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खेत नहीं, चिताएँ जल रही हैं!

 

भारत के लहलहाते खेत--- हरियल भूमि। इस कृषि प्रधान देश की उपजाऊ धरती अन्न रूपी धान उगलती है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश--- आदि राज्यों की मिट्टी गेहूँ, चावल, फल-सब्जियों की खानें हैं। सवा सौ करोड़ भारतीयों की अन्नपूर्णा है, भारत की धरती माँ। जन्म देने वाली माँ तो फिर भी हमें साल-डेढ़ साल अपना दूध पिलाती है। परन्तु यह धरती माँ तो हमें आजीवन पोषित करती है।

लेकिन हमारी यह अन्नपूर्णा माँ, जो हमें पोषित करती है, आज हमारी अज्ञानता से प्रताड़ित हो रही है। इस लेख के माध्यम से अखण्ड ज्ञान अपने पाठक-वर्ग, विशेषकर कृषि-जगत से सम्बन्ध रखने वाले पाठकों की जानकारी के लिए एक ज्वलंत समस्या को उजागर कर रही है--- क्योंकि यदि अब नहीं जागे, तो कहीं हमेशा के लिए सोना न पड़ जाए!

मैं धरती का एक टुकड़ा हूँ। भारत ने मुझे ‘धरती माँ’ का सम्बोधन दिया है। माँ का कर्तव्य होता है- जन्म देना और पालन-पोषण करना। मैं भी ऐसी एक माँ हूँ। मेरा किसान बेटा मेरे सीने में कुछ मुट्ठी भर बीज बोता है। पर बदले में मैं उसे कई-कई क्विंटल अन्न उपजा कर लौटाती हूँ।

जब मेरे खेतों में धान की लहलहाती फसल खड़ी होती है, तो किसान कटाई का पुरुषार्थ करता है। मशीन चलाकर वह अन्न से भरी फसल काट लेता है। धान तो अलग हो जाता है। पर पीछे खेत में पुआल गड़ी या बिखरी, दोनों रूप में रह जाती है। अब किसानों को चिंता होती है कि एक महीने के अंदर-अंदर खेत को अगली बिजाई के लिए तैयार करना है। समय कम है और खेत में 8-9 इंच ऊँचा पुआल गड़ा खड़ा है! उससे कैसे निजात पाई जाए? बिखरे हुए पुआल का भी निबटारा कैसे करें?

ऐसे में, मेरे ये किसान बेटे अकसर एक बेहद खतरनाक रास्ता अपनाते हैं। मेरी नाजुक सतह पर, पुआल के बीच, घोर अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं। आग की भीषण ज्वालाएँ, तड़-तड़ करती हुईं, मुझ पर उगे या तितर-बितर हुए पुआल को लीलने लगती हैं। इस तरह अकेले पंजाब में कई मिलियन टन पुआल हर मौसम में स्वाहा कर दी जाती है।

अब तो नासा के वैज्ञानिकों की नजरें भी मुझसे उठती लपटों की ओर गई हैं। नासा की ‘Aqua’ नामक सैटालाइट (उपग्रह) से पंजाब क्षेत्र की तस्वीरें ली गई हैं। तस्वीरों के साथ संयुक्त रिपोर्ट स्पष्ट कहती है- ‘The whole Punjab appears to be literally on fire, from low earth orbit.’- लगभग पूरा पंजाब निचले उपग्रहों से आग में झुलसता दिखाई देता है। 31 अक्टूबर, 2012 को खींची गई तस्वीरों के साथ नासा अपनी वेबसाइट पर दर्ज करता है- ‘पंजाब क्षेत्र की इन तस्वीरों में दिखाई देती ये छोटी-छोटी लाल बिंदियाँ दरअसल जलते खेत हैं। What is striking about images is the large number of fires. Smoke from hundreds of fires obscures most of the Punjab region of India - इन जलते खेतों से उठता धुँआ लगभग पूरे पंजाब को ढके हुए है।’ अक्टूबर व नवम्बर माह के दौरान यदि इन क्षेत्रें का दिग्दर्शन आप हवाई-जहाज या हैलीकॉप्टर से करते हैं, तो ये किसी युद्धग्रस्त या बमबारी से त्रस्त जलते-झुलसते इलाके लगते हैं।

यही तो मेरी वेदना है! खेतों की यह आग मेरे अलग-अलग अंगों की जलती चिताओं जैसी ही हैं और मेरी ही क्यों! यह आग तो पृथ्वी के साथ-साथ पवन को भी मैला कर रही है। मेरी चिताओं से सघन, काला धुँआ उठता है, जो कई-कई मील दूर तक के वायुमण्डल में राख और भस्म के कण घोल रहा है। भयंकर रूप से वायु-प्रदूषण फैला रहा है। विशेषज्ञ बताते हैं कि खेताग्नि से उठते धुँए में कार्बन कणों के साथ-साथ कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन-डाईऑक्साइड, सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन डाईऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें भी होती हैं। आप ये लगा लीजिए कि एक टन पुआल के जलने से 60 कि-ग्रा- CO, 1460 कि-ग्रा- CO2, 199 कि-ग्रा- राख और 2 कि-ग्रा- SO2 वातावरण को दूषित कर जाती है।

