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पुरातन और वैदिक काल की अद्भुत शिल्पकला

 

आज जिन तकनीकों का इस्तेमाल करके इमारतें या डिज़ाइन बनते है, उनकी मजबूती और टिकाऊपन को लेकर बहुत से प्रश्न चिन्ह खड़े होते है। बारिश से हाई- टेक शहरों के ड्रेनेज सिस्टम की धज्जियाँ उड़ जाती है तो कभी फुटओवर ब्रिज ही गिर पड़ता है। आज की हालत हमारे सामने ही है।

इससे अच्छी टाउन प्लानिंग तो आज से हज़ारों साल पहले मोहनजोदड़ो नगर की थी। घर, सड़के, ड्रेनेज सिस्टम सब का सब इतने हिसाब से निर्मित जैसे पूरा मैथमेटिकल कैलकुलेशन से बनाया हो। सड़के एकदम सीधी होती थी। सभी की सभी ईस्ट से वेस्ट और नार्थ से साउथ की ओर बनी हुई थी। सड़के एक दूसरे को 90°के एंगल पर मिलती थी। हमारे आज के मॉडर्न नगरों से ज्यादा एडवांस्ड था वो नगर।

पुरातत्वविद डॉ.एस.आर.राव ने द्वापरयुग के नगर 'द्वारिका' के अवशेषों पर रिसर्च की। हमारे ग्रंथ बताते है कि वह एक ऐसा नगर था जो पूरा का पूरा पानी के बीचोबीच बनाया गया था। अवशेषों से भी पता चलता है कि वह शिल्पकला के नज़रिए से भी एक हाई-टेक नगर था। उस पूरे नगर के चारों ओर बड़ी मजबूत दीवार बनाई गई थी। घर ऐसे पत्थरों से निर्मित थे, जो समुद्र के पानी में भी खराब नहीं होते थे। 

विजयनगर साम्राज्य के समय में बना विठ्ठल मंदिर। उस मंदिर के म्यूजिक सेक्शन में बहुत सारे अलग-अलग तरह के खम्भे बने हुए है। एंटर करते ही पहले सात स्तम्भ दिखाई देते है। अगर हम पहले स्तम्भ पर कान लगाएँ और उस पर हथेली से थाप दें, तो उसमें से 'सा' की आवाज़ निकलती है। इसी तरह सातों खम्भो में से क्रमानुसार रे, ग, म, प, ध, नी की पूरी सरगम बजती सुनाई देती है। इसके बाद अंदर जाने पर जो खम्भे हैं, उनमें से अलग-अलग वाध यंत्रों की सुरीली धुनें उठती हैं। किसी खम्भे में से तबले की, किसी खम्भे में से बांसुरी की, किसी से वीणा की!

अगर सच में तकनीक और वास्तुकला देखना ही है तो वैदिककाल मानव सभ्यता का सबसे पुरातन और सिरमौर काल है। हमारे महान ऋषियों मुनियों का युग श्रेष्ठतम वैज्ञानिक युग था। उस समय ऐसे-ऐसे आधुनिक नगर थे जिनका आज कोई मुकाबला ही नहीं है। उच्चतम तकनीकों व प्लानिंग का उपयोग प्रकृति को बिना कोई नुकसान पहुचाए। महर्षि भृगु ने कहा है -

यथायोग्यं यथाशक्तिः संस्कारान्कारयेत् सुधीः।।

-सबसे पहले प्रयोग में आने वाली हर वस्तु का रंग, गुण, आयु व अवस्था का सही प्रकार से आकलन करें। इन सब पदार्थों के कारण साथ में चीनी हुई वस्तु की ताकत और उस पर जो खिंचाव पड़ेगा, उसे भी ध्यान में रखना चाहिए। वैदिककाल में तरह-तरह के आश्रय-स्थल जैसे कुटिया, भवन, चारदीवारी, महल वगैरह बनाए जाते थे। रक्षा हेतु मज़बूत किलों व कोटों का भी निर्माण हुआ करता था। बड़े पैमाने पर नगर के रूप में गाँव, शहर, बन्दरगाह व सुंदर राजधानियाँ बनाई जाती थी। पक्की सड़के चौड़े राजमार्ग टाउन प्लानिंग की अद्भुत मिशाल। अथर्ववेद के नवम काण्ड के तीसरे सूक्त में आता है-

