डिस्ट्रिक्ट जेल, यमुनानगर, हरियाणा में आयोजित दो दिवसिए सत्संग एवं ध्यान कार्यक्रम, ध्यान साधना का महत्त्व बताते हुए

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गया।

इस कार्यक्रम का संचालन डी.जे.जे.एस. के प्रचारकों स्वामी अभेदानंद जी, हरिदासनंद जी और सुबोधनंद जी के द्वारा किया गया। मुख्य रूप से जेल एसपी रतन सिंह जी और डीएसपी रेशम सिंह जी उपस्थित थे।

स्वामी अभेदानंद ने क़ैदियों को समझते हुए कहा कि ध्यान का हमारे जीवन में बहुत बड़ा महत्व है। केवल आँख को बंद कर लेना ही ध्यान नहीं कहलाता। सच्चे रूप से ध्यान तब शुरू होता है जब साधक की तीसरी आँख खुलती है। ध्येय के बिना की गई साधना उस घड़ी की तरह है जिसकी सुई केंद्रीय बिंदु से अलग हो चुकी हो। वास्तव में ध्यान साधना तभी होती है जब ध्येय, ध्याता व ध्यान तीनो मौजूद हो। ध्यान की पद्धति सीखने के लिए पूर्ण सतगुरु की शरण चाहिए, जिनके मार्गदर्शन से परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है। सतगुरु कृपा का हस्त हमारे मस्तक पर रख कर सम्पूर्ण ब्राह्मण को घट में दिखाते है, तभी वास्तविकता का ज्ञान होता है।

स्वामी जी ने बताया कि समय की आवश्यकता है कि देश के युवकों में देश के प्रति निष्ठा, साहस एवं आत्म बलिदान की भावना को पुनः उत्पन्न करवाया जाए जो कि पूरे विश्व के लिए एक समय पर आदर्श हुआ करती थी। राष्ट्र की नीव रखने में युवाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। युवा शक्ति वह अधाह जल है जो सही दिशा ना मिलने पर विध्वंसक और आक्रामक हो सकता है।स्वामी जी ने कहा कि आज के युवक को ऐसे मार्गदर्शन की आवश्यकता है जो उनके घट के भीतर ही आत्म एवं परमातम सत्ता का बोध करा दे।

क़रीबन २५० पुरुष क़ैदियों ने इन आध्यात्मिक विचारों को पूरी एकाग्रता से श्रवण किया।

अंत में, सुंदर आध्यात्मिक विचारों से सचाई के पथ को अपनाने के लिए प्रेरित होते हुए ३० क़ैदी भाइयों ने आगे आकर ध्यान शिक्षा प्राप्त करने की इच्छा जताई।

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Antarkranti is the Prisoner's Reformation and post-release Rehabilitation Program.

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