकेंगे…!

सर्वात्मा चेतना का जागरण साधना है। जो साध्य साध लेंगे, वे श्रेष्ठ बन सकेंगे। उज्जवल श्रेष्ठ साधक नवयुग ला सकेंगे। इनके सुसंगठन का अवतरण साधना है। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी द्वारा प्रेरित भजन की ये पंक्तियाँ स्वयं श्री महाराज जी के प्रमुख आदर्श को उजागर कर रही है। ... इन पंक्तियों में व्यष्टि से समष्टि तक की एक दिव्य यात्रा अंकित है। श्री महाराज जी का आह्वान है- पहले व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाओ। उसके देह-राज्य में व्यवस्था कायम करो। किस प्रकार? सर्वात्म यानी परमात्म-चेतना के जागरण से! ... ब्रह्मज्ञान की साधना से! ध्यान- साधना के अभ्यास से एक-एक व्यक्ति श्रेष्ठ व उज्जवल …

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नवयुग पुरस्कार समारोह!

नवयुग पुरस्कार समारोह! New Era's Award Ceremony जो उसका सहयोगी होगा,श्रेय वही तो पाएगा। युग उसके गुण गाएगा, युग उसके ही गुण गाएगा।। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी द्वारा प्रेरित ये पंक्तियाँ अवश्य ही सत्य सिद्ध होंगी। आने वाला  'नवयुग' उन श्रेष्ठ शिष्यों का यश-गान करेगा, जिन्होंने गुरुदेव के लक्ष्य की पूर्ति में तन-मन धन से, मन-वचन-कर्म से भरपूर सहयोग दिया। नि:सन्देह, उन शिष्यों को सारा विश्व सम्मान की दृष्टि से देखेगा व पुरस्कृत करेगा। तो आइए, एक झलक पाते हैं उस दिवस की , जब श्रेष्ठ  भक्त अपने श्रेष्ठ सहयोग के लिए श्रेय पाएँगे। नवयुग के बेस्ट (श्रेष्ठतम) शिष्य का अवार्ड (पुरस्क…

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कौन उठा सकता है भगवान आशुतोष को समाधि से?

वक्त है आया ऐतिहासिक वीरों जैसे बलिदान का, कार्यक्षेत्र में ध्यान रहा है जिन्हें गुरु के मान का। भक्ति भाव से ओत-प्रोत हो कुछ तो ऐसा कर जाएँ, सच्चे शिष्य बनकर के हम विजय पताका लहराएँ। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी द्वारा प्रेरित ये पंक्तियाँ हमारे सोए हुए शिष्यत्व को जागरण का नाद सुना रही हैं। उसे झकझोर कर उसके हाथों में विजय-ध्वजा थमा रही हैं। एक सच्चे शिष्य की पहचान बता रही हैं। क्या है यह पहचान? आइए, इसे... जानने के लिए हम एक पौराणिक पात्र के जीवन-दर्पण में झाँकेंगे। यह पात्र है- भगवान शिव का वाहन, गणों में परम गण- नंदी बैल! ... नंदी तीन आँखों वाला त्रिशूलधारी गण है।... 'त्…

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ठंडे मीठे शर्बत

आज के आधुनिक लोगों को छाछ, नींबू पानी, जलज़ीरा, शर्बत आदि भारतीय पारंपरिक पेयों का सेवन करने में लज्जा का आभास होता है। इसका कारण यह  है की उक्त पदार्थों का सेवन करने वालों को गरीब, पिछड़ा हुआ और असभ्य माना जाता है। बोतल बंद कोल्ड-ड्रिंक्स पीने में स्मार्टनेस समझी जाती है। पेप्सी, कोक, लिम्का, थम्स-अप, मिरीन्डा, फैंटा, ...बोतल बंद जूस  इत्यादि आज का युवा कभी भी और कहीं भी, कितनी ही मात्रा में पी सकता है। परन्तु ये पेय हमारे शरीर के लिए कितने हानिकारक हो सकते हैं, अब यह बात किसी से छिपी नहीं है। वैज्ञानिक शोधों ने यह पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि ये पेय हमारे शरीर में विष का काम करत…

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डाइनासोर तक शाकाहारी थे!

दिव्य ज्योति जाग्रति  संस्थान का दिव्य धाम आश्रम! कई वर्षो पूर्व, एक कॉलेज के कुछ उत्साही व जिज्ञासु युवा महाराज जी के दर्शन हेतु इस आश्रम में आए। उन्होंने महाराज जी के समक्ष अपने जीवन से सम्बन्धित बहुत-सी जिज्ञासाएँ एवं प्रश्न रखे। ... संवाद के अंतर्गत उन युवाओं ने कुछ प्रश्न शाकाहार व मांसाहार के सम्बन्ध में भी पूछे। संवाद के विशेषकर इसी अंश को इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है। युवा(क)- महाराज जी! आजकल एक नयी मूवी(फिल्म) आई है। यह पृथ्वी के सबसे विशालकाय जीव डाइनासोर पर फिल्माई गई है। इस फिल्म में, ये डाइनासोर पूरे का पूरा जानवर एक झटके में निगल  जाते हैं। इनक…

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बिना मरम्मत वास्तुदोषों से छुटकारा!

'वास्तु' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'वस्' शब्द से हुई है। 'वस्' अर्थात वास करना या रहना। अतः वास्तु शास्त्र व वास्तु कला का अर्थ हुआ- निवास योग्य भवनों का निर्माण करने वाली कला। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि आधुनिक सदी की इस कला की जड़ें वैदिक काल में हैं। पर क्या वैदिक वास्तुशास्त्र का उद्देश्य भी मात्र ऊँचे-ऊँचे भव्य भवनों का निर्माण करना था? या उसके भीतर उच्च वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश था? यह भी विचारणीय है कि क्या वास्तुदोषों से मुक्त आवास ही हमारी सुख-समृद्धि के लिए उत्तरदायी है? या फिर कोई ऐसा तरीका है, जिसे हम वास्तुदोषों के कंटकों को परिणत कर सकें? इन अनसुलझी …

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क्या मेरा डब्बू कुछ बन पाएगा?

' मेरा बच्चा जीनियस बने! हर कक्षा में टॉप करे! इसकी बुद्धि कुशाग्र हो! यह खूब प्रगति करे!...'- अपने बच्चों के लिए ऐसे ही अरमान पलते हैं न आपके दिल में! और इन ख्वाबों को हकीकत में बदलने के लिए आप हर संभव प्रयास भी करते हैं। अपने मित्रों, पडोसियों, सहकर्मियों इत्यादि से जानकारी इकट्ठी करते रहते हैं। फिर आपकी पूरी कोशिश होती है कि उन सभी फार्मूलों को अपने बच्चों पर फिट कर दें। है न! लेकिन इतना करने पर भी जब मनचाहे परिणाम देखने को नहीं मिलते, तो आपको टैन्शन सताने लगती है- 'पता नहीं, यह क्या करेगा? इसके साथ के सारे बच्चे आगे निकल जाएँगे और यह डब्बू ही रह जाएगा!' आप सभी अभिभावकों की इन…

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इन्द्रियों का दमन या मन का शमन!

सन् १९७० की शुरूआत थी। मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर वाल्टर मिशैल ने स्टैण्डफोर्ड युनिवर्सिटी में 'Delayed Gratification (विलंबित संतुष्टि)' पर एक प्रयोग किया। इस प्रयोग का उद्देश्य था- बच्चों में लुभावने प्रस्तावों का प्रतिरोध करने की योग्यता की जाँच करना। अपने इस अध्ययन के लिए मिशैल ने ४ से ६ वर्ष की आयु के बच्चों को चुना। ... इस प्रयोग के दौरान हर बच्चे को एक कमरे में ले जाया गया। वहाँ उन्हें एक कुर्सी पर बिठाया गया। फिर उनके सामने रखी मेज पर उनकी पसंदीदा मार्शमैलो (एक प्रकार की टॉफी) रख दी गई । ... इससे पहले कि वे अपनी ललचाती जीभ को संतुष्ट करते, शोधकर्ताओं ने उनके समक्ष दो विकल्प रख दिए। प…

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'मेड इन होम' प्रोडक्ट्स

दो मिनट बैठिए, आँखें बंद कीजिए! अब शांत दिमाग़ से अपनी दिनचर्या का आकलन कीजिए- सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, आप अपने शरीर तथा घर को स्वच्छ रखने के लिए किन- किन वस्तुओं का प्रयोग करते हैं? > कुल्ला करने के लिए कैमिकल से भरा माउथवॉश। >हाथ सॉफ करने के लिए कैमिकल से भरा साबुन या सैनिटाइज़र (हस्त-प्रक्षालक)। >चेहरा धोते समय कैमिकल से भरे फेस-वॉश... इस सूची का तो कभी अंत नहीं होगा। यदि घर की साफ-सफाई की बात करें, तो यहाँ भी हर जगह बस कैमिकल से भरे पदार्थों  का ही इस्तेमाल होता है। तो  चलिए, आज इन हानिकारक कैमिकल भरे प्रोडक्ट्स  की दुनिया से बहुत दूर चलते हैं और भरते है ज़िन्दगी क…

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२१वीं सदी में भगवान और भक्ति!

नमस्कार! मैं हूँ रंजन चौधरी।  आज हमारी टीम जिस विषय पर सर्वे करने के लिए लोगों के बीच उतरी है- वह बेहद दिलचस्प है।  आज का मुद्दा है- 'क्या २१वीं सदी में भगवान और भक्ति फैशन में हैं?' मेरे साथ अभिषेक तैयार हैं अपनी कैमरा टीम को लेकर।  ये लोगों की सोच हम तक पहुँचाएँगे। लोगों की विचारधारा … पर एक्सपर्ट राय देने के लिए हमारे साथ यहाँ स्टूडियो में एक खास मेहमान मौजूद हैं। अध्यात्म में पारंगत, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक व संचालक श्री आशुतोष महाराज जी के एक प्रचारक शिष्य। तो चलिये… … अभिषेक (एक युवा से)- भगवान और भक्ति- आप इन विषयों को २१वीं सदी में कौन-सा …

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मन रे! तू काहे न धरे धीरे?

क्या आप जानते हैं? १. थॉमस कारलाईल ने १८३७ में, कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद एक ग्रंथ की रचना की, जो उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है- 'फ्रांस की क्रांति का इतिहास'। परन्तु उनके एक दोस्त, जॉन स्टुअर्ट के नौकर की लापरवाही की वजह से उस पूरे ग्रंथ को आग लग गई। कोई और होता तो शयद वह न कर पाता, जो कारलाईल ने पूरे ग्रंथ को दोबारा से लिखा और साथ ही साथ उसमें दो नए खण्ड और जोड़ दिए। २. अमरीका के विख्यात जीव-विज्ञानी ओडुबन ने अपने पूरे जीवनकाल में पशु-पक्षियों के कई चित्र बनाए।  उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब उनके द्वारा बनाए गए २०० चित्रों को, जो उनके जीवन की पूँजी थी, चूहों ने कुत…

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चीन का ड्रैगन- मेड इन इंडिया!

…एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन के लंच ब्रेक के दौरान भारत के वैदिक विद्वान श्री देव गोस्वामी तथा चीन के साहित्यकार (मिस्टर चेन), धार्मिक पंडित (मिस्टर चिंग) व इतिहासकार (मिस्टर चाओ) के बीच एक रोचक बहस छिड़ जाती है। गोस्वामी जी प्रमाण सहित चीनी विद्वानों को समझाते हैं कि किस प्रकार चीन के इतिहास, दर्शन, साहित्य, कला, ज्ञान-विज्ञान का आधार भारतीय संस्कृति व संस्कार हैं- यहाँ तक कि चीन का राष्ट्रीय प्रतीक- 'ड्रैगन' भी मूल रूप से भारत का शेषनाग है।  आइये, आगे की चर्चा सुनते हैं- मिस्टर चाओ- आपके तर्कों को मानें तो, हमारी प्राचीन जीवन-शैली बहुत हद तक वैदिक ही रही होगी! हम बिल्कुल आ…

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गुणकारी दही!

दिन के खाने में यदि सूखी सब्ज़ी बनी हो, तो भोजन में कुछ कमी सी लगती है। पर उसी खाने के साथ आ जाए अगर दही या दही का रायता, तो खाने की पौष्टिकता और स्वाद दोनों में ही बढ़ोतरी हो जाती है। जल्द ही ग्रीष्म ऋतु दस्तक देने वाली है। ऐसे में अगर पीने को मिल जाए दही की लस्सी, जिसमें डला हो भुना हुआ जीरा, तो शरीर को कितनी राहत मिलती है! आह! भारतीय संस्कृति में दही को बहुत महत्ता दी गई है। यज्ञ, हवन, प्रसाद आदि मंगल कार्यों में दही का प्रयोग किया जाता है। ऐसा करने में एक सांकेतिक अर्थ यह भी है कि दही हमारे स्वास्थ्य को मंगलमय रखने में आवश्यक है।अमेरिका के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर बरनार इस त…

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अनेकता में एकता = संगठन

प्रकृति का ज़र्रा-ज़र्रा विविधता की ओर इशारा करता हैं।  कहीं आकाश छूते पहाड़ हैं, तो कहीं समतल मैदान; कहीं रेगिस्तान है; तो कहीं हरी-भरी उपजाऊ भूमि।  एक बगीचे को देखें तो हम पाएँगे कि वृक्षों की पत्तियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं।  वृक्षों पर फूल विभिन्न रंगों के खिलते हैं।  पशु एवं पक्षियों में भी भिन्नता पाई जाती है।  यदि मनुष्य की बात करें, तो यहाँ भी हर स्तर पर विविधता देखने को मिलती है।  हर व्यक्ति का अलग रंग, अलग भाषा, अलग रूप! … शायद इसी विविधता के कारण प्रकृति में खूबसूरती बानी रहती है।  परन्तु क्या मात्र विविधता होना ही काफी है? यदि गौर से देखा जाए तो हम पाएँ…

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क्या आप सूझवान हैं?

एक आधुनिक सोसाइटी मं सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था।  कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति का आधार- अध्यात्म का पक्ष रखने के लिए कमेटी के सभी सदस्यों ने एक विख्यात अध्यात्मविद् को आमंत्रित किया हुआ था।  उनका परिचय देते हुए, आयोजक महोदय ने सभी लोगों से अनुरोध किया कि वे अध्यात्म से सम्बन्धित अपनी जिज्ञासाएँ तथा विचार उनके सामने रखें।  तब एक सज्जन उठे और प्रश्न रखा- 'स्वामी जी, हममें से बहुत से लोगों को ऐसा लगता है कि हमारे ग्रंथों आदि की बातें बेहद जटिल हैं।  हमें कहाँ ये सब बातें समझ आने वाली हैं…।' स्वामी जी (मुस्कुराते हुए)- आपको यदि ऐसा लगता है, तो आज मैं उन्हीं गूढ़ …

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हाय! ये रूखी, बेजान त्वचा और बाल!

सर्दी का मौसम आ चुका है। इस मौसम में जहाँ शीत-लहर गर्मियों की बीमारियों को ले जाती हे , वहीं दूसरी ओर ले आती है -सूखापन। सर्दियों का समय ऐसा है, जिसमें हमारी त्वचा और बाल दोनों में नमी की कमी हो जाती है। परिणामस्वरूप हमें मिलती है,बेजान त्वचा और बाल। लेकिन आइए, इस बार इन सर्दियों में हम कुछ  ऐसे घरेलु नुस्खे अपनाएँ कि हमारे बाल और त्वचा दोनों ही स्वस्थ बने रहें। घरेलु विंटर हेयर केयर सर्दियों के मौसम में बालों का नैचुरल आयल ( प्राकृतिक तेल) इतना पर्याप्त नहीं होता कि वह बालों को खूबसूरत और मजबूत रख सके। शीत-लहर हमारे मस्तक की खाल को बहुत शुष्क कर देती है, जिससे दो जटिल समस्य…

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अपने लिए जीए, तो क्या जीए?

अनुजा- उठो अमित! जल्दी करो! ८.०० बज गए हैं। ऑफिस नहीं जाना क्या? अमित- उफ! आज बिल्कुल मन नहीं कर रहा। सारा शरीर टूट रहा है ... अनुजा- अरे, तुम तो बिल्कुल रिया की तरह बहाने बना रहे हो।  अमित- क्यों, हम पापा लोग नहीं थकते क्या? अनुजा- और हम मम्मियों को क्या?... अमित- अरे भई, आया कमला है तो... अनुजा- आया आया ही होती है। ... अमित (हँसते हुए)- मान लिया, श्रीमती जी! अब मेरे लिए क्या आज्ञा है? अनुजा- फिलहाल तो यही कि आप जल्दी से तैयार होकर नाश्ते के लिए आ जाओ। आज रिया को भी स्कूल छोड़ते हुए जाना है। अमित- ओ.के. मैडम! ...नाश्ते की टेबल पर... ... रिया (इतराकर)- नहीं! मुझे नहीं पीना दूध। नहीं जाना स्कूल। अनुजा- …

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असली अविष्कारक कौन?

पहली घटना... ...८ नवम्बर, १८९५ की घटना ... विल्हेल्म अपनी प्रयोगशाला में ... बेरियम प्लेटिनो-साइनाइड से पुती हुई स्क्रीन व क्रुक्स ट्यूब की सहायता से कैथोड किरणों पर अनुसंधान कर रहे थे।...  अकस्मात् हुई एक्स-किरण की खोज... दूसरी घटना... २८ सितम्बर, १९२८ का दिन था। ...फ्लेमिंग लम्बी छुट्टियों के बाद अपनी प्रयोगशाला में आए थे। अचानक उनकी नज़र स्लैब पर रखे हुए कुछ बर्तनों पर पड़ी। इनके तल में नीले-हरे रंग का पदार्थ जमा हुआ था। ... ...सम्यक् परिक्षणों के बाद समझ आया कि अकस्मात् पनपा यह पदार्थ तो एक जादुई दवाई है... इस तरह पैनिसिलिन विश्व की ...एक अभूतपूर्व खोज... तीसरी घटना... सन् १८७८... द…

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क्यों बँट गया परिवार?

आज है अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस! टीचर ने सब बच्चों से अपना फैमिली-ट्री बनाकर लाने को कहा था। सातवीं कक्षा के दो दोस्त रिंकु और निखिल भी तैयार थे अपने-अपने फैमिली ट्री के साथ। पर दोनों के फैमिली-ट्री में काफी अंतर था। रिंकु का फैमिली-ट्री एक बड़े से चार्ट पेपर पर भी समा नहीं पा रहा था। वहीं निखिल का फैमिली-ट्री एक छोटी सी ए-४ शीट पर ही आसानी से फिट हो गया था। पहले मास्टर रिंकु के बड़े से परिवार से मिलते हैं... बाप रे बाप! इतना बड़ा परिवार! आप चाहें तो इस परिवार में से क्रिकेट मैच की दोनों टीम बना सकते हैं। ... अब देखते है, निखिल के फैमिली-ट्री को। इसमें कोई चाचा-ताया-दादा-दादी नहीं ह…

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कर लो दुनिया मुट्ठी में!

'अरे, इस बेचारे को कुछ मत कहो। यह तो दीन-हीन, लाचार व कमज़ोर सा है... 'क्या आप अपने बारे में ये शब्द सुनना पसंद करेंगे?  नहीं! बच्चे तक खुद को कमज़ोर सुनना पसंद नहीं करते। तभी तो बचपन में जब भी हम खेलते-खेलते गिर जाते थे और रोने लगते थे, तो हमारे माता-पिता हमें उठाते हुए अक्सरां ये शब्द बोला करते थे-' अरे, जल्दी से उठो! ऐसे रोते नहीं है। कुछ भी तो नहीं हुआ। छोटी सी चोट है, जल्द ही ठीक हो जाएगी। रोते तो कमज़ोर लोग हैं, पर तुम कमज़ोर थोड़े न हो। तुम तो हमारे शेर बच्चे हो। बहादुर हो ...'इन शब्दों को सुनकर जैसे हमें नवीन उत्साह मिलता था और हम झट अपने आँसुओं को पौंछ कर फिर से खेल के मैदान में…

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भारत की बात सुनाता हूँ!

एयर इंडिया का हवाई जहाज़ अमेरिका से भारत की ओर उड़ान भर रहा है। इसमे बैठे हैं-जॉन रिचर्डसन। उनके मानस-पटल पर अंकित है, भारत की तस्वीर। ऐसी तस्वीर, जो अत्यंत पारम्परिक व रूढ़िवादी मान्यताओं के रंग से रंगी है। जॉन भारत को मात्र साँप- सपेरों वाला दरिद्र व कर्मकांडी देश मानते हैं तथा भारतवासियों को अंधविश्वास व काले जादू में उलझे लोग! कुछ ऐसे ही दृष्टिकोण के साथ जॉन रिचर्डसन अपने मित्र डॉ. प्रणव दास के आमंत्रण पर भारत आ रहे हैं। डॉ.प्रणव भारतीय इतिहास व दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उनका उद्देश्य जॉन को भारत का कराना है। ताकि जॉन भारत के वास्तविक स्वरूप व संस्कृति से परिचित ह…

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ठक्-ठक्! क्या ईश्वर है?

क्या ईश्वर है या नहीं है? क्या ईश्वर कल्पना में गढ़ी एक कृति है या फिर इस विश्व का सृष्टा व नियामक तत्व है? क्या ईश्वर मूढ़, अशिक्षित व असभ्य लोगों के भय और अज्ञान का परिणाम है या सभ्य वैज्ञानिक समाज के तकनीकी यंत्रों और पहुँच से बाहर की कोई ऊँची, सूक्ष्म, दिव्य सत्ता है? इन प्रश्नों का उत्तर जब भी खोजना चाहा, समाज दो वर्गों में बंट गया- आस्तिक व नास्तिक। नास्तिक सिरे से ईश्वर को नकारता है, उसकी सत्ता पर प्रश्नचिह्न उठाता है। वहीं आस्तिक ईश्वर में गहरी आस्था व विश्वास रखता है। उसके होने के अनेक दृश्य व अदृश्य प्रमाण समक्ष रखता है। इस विषय-वस्तु को दृष्टि में रखकर प्रस्तुत है एक…

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आप को आपके उसूलों ने क्या दिया!