इन प्रदूषणकारी गैसों के बहुत दूरगामी प्रभाव होते हैं। यदि पंजाब की बात करें, तो वहाँ की खेताग्नि दिल्ली के प्रदूषण की मुख्य जिम्मेदार है। और क्या आप जानते हैं, इस प्रदूषण का सीधा असर पूरे जीव-जगत को घायल करता है? अनगिनत बीमारियों की सौगात भेंट करने वाला यही धुँआ है। जैसे- गले में दर्द, एलर्जी, खाँसी, आँखों में रड़क, दमा, नजला आदि। जब कार्बन मोनोऑक्साइड गैस साँस द्वारा फेफड़ों में पहुँचती है, तो खून के हेमोग्लोबिन को नष्ट करने लगती है। सल्फर डाईऑक्साइड गैस जीव-मात्र की श्वास-नली को नुकसान पहुँचाती है और खाँसी व दमे जैसी बीमारियाँ पैदा करती है। यह गैस वायुमण्डल की नमी के साथ रिएक्ट करके गंधक पूर्ण तेजाब तक उत्पन्न कर डालती है। हाइड्रोजन सल्फाइड व कार्बनिक सल्फाइड बड़े ही बदबूदार जहरीले पदार्थ होते हैं, जो फेफड़ों का कैंसर, श्वास नली में सूजन, दमा, एलर्जी जैसी नामुराद बीमारियों के जनक होते हैं। मानव समाज में चर्म व नेत्र रोग के बढ़ने का कारण भी यही वायु-प्रदूषण है।

यही नहीं, जरा मैं अपनी करुण दशा का भी चित्रण कर दूँ। जब मेरे सीने पर आग लगाई जाती है, तो मेरी कोख में पलते-खेलते अनेक जीव-जन्तु भी स्वाहा हो जाते हैं। अबोध किसान यह नहीं जानते कि ये जन्तु दरअसल उनके मित्र-कीट हैं, जो धरा की उर्वरा-शक्ति को बनाए रखते हैं। अनगिनत बैक्टीरिया व सूक्ष्म जीवाणु खेत की मिट्टी को खाद की भांति जीवंत रखते हैं। मगर मिट्टी के अग्नि-ग्रस्त होने से जब तापमान बढ़ता है, तो यह मित्र-जगत सदा के लिए नष्ट हो जाता है और फिर इस खोई उर्वरा शक्ति की भरपाई करने के लिए किसान रासायनिक खादों व जहरीले कीटनाशकों का जी भर के प्रयोग करते हैं। उनसे हानि की तो अलग ही कहानी है।

कृषि-विज्ञान के जानकार जानते हैं, पृथ्वी की 6 इंच मोटी ऊपरी सतह ही उपजाऊपन की मापदंड होती है। बारम्बार आग की लपटों से यह सतह झुलस-झुलस कर निष्प्राण-सी, बिल्कुल बेजान हो जाती है। मैं बंजर हो जाती हूँ। मेरी मिट्टी में व्याप्त नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर आदि पोषक तत्त्व भी बड़ी मात्र में समाप्त हो जाते हैं।

जब खेतों की आग भीषण होती है, तो वह आस-पास झूमते फलदार वृक्षों, फसलों, लाभदायी वनस्पतियों, औषधीय जड़ी-बूटियों आदि को भी लील जाती है। यहीं नहीं, झुलसी धरती अधिक मात्र में सिंचाई हेतु जल मांगती है, जिसकी वजह से पानी जमीनी स्तर पर प्रबल रूप से घटता जा रहा है। आज बेमौसमी बरसातों या तूफानों का आना, ध्रुवों में बर्फ पिघलना, ग्लोबल वार्मिंग होना- इन सब प्रकृति-विरोधी घटनाओं के पीछे एक बड़ा हाथ इन लाखों जलते खेतों का भी है।

इसलिए मेरा आह्नान है, अपने किसान बेटों से कि वे इस विनाशकारी प्रक्रिया को बंद करें! आज बहुत सी राज्य सरकारों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। पर सच्चे मायनों में यह क्रम तो तभी बंद होगा, जब तुम अंदर से जागोगे। अपनी धरती माँ और पवन पिता की वेदना को समझोगे।

किसान-भाइयों के निजी अनुभव

कई सालों पहले तक हम खेतों में पुआल जलाते ही आए थे और समझते थे कि उसकी राख से खेतों का उपजाऊपन बढ़ जाता है। लेकिन जब गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी ने पुआल को जोतने की बात कही, तो बड़ा अजीब लगा। पर गुरु-आज्ञा मानकर अनुसरण किया, तो अपने खेतों को पहले से ज्यादा भरा-पूरा पाया।

-रुवेल सिंह, बूथगढ़, लुधियाना
 

सच में, जब पुआल में आग लगाते थे, तो कई दिनों तक जीना मुहाल हो जाता था। धुँआ नाक में दम कर देता था। चारों तरफ काली झाई छा जाती थी। पर अब ऐसा नहीं! अब तो नीचे लहलहाती जमीन है और ऊपर खुला स्वच्छंद आसमां!