शालाया विश्ववाराया नध्दानि विचृतामसि।।

अर्थात् घर बनाने से पहले सर्वप्रथम उसके आस-पास के क्षेत्र का भी जायज़ा लो। देखो कि इर्द-गिर्द कैसे घर बने हुए हैं और तुम्हें कैसा घर बनाना है। उनसे समता (परिमितां-Symmetry) बैठाकर अपने घर के एक-एक भाग का सूक्ष्म और विस्तृत ढंग से (with detailed measurement) नाप लो। फिर अपने ज़मीन के टुकड़े (Plot) को हिसाब से काटो।

वैदिक कॉलोनी में घर साथ-साथ सटे हुए और बिल्कुल एक आकार- प्रकार के (symmetrical) होते थे। अथर्ववेद के मंत्र में कहा गया-

उन्सो वा तत्र जायतां ह्रदो वा पुण्डरीकवान्।।

-यहाँ के एक-एक घर के आँगन और पिछवाड़े में दूर्वा के बेहिसाब फूल उगे हुए थे। घरों के बाहर एक-एक जलस्त्रोत जैसे कि झरना, फव्वारा या कमलों से भरा छोटा तालाब ज़रूर था। घर की दीवारों पर मज़बूत प्लास्टर इतना की हज़ारो- हज़ारों साल तक भी नहीं छूटता। प्राचीन युग के अवशेषों में हमें इसके सबूत मिल चुके है। इस काल में सीमेंट बनाने के लिए अलग-अलग तकनीक होती थी। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता के वज्रलेप श्लोक 8 में उन्होंने लिखा है-

मयकथितो योगोऽयंं  वि‌‌ज्ञेयो वज्रसंघातः।।

- अर्थात् प्लास्टर बनाने के लिए आठ भाग सीसा, दो भाग कांसा और एक भाग पीतल लेकर- इन सबको एक स्थान पर गलाएँ। इससे जो बनेगा, उसे 'धातु निर्मित प्लास्टर' (Metalic Plaster) कहते हैं। छते और दरवाज़े ऊँचे-ऊँचे। सभी खिड़कियाँ एक ही ऊँचाई पर होती थी और सारी नीचे फर्श की ओर झुकी हुई। इन सबके पीछे तर्क होता था- एयर सर्कुलेशन। ताकि ताज़ी हवा खुले तौर पर भीतर आ सके और बासी वायु बाहर निकल पाए। जिस कोण पर ये खिड़की-दरवाज़े बनाए गए हैं, उनके पीछे एक उम्दा विज्ञान भी है। ऋग्वेद मंत्र में आता है-

तेषां सं हन्मो अक्षाणि यथेदं हम्र्यं तथा।।

-हे मनुष्य! विज्ञान का अनुसंधान कर और अपने परिवार के लिए ऐसा घर बना कि कोई भी राह चलता घर के अंदर न झांक पाए, पर अंदर रहने वाले लोग बाहरी राहगीरों को आराम से देख पाएँ। ऋग्वेद (8.47.5) -

ओउम बृहतः परि सामानि षष्ठात प‌ञ्न्चाधि निर्मिता।
बृहद बृहत्या निर्मित कुतोऽधि बृहती मिता।।

- हे जगत निर्माता! जैसे ब्रह्मा द्वारा आपने पंच महाभूत प्रकट किए हैं और उन्हें संतुलित कर संसार को भली- भांति संचालित रखा है- उसी तरह मेरे घर में भी इन तत्त्वों को सुस्थिर करें और मेरे बंधु-बांधवों को सर्वसुख सम्पन्न बना दें। 

तो हमारे वैदिककालीन ऋषि-महर्षि पूर्ण वैज्ञानिक होते थे! वे सिर्फ भवन-निर्माण नहीं, 'जीवन-निर्माण' की कला भी जानते थे। केवल 'मकान' नहीं, सुखपूर्ण 'घर' बनाते थे।

 

2 Comments

  1. Geetanjali SaggarOctober 24, 2019 14:20

    Awesome article...Give us interesting article to read.Thanks a lot.jmjk.

  2. बहुत ही अद्भुत कला आती थी हमारे ऋषियों को , आज के युग से भी ज़्यादा आधुनिक थे हमारे पूर्वज, अवसोस की बात ये है कि इतने ज्ञानी-विज्ञानी हम अपने ऋषियों की अनमोल कृति, धरोहर को संभाल नही पाए, पाश्चात्य संस्कृति की ओर बढ़ गए,.. मैं DJJS व सेवादारो को बहुत बहुत धन्यवाद करना चाहता हु, की आज के युवाओ को उनकी भारतीय गौरभशाली संस्कृति-विज्ञान का याद करा उन्हें जाग्रत करने का महान कार्य कर रहा है.. मुझे पूर्ण विश्वास है भारत फिर से विश्व गुरु बनेगा... महाराज जी के चरणों मे सत सत नमन...

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