एक बिज़नेस टाइकून (बहुत बड़े उद्योगपति) ने एक शानदार पार्टी आयोजित की। पार्टी-हाल का हर कोना स्वर्ग को भी मात दे, इस बखूबी अंदाज़ से सजाया गया था।... उस पार्टी में उस राज्य की ही नहीं, देश की ही नहीं, विदेशों की भी दिग्गज हस्तियाँ मौजूद थीं।... पर इस पार्टी हाल के एक कोने में लगी एक टेबल पर मास्टर शंकर बैठे थे, जो वहाँ उपस्थित सभी लोगों से कुछ अलग थे। सादा लिबास! चेहरे पर शांति! होठों पर मुस्कान! उम्र भी कुछ 50-60 के बीच की होगी।... वे वहाँ थे ही नहीं। उनका मन 28 साल पहले की दुनिया की सैर कर रहा था। उनके ह्रदय- पटल घूम रहे थे वे द्श्य, जब वे उस राज्य के सबसे नामी-गिरामी स्कूल ' अभ्युदय' में हि…

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साधना करनी है,करेंगे ही!

प्रिय साधकों! एक बार गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी से किसी ने कहा था- 'महाराज जी, साधना करने का न हमें समय मिलता है, न उसमें हमारा मन लगता है।' उत्तरस्वरूप श्री महाराज जी ने ये पंक्तियाँ कहीं- ऐसा कहने से काम नहीं चलने वाला। साधना के लिए निश्चयात्मक बुद्धि बनानी है।... ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देकर श्री महाराज जी ने हमारे भीतर 'साध्य' या 'ध्येय' भी प्रकट कर दिया है। ... ध्यान-साधना करने के लिए पूरा मंच तैयार है। फिर इंतज़ार किस बात का? आलस्य कैसा? ... महापुरुष कहते हैं- ततु गिआनु लाई धिआनु दृष्टि समेटिआ अर्थात् भृकुटि में दृष्टि को समेटने या एकाग्र करने से ही तत्वज्ञान पर आध…

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कभी- कभी ऐसा भी करना चाहिए...

इस माह 'सफल जीवन के सूत्र' का यह खण्ड जिन सूत्रों की विस्तृत जानकारी आपको देगा, वे इस प्रकार हैं- ज़िन्दगी में हारना बेहद जरुरी है। साथ ही, आपको गिरना, क्रोध करना, संकोच करना और लालच करना भी आना चाहिए। इतना ही नहीं, ज़ेन दर्शन के कथनानुसार- जो भी करो, पूरी तरह यानी अच्छी तरह करो... तो इसका मतलब हुआ-हारो, तो पूरी तरह हारो; संकोच करने में ज़रा सा भी संकोच मत करो; क्रोध भी अच्छी तरह करो; गिरो, तो शान से गिरो; लोभ भी आधा अधूरा नहीं, बल्कि भरपूर मात्रा में करो। चौंकिए मत! न तो आपके पढ़ने में कोई गलती हुई है, न हमारे लिखने में। बस, ठीक से समझने की ज़रूरत है। यह सच है कि हमारे प्रयास हमेशा ऐसे हो…

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दीवाली की शुभ-कामनाएँ कैसी हों?

आप सभी को ग्लोबल दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ! बधाई देने का यह अंदाज़ कुछ नया लगा होगा आपको! इस बार हम आपके लिए दीवाली पर ऐसी एक नहीं, कई नई शुभकामनाएँ लाए हैं।... सबसे पहले ग्लोबल दीवाली की बात करते हैं।... यह पर्व सिर्फ भारत में ही नहीं... नेपाल, ब्रिटेन, इंडोनेशिया, ... सिंगापुर, थाईलैंड आदि कई देशों में इस पर्व को उत्साह और उल्लास से मनाते हैं। ... सिंगापुर, फिजी इत्यादि कितने ही देशों में तो इस दिन राष्ट्रीय अवकाश रखा जाता है। इस दिन बहुत से देश नई डाक-टिकट भी जारी करते हैं। इस पर्व से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर रिसर्च करने के लिए प्रत्येक वर्ष IRC आयोजित की जाती है, जिसमें अनेक देशों क…

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मैं! मैं! मैं! The Journey from 'i' to 'I'

… एक इंसान अपनी यात्रा 'मैं' से शुरू करता है।  'मैं' में ही जीता है, पलता है और बढ़ता है।  मैं, मेरा, मुझसे … इन्हीं दिशाओं को पकड़कर आगे चलता है।  'मैं' के कारण ही वह पल-पल मरता है और मारता है। ऐसे ही एक इंसान की 'मैं' यात्रा ग्रीक दर्शन हमारे सामने रखता है।  इस इंसान का नाम था- नार्सिसस। लेकिन इसके विपरीत भारतीय दर्शन भी एक अद्भुत यात्रा उजागर करता है, जो क्षुद्र अहंकार 'मैं' से शुरू होकर विराटतम 'मैं' में प्रवेश कर जाती है।  अखण्ड -ज्ञान इस लेख द्वारा आपको दोनों ही यात्राओं का यात्री बना रही है। तो चलें? … नार्सिसस अपने भरपूर यौवन में था।  असाधारण रूप …

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स्वतंत्रता क्रांति के ऋषि-तपस्वी!

तेरे ही वास्ते आलम में हो गए बदनाम, तेरे सिवा नहीं रखते किसी से हम कुछ काम।  वतन! न दे हमें तर्के वफा का तू ,इल्ज़ाम, कि आबरू पे तेरी निसार हो गए सरेआम। यह जलता हुआ समर्पण-गीत एक क्रांतिकारी ने लिखा था। लेखन का स्थान कोई खूबसूरत वादियाँ नहीं थीं। ब्रिटिश हुकूमत की जेल की एक काल-कोठरी थी। ज़ाहिर है, यह गीत किसी आशिक द्वारा अपनी माशूका के लिए नहीं रचा गया था। एक सच्चे सपूत ने इसे अपनी माँ भारती को समर्पित किया था।  स्वतंत्रता संग्राम का भी वह क्या दौर था! भारत के छड़े नौजवान सपूत बड़े-बड़े तापसी ऋषि बन गए थे। ऐसे क्रांतिकारी ऋषि, जिन्होंने घोर वनों, कन्दराओं और हिम-शिखरों पर दुर्…

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क्या बहन के कामना करने से भाई आयुष्मान हो जाता है?

भारतीय संस्कृति की अद्वितीयता ही है यह! एक धागे के बल पर रक्षा का वचन जीत लेना! एक मंगल- सूत्र की ताकत पर आजीवन सम्बन्ध-बंधन में बँध जाना.... इन्हीं संस्कारों का सबसे प्रखर रूप देखने को मिलता है- रक्षा- बंधन के त्यौहार में! सूर्य-चन्द्राधारित भारतीय पंचांग के अनुसार 'श्रावण' महीने की पूर्णमासी को यह पर्व सकल भारतवर्ष में मनाया जाता है, विशेषकर उत्तर व दक्षिण भारत में।  इसलिए इसे 'राखी पूर्णिमा' या 'श्रावण पूर्णिमा' भी कह देते हैं। हर प्रांत में इसका परम्परागत स्वरूप लगभग एक जैसा  ही है।  बहन अपने सगे या ममेरे-चचेरे-फुफेरे-मौसेरे या धर्म भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र (…

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उपवास- एक उत्तम औषधि!

आज तक आपने 'सेहत सार' के इस खण्ड में कई बार भोजन व उससे सम्बन्धित विभिन्न पहलुओं को पढ़ा है। आपने बहुत से भोज्य पदार्थों व उनके सेवन  से दूर होने वाली विभिन्न बीमारियों की जानकारी प्राप्त की है।  किन्तु इस बार हमारा इरादा भोजन या खाद्य पदार्थों के बारे में न बताकर आपको भूखा रखने का है। क्यों? क्या हुआ? अरे, घबराइए नहीं, ये भूखा रहना आपके लिए प्राण-घातक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-वर्धक होगा।  अब तक आप समझ ही गए होंगे कि हम किस विषय की बात कर रहे हैं।  जी हाँ- उपवास की! क्योंकि उपवास से जहाँ व्यक्ति स्वयं को तंदरुस्त रख पाता है, वहीं अनेक रोगों का इलाज मात्र उपवास द्वारा ही संभ…

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परदेसी हृदयों में गुरु भक्ति की गूँज

तुम्हारे गुरु का ओहदा क्या है? -लू, चीन ऐसा कहा जाता है कि कन्फ्यूशियस की शरण में बहुत से शिष्य आए। पर जूमा चेन (चीनी इतिहासकार) के अनुसार,कन्फ्यूशियस  ने एक बार कहा था- 'बेशक मेरे पास बहुत से लोग आए, मेरे शिष्य बनने के लिए। लेकिन, उन हज़ारों में से बस मुट्ठी भर ही ऐसे थे, जिन्हें सचमुच मैं अपना शिष्य कह सकता हूँ। क्योंकि केवल उन्होंने मेरे उपदेशों को वैसे ही लिया, जैसे मैं उन्हें देना चाहता था। मेरे आदर्शों को वैसे ही जिया, जैसे मैं उन्हें जीते देखना चाहता था।' अहोभाग्य उन शिष्यों का, जिनके शिष्यत्व पर गुरु सफलता की मुहर लगा दें। जिन्हें गुरु अपना बना लें और जो सचमुच अपने गु…

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साधक-उपनिषद्

जिज्ञासा महाराज जी, काफी समय से मेरा मन बहुत दुःखी व बेचैन रहता है। मैंने सोचा था कि  जीवन में कुछ बदलाव करके शांति को पा सकूँगा।  पर असफल रहा।  क्या करूँ? मार्ग दिखाएँ। महाराज जी- कैसी विडम्बना है! एक इंसान घर बदल देता है, वस्त्र बदल लेता है, नौकरी बदल देता है, मित्र बदल लेता है; लेकिन वह नहीं बदलता, जो उसके  दुःख़ की जड़ है-उसके …  ।  … इसलिए आहार-विहार बदलने से क्या होगा! अपना आचार-विचार बदलें। … जिज्ञासा गुरु महाराज जी, जीवन पर कदम-कदम पर चुनाव है। कई विकल्पों  में से किसी एक को  चुनना पड़ता है। हम हमेशा सही चयन कर सकें, ऐसा मार्ग बताएँ। महाराज जी- जब एक सांसारि…

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अपनी-अपनी सीढ़ी है, तुलना करना बंद करो!

भौतिक संसार में एक उक्ति की अक्सर चर्चा होती है-'क्रॅब मेनटॅलिटी'- केकड़ा प्रवृत्ति! केकड़े एक-दूसरे की उन्नति से जलते हैं। इसलिए जब एक केकड़ा ऊपर चढ़ने लगता है, तो दूसरा उसकी टाँग खींचकर उसे नीचे घसीट लेता है। सांसारिक संगठनों में यह प्रवृत्ति इसलिए भी देखने को मिलती है, क्योंकि सभी कर्मचारियों के पास ऊँचा उठने का एक ही मार्ग, एक ही सीढ़ी होती है। लेकिन सज्जनों! गुरु-भक्तों का तो संसार ही निराला है। यहाँ सबकी मंज़िल तो एक ही है-गुरु! पर उस तक पहुँचने की सीढ़ी सबके पास अपनी-अपनी है; अलग-अलग है. हर साधक या गुरु-भक्त, अपनी-अपनी गति से अपनी-अपनी सीढ़ी चढ़कर सदगुरू तक पहुँचता है…

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कैसे बनें आकर्षण का केन्द्र?