-सर्वजीत सिंह, हरिपुर, जालंधर
 

अनजाने में कितना पाप कमा बैठते थे हम! जब खेतों में आग लगाते थे, तो पास में खड़े दरख्तों की पत्तियाँ जल जाती थीं। उनमें बस रहे पंछी और उनके घोंसले भी जल जाते थे। कितने ही दूसरे जीव-जन्तु भी हमारी अज्ञानता और स्वार्थ की भेंट चढ़ जाते थे। पर श्री महाराज जी ने अब हमेें इस पाप से बचा लिया।

-संदीप सिंह, कैथल, हरियाणा
 

प्रिय किसान भाइयों! धरती माँ की करुण पुकार हमें कहीं न कहीं झंझोड़ देती है। लेकिन ऐसे में एक अगला और स्वाभाविक प्रश्न उठता है- अगर पुआल को जलाएँ नहीं, तो उसका क्या करें? उससे कैसे निजात पाएँ? जमीन को अगली खेती के लिए कैसे तैयार करें? इसका बड़ा प्रैक्टिकल समाधान हमें खोजना होगा। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक व संचालक गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी, जिनकी कर्म-साधना समाज की हर कुरीति पर सुदर्शन-चक्र चला रही है, वे कृषि-प्रधान भारत की इस समस्या के प्रति भी पूर्ण रूप से सजग रहे हैं। गत वर्षों से श्री महाराज जी ने पंजाब, हरियाणा आदि क्षेत्रें में तो इस कुप्रथा के विरुद्ध एक क्रांतिकारी अभियान छेड़ा हुआ है। गुरुदेव के मार्गदर्शन में संस्थान के नौजवान कार्यकर्त्ता जहाँ भी आसपास के क्षेत्रें में खेत जलते देखते हैं, उनका शमन करने तुरन्त दौड़े जाते हैं। भरसक प्रयासों से, शीतल फुहारों से, जलते खेतों को ठंडा करते हैं।

इसी  शृंखला में गुरु महाराज जी ने खेती के सम्बन्ध में बहुत से प्रयोगात्मक शोध व प्रयोग (researches and experiments) भी किए हैं। अपने अनुयायी किसानों को वे सदा यही सुझाव देते हैं कि पुआल जलाने से बेहतर है कि उसकी मिट्टी में ही जुताई कर दो। जुती हुई पुआल एक बेहतरीन खाद सिद्ध होती है। कारण कि पुआल में बहुत अधिक मात्र में कार्बन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, सल्फर, पोटाशियम आदि पोषक तत्त्व हुआ करते हैं। आजकल तकनीकी क्षेत्र में रोटावेटर (rotavator), जीरो ड्रिल (zero drill) जैसे यंत्र उपलब्ध हैं। इनकी मदद से मिट्टी में पुआल की जुताई हो जाती है और बिजाई भी साथ में ही चलती है। जिन किसान-भाइयों या जमीदारों ने इस प्रयोग को अपनाया, उनके खेतों ने सोना उगला।

पर जो छोटे किसान हैं, जिनको ये यंत्र उपलब्ध नहीं, उन्हें भी निराश नहीं होना। उनके लिए बेहतर है कि वे फसल-चक्र अपनाएँ। गन्ना, तिलहन, दलहन आदि फसलों को अपने खेत में बोएँ। आजकल इन फसलों की बाजार में बहुत माँग है और इन्हें बो कर आप पुआल के चक्कर से भी बचे रहेंगे। वैसे भी आजकल ऐसी-ऐसी आधुनिक मशीनें बन चुकी हैं, जिनसे पुआल द्वारा बिजली का निर्माण किया जाता है। यहीं नहीं, पुआल द्वारा गत्ता बनाने वाली मिलें आजकल 80-100 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से पुआल खरीद कर किसानों को अच्छा मुनाफा दे रही हैं। इसलिए बेहतर होगा कि आप अपने आस-पास के क्षेत्रें में ऐसी तकनीकी मशीनें या गत्ता मिलें खोज लें, जहाँ पुआल के बदले आर्थिक लाभ कमा सकें।

पाठकगणों! हमें यह प्रकृति हमारे ही उपयोग के लिए मिली है। हम जितना इसका ख्याल रखेंगे, उतने ही लम्बे काल तक यह भी हमारा ख्याल रख पाएगी। सदा याद रखें! श्री महाराज जी कहा करते हैं- ‘माँ प्रकृति का हमें शोषण नहीं करना, बल्कि उससे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए उसका संरक्षण करना है।’

1 Comment

  1. Geetanjali SaggarNovember 7, 2019 06:22

    It is very nice, knowledgeable & beneficial artical. Really too good.

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