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राम राज्य साकार हो उठे

 

राम-राज्य फिर आएगा.. राम-राज्य फिर आएगा..

क्या ऐसा बोलने भर से 'राम-राज्य' साकार हो जाएगा? कदापि नहीं! उसके लिए कुछ प्रयत्नों की आवश्यकता होंगी। हम राम को ऐसे बाहर से जानने की कोशिश करेंगे तो नहीं होगा।

श्रीकृष्ण जी महाभारत में बहुत ही सुंदर कहते है- 'जिस देश का राजा आत्मज्ञानी हो और प्रजा भी आत्मज्ञानी हो, वहाँ पर कभी भी दुःख आ ही नहीं सकता।' अर्थात् राजा और प्रजा दोनों ने ईश्वर के तत्त्वस्वरूप को भीतर से ही जान लिया हो, वहाँ शांति अवश्य आ सकती है।

यजुर्वेद में हमारे महर्षियों ने सिद्धांत दिया है-

'जिस क्षण क्षत्रिय बल और ब्रह्म बल दोनों इकठ्ठे होकर कार्य करते है केवल उसी क्षण 'राम-राज्य' की स्थापना हो सकती है।' तब वहाँ केवल सुख ही सुख एवं शांति ही शांति होगी। उन्होंने कहा आध्यात्म अर्थात् धर्म का प्रक्रियात्मक पहलू और क्षत्रिय अर्थात् राजनीति का समन्वय होना आवश्यक है।

हमारे देश में एक बार नहीं कई बार राम-राज्य की स्थापना हुई, वैदिक काल में तो था ही उसके आगे आए चंद्रगुप्त मौर्य काल वो भी स्वर्णिम काल कहा जाता है हमारे देश का। चंद्रगुप्त मौर्य एक आम इंसान था। चारों तरफ घोर अनर्थ देख कौटिल्य चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य के भीतर ब्रह्मज्ञान को आरोपित किया, परमात्मा-राम को तत्व रूप से जाना। अब वह उस लायक बन गया था जो प्रजा को पोषित कर सकता है। सिंहासन आरुढ़ किया किन्तु जो शक्ति पीछे कार्य कर रही थी वह विलासिता या समृद्धि नहीं थीं अपितु धर्म की शक्ति थी।

सम्राट अशोक के भीतर महात्मा बुद्ध के शिष्य ने इसी ब्रह्मज्ञान को पोषित किया और वह काल भी स्वर्णिम काल कहलाया। इथोपिया के साम्राज्य की बात की जाती है प्लेटो के कहने पर राजा को आत्मज्ञानी कर दिया गया।

इतिहास में ऐसे उदाहरण भरे पड़े है, अनेकों बार राम-राज्य की स्थापना हो चुकी है। परंतु हम राम तत्व को भीतर से जानना भूल जाते है। आज भी हम कोशिश कर रहे है। हम विज्ञान का सहारा लेते है। बहुत वैज्ञानिक तरक्की करने के बाद शायद शांति की स्थापना हो जाएगी। पर ऐसा नहीं हो पा रहा है। एक बार एल्बर्ट आइंस्टीन से किसी ने पूछा-आपके नाम पर विज्ञान के क्षेत्र में 1500 से अधिक खोजें है, इतने आविष्कार आपने किए है फिर भी दुनिया में इतनी अशांति है। शांति कैसे आ सकती है समाज में? आइंस्टीन- मुझे यह नहीं मालूम आविष्कारों से शांति आ रही है या नहीं। लेकिन मुझे यह जरूर मालूम है शांति चाहते हो तो अच्छे इंसान पैदा करो। यह भी मैं कहना चाहूँगा- विज्ञान के हाथों में अच्छे इंसान पैदा करना नहीं है। यह मैं नहीं जानता कैसे पैदा हो!