क्या आप सफल लोगों की सूची में अपना नाम लिखवाना चाहते हैं ? क्या आप चाहते हैं कि आप जहाँ भी जाएँ, लोग सम्मान  के साथ आपका स्वागत करें? क्या आप घर, ऑफिस  व हर स्थान पर आकर्षण का केन्द्र बनने की इच्छा रखते हैं? यदि उत्तर 'हाँ' है, तो यह लेख पढ़ने का कष्ट  जरूर करें।  हाल ही में हुई एक रिसर्च से यह पता चला है कि किसी भी व्यक्ति की १५% सफलता उसके तकनीकी ज्ञान पर निर्भर करती है, जबकि ८५%सफलता उसके व्यवहार पर निर्भर करती है। यह लेख आपसे बिना कोई फीस लिए आपको व्यवहार  की यही कला सिखाएगा, जबकि जॉन  डी. ने कहा था- 'मैं इस कला के लिए दुनिया की किसी भी चीज़ से ज़्यादा कीमत देने के लिए तै…

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एक प्राचीन गुरुकुल की दिनचर्या!

आज जहाँ सुविधाओं व माडर्नाइज़ेशन के संबंध में हमारा ग्राफ प्रगति दर्शाता है, ऊर्ध्वगामी है; वहीं स्वास्थ्य के संबंध में यह ट्रेंड एकदम उलट है।  कहने का मतलब कि मनुष्य की सेहत, शक्ति, ऊर्जा व कार्य करने की क्षमता में निरन्तर गिरावट पाई जा रही है।  इस गिरावट की एक मुख्य जड़ है-हमारी गड़बड़ाती दिनचर्या। इस गड़बड़ी को समाप्त करने तथा अपने आर्य-पूर्वजों जैसा स्वास्थ्य व पुष्ट शरीर पाने के लिए हम आपको उन्हीं की एक वैदिक शाला में लेकर चलते हैं।  यह एक वैदिक कालीन गुरुकुल है, जहाँ छात्रगण अपने आचार्य के निर्देशानुसार स्वस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं।  आइए, हम भी उनके साथ स्वास्थ्य स…

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बच्चों की परवरिश उत्तम बागवानी है!

प्रिय माताओं-पिताओं! आज आप बहुत चिंतित हैं।  किसलिए? यही सोचकर कि हम अपने बच्चों को- कितना बैंक बैलेंस दे पाएँगे? कैसे रिश्ते दे सकेंगे? कैसा भविष्य उनके लिए निर्धारित करेंगे? कैसा समाज उन्हें देंगे? कैसा वातावरण, कैसी प्रकृति उनके लिए छोड़ेंगे? कितनी सारी चिंताएं हैं न हमें? पर क्या कभी यह चिंता भी की है कि हम अपने बच्चों के रूप में- भविष्य को क्या सौंपेंगे? भावी समाज को कैसे नागरिक देंगे? प्रकृति को उसके रक्षक देंगे या भक्षक देंगे? राष्ट्र को कैसे वासी देंगे? मानव-संस्कृति को क्या धरोहर देंगे? दरअसल, परवरिश का दायित्व अपने बच्चों के लिए सिर्फ 'अधिकार' जुटाना नही…

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फोटो की सजावट!

सूर्य अस्त होने को था।...  पर जैसे-जैसे ऊपर आकाश में सूर्यदेव का प्रकाश मंद होता जा रहा था, वैसे- वैसे धरती पर मशहूर बाज़ार की दुकानों में रोशनी ज़ोर पकड़ रही थी।... इसी बाज़ार के आकर्षण का केन्द्र था, दूसरी मंज़िल पर बना फोटो स्टूडियो। बाज़ार की अलग-अलग आवाज़ों के बीच उस स्टूडियो के मालिक को अचानक किसी के खाँसने की आवाज़ सुनाई दी।... एक बहुत बूढ़े बाबा उसी स्टूडियो की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे थे।...  फोटोग्राफर ने भाग कर उन बाबा को अपने हाथों से थामा और धीरे-धीरे ऊपर चढ़ाकर स्टूडियो की कुर्सी पर लाकर बैठा दिया। बाबा ने थोड़ी साँस ली, फिर अपने फटे-पुरा…

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आया मौसम कूल-कूल पीने का!

मई का महीना-गर्मी जोरों-शोरों से दस्तक देने लगी है। कड़कती धूप, उच्च तापमान, लू के थपेड़े, सूरज की चुभती किरणें- शरीर को तपाने और सुखाने लगती हैं। मानव शरीर का सारा पानी ही सोख लेती हैं। अत्यधिक पसीना आने से शरीर में नमक और अन्य पोषक तत्त्वों की भी कमी हो जाती है। ऐसे में कई बीमारियाँ शरीर पर हमला बोलने को तैयार रहती हैं।  परंतु घबराइए मत, 'सेहत सार' के इस खण्ड में हम आपके लिए लेकर आए हैं, इस भीषण गर्मी के चक्रव्यूह को भेदने वाले अमोघ बाण! ये बाण हैं- ताज़े और शीतल पेय पदार्थ... गर्मी को मात देने के लिए इनसे अधिक गुणकारी और पोषक पदार्थ नहीं हो सकते। ये पेय पदार्थ मात्र शरीर में …

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वैज्ञानिकों की सफलता के रहस्य!

न्यूटन, आइंस्टीन, डार्विन, ..., जगदीश चन्द्र बसु,... इन सब वैज्ञानिकों के नाम पढ़ते या सुनते ही याद आ जाती हैं, इनसे जुड़ी खोजें व आविष्कार। स्मृति पटल पर उभर आते हैं, वे पुरस्कार व उपाधियाँ जिनसे इन्हें सम्मानित किया गया।  पर क्या कभी हमने विचार किया कि कैसे ये साधारण व्यक्ति से सफल वैज्ञानिक बन गए? ऐसी इनमें क्या विशेषताएँ थीं, जिसके कारण इनका नाम इतिहास के पन्नों पर हस्ताक्षर बन गया? आइए, इनकी जीवन-गाथा से कुछ ऐसे दृष्टांतों को चुनते हैं, जो हमें सफल होने के सूत्र दे जाएँ... गज़ब की सहनशक्ति! न्यूटन का एक पालतू कुत्ता था- डायमंड।  हालाँकि वह बहुत शरारती था, पर न्यूटन का दुलारा था…

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परम संवाद!

जिज्ञासा मनुष्य के स्वभाव का सहज अंग है। दो-तीन वर्ष का बालक आदि जिसने अभी ठीक से बोलना ही शुरू किया है, वह भी अपनी माँ से अनेक प्रश्न करता है। जैसे कि- 'माँ, इस खाली बाँस में फूँक मारने से आवाज़ क्यों आती है? मेरी छोटी सी यह कार स्टार्ट बटन दबाते ही तेज़ी से क्यों दौड़ पड़ती है? सूरज गोल क्यों हैं?... इत्यादि।' जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, इस प्रश्न बैंक में और भी ज़्यादा क्यों, कैसे और क्या जमा होते जाते हैं। इतिहास साक्षी है कि मनुष्य की इसी जिज्ञासा प्रवृत्ति ने उसे वनस्पति प्राणी जगत व  ब्रह्माण्ड संबंधित अनेकानेक गुत्थियाँ सुलझाने की ओर अग्रसर किया। परन्तु दुर्भाग्यव…

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फास्ट फूड बैड या गुड!

रोटी, दाल, सब्ज़ी, फल, दूध, लस्सी आदि- ये सब फूड आइटम तो आजकल की युवा पीढ़ी के लिए आउटडेटिड हो चुकी हैं। इन पदार्थों के डाइनिंग टेबल पर आते ही युवा नाक-मुँह सिकोड़ने लगते हैं। पर वहीं अगर फास्ट फूड आइटम्स जैसे- बर्गर, पीज़ा, नूडल्स, मोमोज़ इत्यादि परोसे जायें, तो उनके चेहरे पर मुस्कान खिल जाती है। मुँह में पानी भर जाता है और मुख से स्वर फूट पड़ते हैं- 'वाओ! इसे कहते हैं भोजन!' लेकिन आधुनिक युग में पसंद किया जाने वाला यह फास्ट फूड वास्तव में कितना जंक है, इसका अंदाज़ा इन युवाओं को तो क्या- आप बड़ों को भी नहीं होगा। इसलिए हमने इस माह अखण्ड ज्ञान के मंच पर कुछ फास्ट फूड पदार्थों को आम…

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बॉडी लॅंग्वेज- मूक भाषा!

अध्ययनों व शोधों द्वारा यह पाया गया कि सामने वाले व्यक्ति पर हमारे शब्दों और लहज़ों का प्रभाव ४५% होता है, जबकि बॉडी लॅंग्वेज का प्रभाव ५५% होता है। कहने का मतलब कि हम बिना कुछ बोले ही बहुत कुछ कह जाते हैं। ...भारत के शास्त्रीय नृत्यों की बात करें, तो उनमें तो मात्र हाव-भावों व मुद्राओं द्वारा ही संपूर्ण कथा या दृष्टांत का मंचन कर दिया जाता है। वाद्यों से झरते संगीत के साथ नर्तकी अपने हाव-भावों व मुद्राओं के माध्यम से पूरी की पूरी कहानी दर्शकों के सामने प्रस्तुत कर देती है। इस कला का सबसे सुन्दर उदाहरण- भरतनाट्यम् है।… वास्तव में, ये सब चिह्न-मुद्रायें है क्या? आइए, इन्हें …

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अटल विश्वास- वे आएँगे!

सूखे ठूँठ से वृक्ष! पीली लताएँ मानो सूखी फूलमालाओं की तरह लटकी हों! भूमि ने भी भूरी चादर ओढ़ ली थी! ...वायु विरहनी हो चली थी, मानो उससे प्राणवायु ही छीन ली हो। ...वन में पतझड़ की धाक! न कहीं फूल खिलते थे, न कली फूटती थी। यदि पेड़- पौधों का कोई श्रृंगार था,तो काँटों के आभूषण!क्या ऐसे पतझड़ को भी कोई बसंत का स्वप्न दिखा सकता है? ...क्या सूर्य, चन्द्र और कृत्रिम प्रकाश के अभाव में भी कोई निरंतर अंधकार से लड़ सकता है? जी हाँ! नि:संदेह! एक भक्त का जीवन इन सब प्रश्नों का उत्तर है। ... ऐसे ही जीवन की स्वामिनी थी- शबरी! सबूरी कहें या शबरी- दोनों एक दूसरे के पूरक थे! वर्षों व्यतीत हो गए... परन्तु शबरी का …

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सोचो, कभी ऐसा हो, तो क्या हो?

जब कभी भी आपके चाचाजी अपसे मिलने आपके घर आयें, आपने नीले रंग की ही ड्रेस पहनी हो! आप दो साल बाद राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली से जयपुर जा रहे हैं। आपको अपनी साथ वाली सीट पर वही यात्री बैठा मिले, जो दो साल पहले मिला था! आप एक सेमिनर में गए। वहाँ उपस्थित १५ लोगों में से १० का नाम अजय हो! आपका और आपके बेटे का जन्मदिन एक ही दिन हो।...  ऐसी कोई-न-कोई घटना, कभी-न-कभी हम सभी के जीवन में घटती है। हम इसे हँसकर या उदास होकर संयोग कह देते हैं। ...शब्दकोश की परिभाषा के अनुसार यदि दो या दो से अधिक घटनायेँ या स्थितियाँ समय, स्थान द्वारा संबंधित हों, परन्तु उनके इस संबंध के पीछे…

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समाधि- राजविद्या राजगुह्यं!

गत दिवसों में एक विषय को सनसनी अथवा रहस्य के तौर पर समाज में प्रसारित किया गया। वह विषय है-समाधि! वास्तव में, समाधि कोई रहस्य नहीं, एक अत्यंत आलौकिक या पारलौकिक अवस्था है जो देहातीत है, मंन-बुद्धि से अतीत है, जिसकी तुलना में मानव की विचार शक्ति और विज्ञान के संसाधन नितांत बौने हैं। प्रस्तुत लेख द्वारा हम समाधि के यथार्थ स्वरूप को प्रकाशित कर रहे हैं। वास्तव में क्या है समाधि? योग ऋषि पतंजलि जी ने अष्टांग योग सूत्रों में मानवीय चेतना के उत्तरोतर विकास को दर्शाया है। एक आध्यात्मिक साधक का आत्मिक विकास सात चरणों (यम, नियाँ, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान) से गुज़ा…

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किसका नववर्ष

हम सभी काल के साक्षी हैं। हमने काल को व्यतीत होते हुए देखा व अनुभव किया है। पाश्चात्य सभ्यता १ जनवरी से ३१ दिसम्बर तक के अंतराल को एक वर्ष मानती है। इसी क्रम में अपनी शताब्दियाँ सहस्त्राब्दियाँ निर्धारित करती है। पर भारतीय संस्कृति का काल-ज्ञान विज्ञानों का विज्ञान है। उसके अनुसार काल (समय) तो अनादि है. सर्वथा अविभाज्य तथा सूक्ष्मातिसूक्ष्म है भारतीय ऋषियों-महर्षियों ने अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा के द्वारा काल के सूक्ष्म-तत्त्व एवं रहस्य को ज्ञात कर लिया था। ... ... कालगणना सम्बन्धित भारतीय पद्धति के मूल-तत्त्व आज भी विज्ञान द्वारा प्रमाणित हैं। तर्कसंगत और प्रासंगिक हैं।…

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' न अब के' और 'न तब के'!

'अभी नहीं, तो फिर कभी नहीं'- इसका तात्पर्य क्या समझते हैं? जी हाँ! हमें पूरा विश्वास है कि आप इन शब्दों को बहुत अच्छे से समझते होंगे, क्योंकि इन शब्दों से तो सभी का बहुत पुराना याराना है। पर आपको कैसा लगेगा, अगर हम कुछ इस प्रकार कहें- 'अब का, तब का; अब का, न तब का!' कुछ समझे आप? नहीं न! तो चलिए, इस पहेली को समझने के लिए देखते हैं कि अकबर के दरबार में क्या हो रहा है? अरे... अरे यहाँ तो आज बीरबल दिखाई ही नहीं दे रहे हैं! ओह! फिर दरबार में वार्ता का मज़ा कैसा आएगा? भला आज कौन देगा बादशाह के प्रश्नों के उत्तर? दिखने को, हैं तो बहुत सारे लोग- कुछ विद्वान, तो कुछ सूझवान! कुछ मेहमान, तो कुछ मेज़बान! ले…

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प्रतिभावान कैसे बनें?

२२ दिसंबर, १८८७... मद्रास का एक छोटा-सा शहर इरोड... यहाँ के एक बहुत ही गरीब परिवार में एक बालक ने जन्म लिया।  इस बालक का बचपन साधनविहीन था।  वह पढ़ने-लिखने में भी कमज़ोर था।  इसी कारण उसे अगली कक्षा में प्रवेश भी बड़ी मुश्किल से मिल पाता था। जब वह बालक १५ वर्ष का हुआ, तो उसका स्कूल ही छूट गया और पढ़ाई पूरी तरह से बंद हो गई। संभव है, ऐसी परिस्थितियों में कोई भी निराशा का दामन पकड़ लेता।  परन्तु ऐसे में इस बालक को कहीं से गणित की एक पुस्तक मिल गई।  जाने उसको कैसी लगन लगी, उसने इस पुस्तक को अपनी जीवनसंगिनी बना लिया।  उसके माध्यम से गणित का अभ्यास करना प्रारम्भ कर दिया।  अपने रात-दिन…

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बंदर से इंसान तक या इंसान से भगवान तक!

हमारी यह धरा विविध प्रकार के रंग-रूप वाले फल-फूल, पशु-पक्षी आदि लाखों जीवों की गृहस्थली है। यह विविधता और इंद्रधनुषी विभिन्नता- सृष्टि की बगिया में भिन्‍न-भिन्‍न फुलवारी कैसे आई? उत्तरस्वरूप विज्ञान-जगत ने अपना मत रखा, चार्लस डार्विन के विकासवाद के रूप में। विकासवादी डार्विन इस विविधता का आधारभूत कारण सृष्टि में व्याप्त एक आरोहण क्रम को बताते हैं। ... इसी कारण एक-कोशिकीय से बहु-कोशिकीय जीव, सरल से जटिल संरचनायेँ, विभिन्न रूप वा क्षमता वाले जीव प्रकृति की अचेतन ऊर्जा शक्ति से गठित होते गए। एक लम्बी समयावधि के बाद, इसी प्रक्रिया द्वारा अंततः 'मनुष्य' की रचना हुई।  ... …

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बातचीत करना भी एक कला है!

यह प्रयोग है १३वीं शताब्दी का, जिसे रोम के राजा फ्रेडरिक ने नवजात शिशुओं पर किया था। फ्रेडरिक ने अपने राज्य में पैदा हुए कुछ नवजात बच्चों को ऐसी परिस्थिति में रखने का आदेश दिया, जहाँ पर उनसे कोई भी बात नहीं कर सकता था। बच्चों की देखभाल के लिए दासियाँ तो थीं, पर वे न बच्चों से और न ही आपस में बात कर सकती थीं। बच्चों के आसपास के माहॉल में सिर्फ चुप्पी ही होती थी।. दरअसल ऐसा प्रयोग करके राजा यह जानना चाहता था कि इंसान की वास्तविक भाषा क्या है? इस प्रयोग से मनुष्य की मूल भाषा तो सामने नहीं आई। पर जो परिणाम सामने आया, वह अति भयंकर था। जिन बच्चों को बिना बातचीत वाले माहौल  में रखा गय…

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मुरझाई कलियाँ! (बाल-मज़दूरी की तपिश में कुम्हलाता बचपन!)

सच... किस तरह बाल-मज़दूरी की समस्या बद से बदतर होती जा रही। बच्चे- जिन्हें राष्ट्र का भविष्य कहा जाता है- आज उनकी बेहद दारूंण स्थिति हो चुकी है। छोटे-छोटे बच्चों से मज़दूरी करवा कर उन्हें शोषित किया जाता है। इस गंभीर स्थिति में सुधार व बदलाव कैसे लाया जाए- इसी खोज में निकले हैं, बाल-मज़दूरों के करूण क्रंदन से व्यथित एक योगी पुरुष तथा उनके संग समाजशास्त्र के दो शोधकर्ता मित्र- अभिनव और अखिलेश। ... योगी पुरुष- यदि बाल-मज़दूरी को समाज से हटाना है, तो इसके लिए हमें सबसे पहले समस्या के मूल कारण तक पहुँचना होगा। कारण पहचान कर फिर उसे जड़ समेत समाज की भूमि पर से उखाड़ फेंकना होगा। ताकि,…

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गणपति सहित धन-लक्ष्मी का पूजन करें!

वनवास काल में यक्ष ने युधिष्ठिर से एक प्रश्न पूछा था- 'मृतः कथं स्यात् पुरुषः' अर्थात् कौन पुरुष मरा हुआ है? उत्तरस्वरूप  युधिष्ठिर ने अद्भुत उत्तर दिया- ... एक दरिद्र पुरुष मरा हुआ है। भारत के एक कुशल महामंत्री चाणक्य से किसी ने पूछा- 'शून्यता क्या है?' उत्तरस्वरूप उन्होनें अपने अर्थशास्त्र में एक महावाक्य गढ़ दिया- 'सर्व शून्य दरिद्रताम्' अर्थात् एक दरिद्र के लिए सकल संसार शून्य है। ... धन के अभाव का प्रभाव ... इतना भीषण! इतना दारुण! यहीं कारण है कि हमारी संस्कृति में 'धन-संपदा' को एक मुख्य देवी कि उपाधि दी गई- 'महामाई लक्ष्मी'! दीपावली पर्व पर 'पूजन'  की एक परम्…

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मिस यूनिवर्स क्या बनना?

प्रश्न: गुरु महाराज जी, आपके चरणों में कोटि-कोटि नमन! मैंने सुना है कि आपके दरबार में वो महान इच्छा भी पूरी होती है, जो किसी और दरबार में पूरी नहीं होती। आप जिज्ञासुओं को ईश्वर-दर्शन का दुर्लभ वरदान प्रदान करते हैं। उस इच्छा के आगे मेरी इच्छा तो बहुत छोटी-सी है। मुझे आशा है कि आप उसे ज़रूर पूरा करेंगे। महाराज जी, आप मुझे आशीर्वाद दें कि मैं एक अच्छी मॉडल और फिर आगे चलकर मिस यूनिवर्स बन सकूँ। समाधान: ... हमारी दृष्टि में नारी का पद अत्यंत गरिमापूर्ण, पवित्र व महिमामयी है। पर विडम्बना है कि वर्त्तमान में नारी स्वयं ही अपना यह स्वरुप व गौरव भूल गई है। स्वतंत्रता व मॉडर्नाइजेशन की अ…

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जागो! जागो! सुबह हो गई!

सुबह के पांच बजे। टिनी नीनी टिनी नीनी ... विनीत का अलार्म बजा। 'टिनी नीनी' सुनकर उसने झट से अलरम को बंद किया और दूसरी तरफ करवट बदल कर सो गया। यह तो था, अलार्म बजने पर विनीत का रिएक्शन! कहीं आप भी तो ऐसा ही नहीं करते? यदि आप भी सुबह अपने बिस्तर को देर से अलविदा कहते हैं, तो सावधान! घड़ी या मोबाइल के अलार्म को नज़रअंदाज़ करने का मतलब है- खतरे को बुलावा देना। अपने स्वास्थ्य को डेंजर ज़ोन में ले जाना! क्योंकि यदि आपने अपनी इस आदत को नहीं सुधारा, तो बहुत जल्द आप पर इन सारी बीमारियों- उनींदापन, थकान, बेचैनी, शरीर की पाचन प्रक्रिया में खराबी- का हमला होने वाला है। अभी हाल ही में हुए एक शोध में …

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माँ काली और ब्रह्माण्ड का ब्लैक होल!

शेरां वाली- जय माता दी! ज्योतां वाली- जय माता दी! पहाड़ा वाली- जय माता दी! ... ऐसे जयकारे सभी मंदिरों में गुंजायमान थे। चारों और नवरात्रों की धूम थी और सारा वातावरण भगवतीमय था। इसी सांस्कृतिक माहौल में दो मित्रों- प्रोफेसर नारायण (विज्ञान भक्त) और जगदीश प्रसाद ( माँ काली के अनन्य भक्त) की भेंट हुई। ... मिलते ही उनके मध्य चर्चा आरम्भ हो गई। तो आइए, हम भी उनकी इस आध्यात्मिक व वैज्ञानिक चर्चा से लाभ लेते हैं ... जगदीश प्रसाद- ... प्रो. नारायण- ... तुम सुनाओ, क्या चल रहा है? जगदीश प्रसाद- बस! माता रानी की कृपा से अपनी गाड़ी भी ट्रैक पर चल रही है। प्रो. नारायण( सिर पर हाथ रखते हुए)- तू नहीं बदला। ... चल, …

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नवरात्रों की बेला में आपका भोजन कैसा हो?

आयुर्वेद के अनुसार भगवान ने हमारे शारीरिक पुर्जों को तकरीबन १०० सालों तक बेरोक-टोक काम करने के लिए गठित किया। पर एक शर्त के साथ- 'No adulteration' यानी 'किसी मिलावट की गुंजाइश नहीं!' पर हुआ क्या? आज हम साँस ले रहे हैं तो दूषित हवा में! पी रहे हैं तो प्रदूषित पानी! खा रहे हैं तो मिलावटी भोजन! यह मिलावटी आहार सितंबर-अक्टूबर के महीने में हमें सबसे ज़्यादा नुक्सान पहुँचाता है। क्योंकि ये महीने यानी मौसम की अदला-बदली। यह मौसम सुहाना तो बहुत होता है, न ही ज़्यादा गर्मी और न ही ज़्यादा सर्दी! किन्तु इन महीनों में हमारी जठराग्नि मंद पड़ जाती है। पाचन क्रिया कमज़ोर होने लगती है। ... बार-बार कीटाणु…

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मेरे पास मेरा आत्म-विश्वास है!

इस संसार में ऐसा कौन सा व्यक्ति होगा, जो अपने बारे में नहीं सोचता! नि:सन्देह, कोई नहीं! तो आइए, आज हम भी जानें कि आप अपने बारे में क्या सोचते हैं? खुद को किस दृष्टि से देखते हैं? चलिए, हम आपको तीन विकल्प देते हैं, उनमें से आप किसी एक को चुन लीजिए- १) इस संसार का सबसे असफल व्यक्ति। २) एक ऐसा व्यक्ति जिसका होना न होना किसी के लिए कोई मायने ही नहीं रखता। ३) निरंतर अपने लक्ष्य की और बढ़ता एक कर्मठ व्यक्ति! सोचिए! सोचिए! अपने मन के ढक्कन को खोल उसमें झांकिए और जो सच्चाई दिखे उससे घबराना कैसा? तुरन्त एक विकल्प पर अपना निशान लगा दीजिए। अरे ... अरे ... यह क्या? आपमें से कुछ लोगों ने तो पहले और दूसर…

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किलर टी.वी!

आइए चलते हैं, आपके घर के सबसे फेवरेट कार्नर में! जहाँ घर का हर सदस्य एक रंगीन डिब्बे के आगे बैठकर मनोरंजन का ज़ायका लेता है। ...आप समझ ही गए होंगे कि हम किस डिब्बे की बात कर रहे हैं। जी हाँ...हम सबका 'प्यारा' टेलीविज़न! दूर क्या जाना! आप खुद को ही जाँच कर देख लीजिए कि आप पर टी.वी का कितना ज़ोर चलता है? उत्तर हाँ/न में दें- 1) ...आप सबकुछ छोड़कर अपने पसंदीदा टी.वी शो के आगे ही बैठे रहते हैं? 2) आप अपने परिवार के साथ कम और टी.वी के साथ ज़्यादा समय बिताते हैं? 3) एक भी दिन यदि टी.वी देखने को न मिले, तो आपको खाना हज़म नहीं होता? 4) चाहे कुछ काम का न आ रहा हो, लेकिन आप फिर भी रिमोट हाथ में पकड़ कर बैठे रहते हैं? …

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उत्साह एक जादुई फार्मूला !

'सेल! सेल! सेल! अब अपनी ज़िन्दगी के बैग में भरिए ढेरों खुशियाँ, जीतने के ढेरों अवसर और ढेरों संभावनाएँ! पाइए ज़्यादा मुनाफा और निकाल फेंकिए सारी टेंशन, सारे डर! ये सारे आकर्षण, साथ में और भी बहुत कुछ- पाइए बिल्कुल फ्री!' फ्री!? हैरान हो गए न! लेकिन दोस्तों, यह कोई झूठ-मूठ का, मन को भरमाने वाला आफर नहीं, बल्कि एकदम सच्चा और असली आफर है। यकीन नहीं होता, तो चलिए इसे साबित भी कर लेते हैं। ध्यान से देखिए...आफर के सारे आकर्षण एक गुण में समेटे जा सकते हैं। और वो एक गुण है- उत्साह! अब, क्योंकि उत्साह पाने के लिए कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ता; इसलिए आप इन सभी आकर्षणों का मुफ्त में लाभ उठा सकते हैं..…

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दुष्ट लोग सुखी क्यों दिखाई देते हैं?

प्रश्न: गुरु महाराज जी, कहा जाता है कि हमारे जीवन में जो कुछ भी घटित होता है- अच्छा या बुरा- उसका कारण हमारे कर्म हैं। पर फिर मुझे यह समझ नहीं आता कि एक पापी- अत्याचारी का जीवन इतना सुख व साधन संपन्न क्यों है? वहीँ एक नेक- ईमानदार सज्जन व्यक्ति इतना गरीब और दु:खी क्यों है? ... ऐसे में कर्म का विधान पक्षपाती लगता है। मेरी दुविधा दूर करें, गुरुदेव! उत्तर: यही दुविधा डॉ. एनी बेसेन्ट के मन में भी उत्पन्न हुई थी। वे बहुत मेधावी, प्रतिभा संपन्न व 'द न्यू रिव्यू' पत्रिका के संपादक मंडल की सदस्या थीं। पर उनके जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आए, जिन्होंने उन्हें भीतर तक झंझोड़ दिया। ...दरअसल, हुआ यूँ …

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चोर कौन?

आज एक गोपी ने श्रीकृष्ण को रंगे हाथ पकड़ लिया और ले आई यशोदा के पास। आते ही उसने कहा- 'लो संभालो अपने लल्ला को! देखिये यशोदा जी! हम आपका बहुत मान-सम्मान करती हैं। पर इसकी भी एक सीमा है। हम ग्वालिन हैं और दूध-दही-माखन बेचकर गुज़ारा करती हैं। पर अब रोज़-रोज़ दूध-माखन की बर्बादी हमसे बर्दाश्त नहीं होती है। आपका ये लाडला खुद तो खाता ही है; साथ ही मंडली बनाकर दूसरों को भी खिला देता है। केवल खाने की भी बात नहीं है। खाने-पीने के बाद हमारे माटी के बर्तनों को भी तोड़ जाता है। आज की ही बात सुन लो। आया था ये तुम्हारा नटखट लल्ला! माखन चुराते रंगे हाथों पकड़ा है इसे!' ... कान्हा- नहीं मैय्या, मैंने माख…

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क्या मानवता ऐसे ही लहूलुहान पड़ी रहेगी?

३० ...२९ ... २८ ........४ ... ३… २… १… लाल बत्ती का सिग्नल खत्म हुआ। गाड़ियाँ, स्कूटर, ट्रक, साइकिल- सभी वाहन हार्न बजाते हुए चलने लगे। एक कार में चार दोस्त सवार थे- विवेक, मानव, मनसुख और कामना! चारों आपस में हँसते-हँसाते आफिस जा रहे थे। टाइम कम था और ट्रैफिक ज़्यादा। इसलिए उनकी कार के ड्राइवर ने अगली सड़क से टेक-आफ किया और कार को मेन हाई-वे पर हवा से बातें करने ही वाली थी कि अचानक विवेक ने कुछ देखा। देखते ही ज़ोर से चिल्लाया- 'रोको! जल्दी कार रोको!' बाकी तीनों दोस्तों ने एक आवाज़ में पूछा- 'पर क्यों?' 'अभी तुम्हें भी पता चल जाएगा, क्यों! ड्राइवर! जल्दी से गाड़ी पीछे लो!'- विवेक  पीछे सड़क के …

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सपनों का संसार (स्वप्न विज्ञान पर विहंगम आकलन ...)

अधिकांशतः एक साधारण व्यक्ति के दिवस का एक-तिहाई भाग निद्रा को समर्पित रहता है। यही कारण है कि वैज्ञानिकों के शोध-यंत्रों की दिशा हमारे इस निद्रा-प्रकरण की और भी घूमी।  ... यह पुरुष स्वप्न लोक में कभी ऊँचाई की, तो कभी निचाई की अवस्थाओं से गुज़रता है। नाना रूपों का निर्माण करता है। माया की विभिन्न कृतियों के संग आमोद-प्रमोद करता है। कभी बंधु-बाँधवों के संग हँसता-खेलता है, तो कभी भयावह दृश्यों को देखकर रोता और डरता है। कुछ ऐसा ही है, हमारे स्वप्नों का संसार! दिन भर तो हम इंद्रधनुषी दृश्यों और अनुभवों के साक्षी होते ही हैं। परन्तु रात्रिकाल में, नेत्र मूंदने के बाद, यह रंग-बिरंग…

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मॉडर्न गुरु-भक्ति!

'क' से ...? 'ख' से ...? 'ग' से ...? क्या कहा? कबूतर ... खरगोश ... गमला! अजी! आप कौन से ज़माने में जी रहे हैं? आप शायद भूल रहे हैं की आप मॉडर्न युग के मॉडर्न निवासी हैं। आज के टाइम में 'क' से कबूतर नहीं, 'क' से कम्प्यूटर होता है। यह इक्कीसवीं सदी है। यहाँ सबकुछ हाई-टैक है- हाई-टैक मशीनें, हाई-टैक मोबाइल, हाई-टैक रहन- सहन और हाई-टैक गुरु-भक्ति! हाई-टैक गुरु-भक्ति!? जी हाँ! मॉडर्न ज़माने की मॉडर्न गुरु-भक्ति! जिसमें पैनड्राइव, हार्ड-डिस्क, स्कैनर …

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सदगुरुओं की हाट!

आजकल छोटे- बड़े शहरों में माल्स खुलने लगे हैं। ऐसे बाज़ार जहाँ एक ही स्थान पर बनी हुई अलग-अलग दुकानों पर जाकर आप हर वस्तु खरीद सकते हैं। हमारी सभी सांसारिक ज़रूरतों को पूरा करते हैं ये आधुनिक हाट! चलिए, अखण्ड ज्ञान के संग एक ऐसे आध्यात्मिक माल में, जहाँ सदगुरुओं की हाट हैं। ... इसमें बिकता क्या है? यहाँ पर सत्य का व्यापार होता है। विवेक बिकता है। ज्ञान के अनमोल रत्नों की खरीद होती है। यहाँ साधक साधना के गुर प्राप्त करते हैं। आइये, हम भी चलते हैं, इस बाज़ार की एक-एक हाट पर। ...  संत पल्टू की हाट :पल्टू साहिब अपने एक मुरीद के संग धोबी-घाट से गुज़र रहे थे। एक धोबी बेचारा पसीने-पसी…

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चैतन्य!

(दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की पुस्तक 'चैतन्य' से उद्धृत) 'मैं इस नगर की साम्राज्ञी हूँ। ये सब मेरे अधीन हैं। यहाँ एकछत्र मेरा राज है!... मैं मोहिनी हूँ ... मन मोहिनी! हा ... हा ... हा ...!'- रानी  मोहिनी (माया) स्व-प्रशंसा के बिगुल बजा रही थी। उसका अत्यंत चालाक और शातिर मंत्री अचेतासुर ( अज्ञानता का असुर) पास ही खड़ा था। अपनी बिलोई आँखों से मोहिनी का त्रिया चरित्र देख रहा था। दोनों राजभवन के शाही बाग में खड़े होकर संवाद कर रहे थे। बगीचे के साथ सटी सड़क पर से अनेक नागरिक गुज़र रहे थे। उनकी चाल में नशीली झूम थी, लड़खड़ाहट थी। ... वे वशीभूत हुए, गिरते-पड़ते राह से गुज़र रहे थे। उधर अपने रत्नजड़ि…

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वैदिक काल की विज्ञान-यात्रा!

चार दोस्त- गौरव, अक्षय, सुनील और हर्ष, विज्ञान के छात्र हैं। ये चारों अकसर आपस में वैज्ञानिक विषयों पर चर्चा करते रहते हैं। इनमें से हर्ष को आधुनिक विज्ञान के साथ-साथ वैदिक विज्ञान का भी ज्ञान है। वह प्रायः गौरव, अक्षय और सुनील को वैदिक युग की वैज्ञानिक खोजों के विषय में बताकर अचंभित करता रहता है। ये तीनों हर्ष की बातों को स्वीकार नहीं कर पाते, क्योंकि इनके लिए वैदिक काल एक पिछड़ा हुआ युग था… पर हर्ष ने भी यह  ठान लिया कि वह इनको वैदिक विज्ञान के तथ्यों को स्वीकार कर ही दम लेगा। इसलिए आज हर्ष इन्हें समय-प्रवाहिनी नदी में नौका विहार के लिए लेकर जा रहा है। इस नदी की विशेष …

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हमेशा मुस्कुराते रहे!

हँसना और मुस्कुराना किसे अच्छा नहीं लगता? लेकिन फिर ऐसा क्यों होता है कि बचपन में जो मुस्कान एक दिन में लगभग ४०० बार हमारे होठों पर खेलती है, हमारे बड़े होते-होते वह इतनी घट जाती है कि मुश्किल से बस १५ बार ही हमारे चेहरे पर दिखाई देती है? कारण स्पष्ट ही है- हमारी परेशानियों भरी ज़िन्दगी ...जहाँ किसी भी क्षण कुछ भी ऐसा घट जाता है, जो हमारे मुख से ये मुरझाया सा स्वर उभारता है- 'हाय! आज का तो दिन ही खराब है! मेरा मूड आफ हो गया!'  ... कुछ घटनाएँ हमारे अच्छे -खासे हँसते-खेलते दिन को बेकार या खराब दिन में बदल जाती हैं। हमारा मन बेचैन हो जाता है। हमारी कार्यक्षमता कम हो जाती है। घूम-घूम कर…

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लिव- इन रिश्तों पर एक बड़ी बहस!

अभी कुछ समय पहले, हमारे देश की सर्वोच्च न्यायालय ने एक अनपेक्षित फैसला सुनाया, जिस पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। ... ... हम बात कर रहे हैं 'लिव-इन रिलेशनशिप' की- एक ऐसा कान्सेप्ट (धारणा) जिसे सरल- सपाट शब्दों में आप इस तरह परिभाषित कर सकते हैं- 'अविवाहित लड़के और लड़की का एक साथ होना, ठीक ऐसे जैसे एक विवाहित दम्पत्ति रहते हैं।'    सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय संविधान की धारा इक्कीस का हवाला देते हुए कहा कि देश के प्रत्येक नागरिक को अपनी ज़िन्दगी जीने और निजी स्वतंत्रता का पूरा अधिकार है। इसलिए युवक और युवती बिना शादी किये भी अगर एक साथ रहते है, तो चाहे यह समाज की नज़रों में …

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जातिवाद के संकीर्ण दायरे!

प्रश्न: गुरु महाराज जी, हमारे शास्त्रों के अनुसार समाज को चार वर्णों में विभाजित किया गया है। परन्तु कुछ संत- महापुरुषों ने इस वर्गीकरण का विरोध किया है। आपका इस विषय में क्या मत है? उत्तर- एक बार एक कट्टरपंथी ब्राह्मण हमारे पास आए। उन्होने हमसे कहा- 'इस समाज में व्यवस्था स्थापित करने के लिए ईश्वर ने  चार वर्णों की उत्पत्ति की। इसलिए सभी को इस वर्ण व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए।' हमने उनसे पूछा- 'आप क्या सोचते हैं, किस आधार पर ईश्वर ने वर्ण व्यवस्था की रचना की?' उन्होंने तुरन्त एक श्लोक का उच्चारण कर दिया जिसका अर्थ है- ईश्वर के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर …

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जीत या हार!

क्या आपको ज़िन्दगी में हार पसंद है?... रोना पसंद है?... खोना पसंद है? बेशक, उत्तर'न' ही होगा। अच्छा, अब ज़रा पूरी इमानदारी से इन प्रश्नों का जवाब 'हाँ' या 'न' में दीजिए- क्या आप…  काम से ज़्यादा आराम पसंद करते हैं? कोई भी काम मिलने पर यही राग अलापते हैं- 'हाय! बहुत मुश्किल है… ओहो! इसमें तो बहुत मेहनत लगेगी ...?' हर काम के लिए 'एक्शन प्लान' के स्थान पर बहानों की लिस्ट तैयार रखते हैं? चुनौतियों से लड़ने की बजाय उनसे घबरा जाते हैं? जीवन में कोई नई शुरुआत करने की हिम्मत नहीं कर पाते?  खूबियों से ज़्यादा अपनी खामियों पर ध्यान देते हैं? आलस्य के घनिष्ठ मित्र हैं? क्या हुआ? कह…

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शब्द ब्रह्म!

... आदिनाम का सुमिरन करने वाला व्यक्ति साक्षात ब्रह्मतत्त्व को प्राप्त होता है! यह सृष्टि एक परम अद्भुत कृति है। कृति है, तो कृतिकार भी अवश्य है। वेदों अथवा आर्ष ग्रंथों में उसे 'ब्रह्म' कहा गया। ... आदि ब्रह्म ने संकल्प किया- मैं एक हूँ, बहुत हो जाता हूँ। ब्रह्म के इसी संकल्पित विचार को 'वाक्' कहा गया। ... इस वाक् अथवा शब्द ब्रह्म का स्वरूप कैसा था? ... जिस प्रकार समुद्र तरंग्शील होता है, उसी प्रकार वाक् या शब्द-ब्रह्म भी कंपित तरंगों के समान गतिशील हुआ करता है। ... यही आदि तरंग सृष्टि की रचनाकार बनी।  ... अध्यात्म विज्ञान और भौतिक विज्ञान, दोनों का ही मत है कि इस मूल आदि कंपन से…

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सैर- एक उत्तम औषधि!

किसी ने ठीक कहा है- ' सुबह की सैर है, पूरे दिन के लिए वरदान।' परन्तु आज के परिवेश में इस उक्ति की सार्थकता कहीं लुप्त होती जा रही है। हर व्यक्ति सुबह से रात तक इतना बिज़ी है कि उसे स्वयं के लिए भी फुरसत नहीं है। यानि वह अपने स्वास्थ्य और सेहत को नज़रंदाज़ कर रहा है। परन्तु ज़रा विचार करें, यदि हम स्वस्थ और निरोग नहीं होंगे, हमारा शरीर ही हमारा साथ नहीं देगा, तो इतनी भागम-भाग से प्राप्त किये गए साधनों का क्या लाभ? कौन उनके सुखों को भोगेगा? इसलिए ज़रूरी है कि केवल भौतिक संपदा इकट्ठी करने के लिए मत दौड़िए, बल्कि तंदुरुस्त रहने के लिए भी दौड़िए। मतलब कि रोज़ थोड़ा समय सुबह या सायं की सैर के …

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अज्ञानता का राक्षस!

कई शताब्दियों पहले की बात है। हिमालय के शिखरों में आदिवासियों का एक कबीला रहा करता था। इस प्रांत में सभ्यता के कदम ही नहीं पड़े थे। ये आदिवासी ... पशुओं का शिकार कर, चीड़-फाड़ कर कच्चा माँस खाते व रक्त पिया करते थे। अग्नि तक को प्रज्वलित करने का ज्ञान उन्हें नहीं था। इसलिए उनके पास रौशनी का सिर्फ एक साधन था सूर्य। ... सूरज की गर्मी से उनके हाथ-पाँव हरकत में आते थे। पर सूर्य ढल जाने पर ... पूरा प्रांत मानो काली चादर से ढक जाता था। ... हाथ को हाथ नहीं दिखता था। इस भयंकर अंधेरे के बीच कई कबीले वाले अपना सिर फुडवा चुके थे। कई मृत्यु के ग्रास बन गए थे। यही वजह थी कि इस आदिम कबीले में एक धारणा…

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नटखट बातों में तत्व के मोती!

कार्तिक मास की रात्रि का अंतिम प्रहर! पूरी नगरी अभी तक मीठी नींद में सो थी।शीत बयार मनो सबको लोरी सुना रही थी।पर दस वर्ष का यह नन्हा योगी निद्रा को त्याग कर उठ खड़ा हुआ था| उसने धीरे से अपनी कुटिया  का किवाड़ खोला। ताकि भीतर सो रहे उसके छोटे भाई-बहनों  की आँख न खुल जाए।बाहर शीतल पवन ने जैसे ही उसकी कोमल देह को छुआ, वह कांप गया। ... वह सिरह उठा।पर तभी उसे याद आए ,अपने पिता विट्ठल पंत के वे शब्द -'वत्स निवृति, तुम ज्येष्ठ पुत्र हो! ज्ञानेश्वर,सोपान और मुक्ता - तुम इन तीनों  के आदर्श हो! सदा याद रखना, जीवन में अनेक संघर्ष  भरी स्थितियाँ आती  हैं -कभी प्…

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प्रेय में मग्न या श्रेय की लगन?

एक बार दो घनिष्ट मित्र व्यापार के सिलसिले में जहाज़ से दूसरे शहर जा रहे थे। जहाज़ सभी प्रकार की उख-सुविधाओं से अटा हुआ था। दोनों ही मित्र बेहद खुश थे। परन्तु दुर्भाग्य! मौसम ने करवट बदली। अचानक आसमान ने काले बादलों का कम्बल ओढ़ लिया। प्रचंड आँधी-तूफ़ान उनके जहाज़ को ... । हाय! अचानक सागर के गर्भ से तकरीबन 15 फुट ऊँची एक लहर उठी और जहाज़ के ऊपर इतनी जोर से झपटी कि वह चरमराता हुआ सागर में विलीन हो गया। उस पर सवार सभी लोग भी लहरों की भेंट चढ़ गए। पर शायद इन दोनों मित्रों की जीवन-रेखाओं में अभी मृत्यु का योग नहीं था। तभी तो इनके हाथ लकड़ी का एक टुकड़ा लग गया, जिसके सहारे ये एक टापू तक पहुँच गए। व…

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क्या हम सच्चे साधक हैं?

एक व्यक्ति कुम्हार कब बनता है? जब वह चाक पर मिट्टी को सही प्रकार से रखकर, उसे चलाकर सुन्दर वस्तुओं का रूप देने का गुण सीख लेता है। कोई माली कब कहलाता है? जब उसे ... । सुनार बनाने के लिए सोने की परख कर सकना, उस पर काम करके उन्हें सुन्दर आभूषणो की आकृति प्रदान कर पाना इत्यादि गुण होने आवश्यक हैं। इसी प्रकार, सही मायनों में साधक बनने के लिए भी साधकता के गुणों का होना ज़रूरी है। साधक बनने के लिए कौन- कौन से गुण चाहिए, ... आइये उन पर प्रकाश डालते हैं ... अभयं (निर्भयता) ...यह गुण साधक की वह मजबूत नींव है, जिस पर उसकी शिष्यता की पूरी इमारत खड़ी होती है। ... उत्तरी अमरीका में कुछ समय पहले एक अमरी…

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अवसर बार-बार दस्तक नहीं देता!

अर्थशास्त्र में हर एक अवसर से जुड़ा एक मूल्य होता है, जिसे कहते हैं अवसर लागत मूल्य। यदि आसान शब्दों में समझना चाहें, तो यह वो मूल्य है जो हम खो देते हैं यदि हम प्राप्त मौके का लाभ नहीं उठा पाते। जैसे, मान लीजिए, आपके पास मौका है, सेल में 30 किताबों को 1200 रूपये में खरीदने का। परन्तु आप समय रहते सेल का लाभ नहीं उठा पाते। और बाद में वहीँ 30 किताबें आपको खरीदनी पड़ती हैं, 1500 रूपये में। यहाँ पर अवसर लागत मूल्य है, 1500-1200= 300 रूपये। ठीक इसी प्रकार जीवन में आए प्रत्येक अवसर को खो देने की भी एक कीमत होती है। और इसका मोल चंद रुपयों से नहीं आँका जा सकता। कभी- कभी तो एक अवसर खोने का अर्थ होता है, जीवन क…

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कहीं रिश्तों में भूचाल न आ जाए!

कलयुग में सच्चे रिश्ते बन पाना और उन्हें कायम रख पाना, शायद सबसे बड़ी चुनौती भरा काम है। ज़रा सी गड़बड़ रिश्तों में भूचाल ला सकती है। जिन रिश्तों को बनाने में सालों लग जाते हैं, उन्हें चटकने में मिनट भी नहीं लगता। इसलिए आपको बड़ी समझदारी से इन्हें सहेजकर रखना आना चाहिए। वह कला आनी चाहिए, जो आपके हर रिश्ते को मजबूती दे सके। तो आइए, इस कला की कुछ ज़रूरी टिप्स जानें- ... आजकल use & throw का ज़माना है। जैसे ही किसी वस्तु में कोई खामी आई नहीं कि उसे फेंक दिया। परन्तु जीवन के कोई संबंध कोई वस्तु नहीं हैं, जिन्हें कभी भी छोड़ दिया जाए। इसलिए use & throw का सिद्धांत कभी संबंधों पर लागू करने की भू…

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खेत नहीं, चिताएं जल रही हैं!

मैं धरती का एक टुकड़ा हूँ। भारत ने मुझे 'धरती माँ' का संबोधन दिया है। माँ का कर्त्तव्य होता है- जन्म देना और पालन-पोषण करना। मैं भी ऐसी एक माँ हूँ। मेरा किसान बेटा मेरे सीने में कुछ मुट्ठी भर बीज बोता है। पर बदले में मैं उसे कई-कई क्विंटल अन्न उपजा कर लौटाती हूँ। जब मेरे खेतों में धान की लहलहाती फसल कड़ी होती है, तो किसान कटाई का पुरुषार्थ करता है। मशीन चलाकर वह अन्न से भरी फसल काट लेता है। धान तो अलग हो जाता है, पर पीछे खेत में पुआल गड़ी या बिखरी, दोनों रूप में रह जाती है। अब किसानों को चिंता होती है कि एक महीने के अंदर-अंदर खेत को अगली बिजाई के लिए तैयार करना है। समय कम है और खे…

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मैं नेत्रहीन भी हूँ, नेत्रवान भी!

देवी सुवर्चला का वर्णनं है। ऋषि देवल की पुत्री सुवर्चला ज्ञानमणि और ओजपूर्ण व्यक्तित्व की धनी थी। दार्शनिक मेधा वाली यह विदूषी सौन्दर्य की भी स्वामिनी थी। जब इनकी विवाहोचित आयु हुई, तो पिता देवल चिंतित हुए कि ऐसी अद्वितीय पुत्री के सुयोग्य वर कहाँ से लाएँ? ... तब पुत्री ने सुझाव दिया- 'पिताश्री, आप एक स्वयंवर का आयोजन कीजिए। उसमें उच्च कोटि के विद्वत पुरुषों को आमंत्रण भेजिए। मैं उस सभा में एक विशिष्ट प्रश्न पूछूँगी। जो मेरे प्रश्न का यथोचित उत्तर दे देगा, उसी का मैं पति रूप में वरण करुँगी।' पिता ने प्रसन्नतापूर्वक पुत्री की अभिलाषा पूर्ण की. ... देवी सुवर्चला ने भरी सभा …

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त्रिशंकु- पौराणिक काल की राकेट- साइंस!

पौराणिक काल की एक प्रसिद्ध कथा है, जिसके मुख्य पात्र थे- ऋषि विश्वामित्र और इक्ष्वाकु कुल के वंशज प्रसिद्ध राजा सत्यवादी हरिशचन्द्र का पुत्र सत्यव्रत। सत्यव्रत अयोध्या का सूर्यवंशी राजा था। उसका दूसरा नाम त्रिशंकु था। उसकी यह प्रबल इच्छा थी कि वह सशरीर स्वर्ग जाए। इस कामना की पूर्ति हेतु उसने ऋषि वशिष्ठ एवं उनके पुत्रों से आग्रह किया। परन्तु उन्होंने इसे प्रकृति के विरूद्ध जानकर यज्ञ करने से मना कर दिया। उसके पश्चात् त्रिशंकु ने ऋषि विश्वामित्र के समक्ष अपनी इच्छा प्रस्तुत की। ऋषि विश्वामित्र ने यज्ञ करना आरम्भ कर दिया और त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया। किन्त…

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क्या समोसे के साथ चटनी खाने से दुःख दूर हो जाएँगे?

प्रश्न- गुरू महाराज जी, आजकल मीडिया में ऐसे बहुत-से बाबा-गुरू छाए हुए हैं, जो न तो शास्त्र-ग्रंथों पर आधारित कथाएँ या प्रवचन करते हैं, न ही कोई आध्यात्मिक चर्चा। वे तो अपने भक्तों को कुछ ऐसे मंत्र या बेतुके सूत्र बताते हैं, जिनसे भक्तों की तिजौरियाँ भर जाएँ, दुःख-क्लेश खत्म हो जाएँ, नौकरी लग जाए आदि। क्या ये लोग सच में गुरू की उपाधि पाने के हकदार हैं? उत्तर- प्रमाणित शास्त्र-ग्रंथों ने गुरू की जो परिभाषा दी है, उसके अनुसार तो ये साधु-बाबा 'गुरू' कहलाने के बिल्कुल भी अधिकारी नहीं हैं। ये 'गुरू' नहीं, 'व्यापारी' हैं। और इनके व्यापार को बढ़ावा दे रहा है- मीडिया। जैसे जब कोई कंपनी नया प…

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इतना तेज़ न दौड़िए कि ...

...मैं एक निर्जीव, काली, पाषाण सी सड़क! आज आप से कुछ कहना चाहती हूँ। ...इक नई सुबह... कल का सारा धुँआ बैठ चुका था। ठंडी- ठंडी हवा बह रही थी। सूर्य अपनी किरणों से नभ पर दस्तक दे रहा था। ...सब कुछ बहुत सुंदर और मनोरम था। पर फिर अचानक से पीं-पीं करती एक गाड़ी मेरे ऊपर से गुज़री। और बस सिलसिला शुरू हो गया... 'एक के बाद एक लगातार गाड़ियों के गुजरने का। ... तभी अचानक... एक हवा से बातें करती गाड़ी पर कहीं से एक पत्थर आकर लगा। गाड़ी के ड्राईवर ने तेज़ी से ब्रेक लगाई। झट से गाड़ी से उतरा। पास खड़े एक गरीब लड़के को उसने कॉलर से पकड़ा और लगा चिल्लाने- 'अरे! दिखता नहीं? इतनी महंगी गाड़ी पर पत्थर फेंक दिया…

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सच्चा वैज्ञानिक नास्तिक नहीं हो सकता!

प्रश्न : गुरु महाराज जी, श्रीनिवास रामानुजन तो एक बहुत महान गणितज्ञ हुए हैं। पर किसी से मैंने सुना है कि वे अध्यात्म-प्रेमी भी थे। एक महान गणितज्ञ की अध्यात्म में रूचि होना-क्या यह विरोधाभास नहीं है? कृपया प्रकाश डालें। उत्तर: निःसंदेह, श्रीनिवास रामानुजन भारत की धरा पर जन्मे एक महान गणितज्ञ थे। अपने 32 वर्ष के छोटे से जीवनकाल में, उनका इतना महान योगदान गणित को रहा कि आज लगभग एक शताब्दी बीतने के बाद भी गणित-प्रेमी खुले कंठ से उनकी प्रशंसा करती हैं। ... 7 साल की छोटी-सी आयु में ही उनके भीतर बैठा गणितज्ञ स्पष्ट दिखने लगा था। ग्यारह साल की उम्र तक तो उन्होंने इतना गणित पढ़ लिया थ…

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अहं-मर्दिनी-माँ भगवती!

प्रत्येक वर्ष जब भी नवरात्रों का पावन पर्व आता है, तो शक्ति उपासक बड़े उत्साह एवं उल्लास से भर कर देवी माँ का पूजन-ध्यान-चिंतन और जय-जयकार करते हैं। वास्तव में माँ एक शक्ति ही हैं, जो सारे संसार का सृजन,पालन और संहार करती हैं। श्रीमद देवी भागवत महापुराण के प्रथम स्कन्ध में स्वयं देवी माँ कहती हैं- सर्वं खल्विद्मेवाह्म न्यदस्ति सनातनं अर्थात सबकुछ मैं ही हूँ। ... अपने जीवन-काल में हमने असंख्य बार यह श्लोक सुना होगा- त्वमेव माता च पिता त्वमेव। ... अर्थात सबसे पहले तुम हमारी माँ हो। इस श्लोक में सारे रिश्ते माँ के बाद ही आते हैं। क्यों? क्योंकि संतान के लिए सहज स्नेह से सदा द्रव…

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