इसीलिए आज के परिवेश में हम राम-राज्य की परिकल्पना को साकार होते देखना चाहते है तो हमें क्या करना होगा? वहीं जो उस समय श्रीराम जी ने कहा- आध्यात्म पोषित बनो। हमारे समाज की हर इकाई प्रत्येक मनुष्य को शांति की स्थापना के लिए तत्व से जुड़ना होगा।

तमसो मा ज्योतिर्गमय- अंधकार से प्रकाश की ओर लेकर चलो। यहाँ किसी बाहरी प्रकाश या बाहरी शिक्षा की बात नहीं हो रही है। उच्च बाहरी शिक्षा के बावजूद समाज में चहुँ ओर भ्रष्टाचार और अपराध बढ़े हुए है। ईश्वर तत्त्व प्रकाश स्वरूप में प्रत्येक मनुष्य के भीतर ही उपस्थित है, ज़रूरत है उससे जुड़ने की, धार्मिक बनने की। 'धर्म' शब्द ‘धृ’ धातु से बना है जिसका अर्थ होता है धारण करना। अर्थात् जब कोई भी व्यक्ति पूर्ण गुरु के सानिध्य में आत्मज्ञान को प्राप्त कर उस ईश्वर के तत्व रूप का साक्षात्कार कर लेता है तो वह सही मायने में धार्मिक बनता है, उसमें धर्म के दस लक्षण प्रकट हो जाते है। एक बार आत्मज्ञान प्राप्त करने पर ईश्वर उस व्यक्ति के साथ हर पल हर क्षण साथ-साथ चलता है। और कहते है ना कि व्यक्ति जिसके साथ-साथ हर समय होता है उसी के जैसा बन जाता है तो ईश्वर के साथ-साथ चलने पर मनुष्य भी देवतुल्य बन जाता है फिर वह व्यक्ति बुराई के बारे में विचार तक नहीं लाता और समस्त जग को अपना परिवार मानता है। इसीलिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति का राम तत्व को भीतर से ही जानना बहुत आवश्यक है। तभी हम एक आदर्श समाज की स्थापना कर सकते है।

आज समाज में लोगों की यह धारणा है कुछ नीति नियम रेगुलेशन्स बनाओ, हिंसा समाप्त हो जाएगी। लेकिन क्या आज से पहले कोई नियम-कानून नहीं बने! बहुत बार बने। लेकिन यह एक बुझे ढूंढ के समान है जो शांति की डगर पर प्रकाश नहीं कर सकती। ये मात्र कागज़ के टुकड़े है। एक छोटा-सा नियम है रेड लाइट पर रुकना! वहाँ भी इंसान से रुका नहीं जाता। मन में खलबली होती है, नियम को तोड़कर आगे बढ़ जाता है। हमारी स्थिति ठीक ऐसे ही है हम एक काँटे के पेड़ को काटना तो चाहते है लेकिन हम उसे काटने के लिए उसके पत्तों व डालियों को काट रहे है। इससे उस वृक्ष को कभी खत्म नहीं कर सकते। यदि उसे निर्मल करना चाहते है तो उसकी जड़ो को उखाडिए। इसीलिए नीतियाँ बनाने से कुछ नहीं होगा, हमें तो नीतियों से युक्त मानव का गठन करना होगा। उसके विचारों को परिवर्तित करने के लिए उसके भीतर को परिवर्तित करना होगा। हिंसा की जड़ है इंसान का मन। तब जाकर हिंसा खत्म होगी। जब अच्छा समय था तब भी वही सूर्य और पृथ्वी थे आज भी सब वही है बदला है तो इंसान के विचार और उसका मन।

आज जनसाधारण से ये आवाज़ उठती है यदि हिंसा को रोकना है तो देश को विकसित करना होगा। यदि विकास होगा तो शांति अवश्य होगी। लेकिन यह भी गलत धारणा है क्योंकि जहाँ विकास है वहाँ शांति नहीं होती। जहाँ शांति है वहाँ विकास होता है। अन्यथा अमेरिका जैसा देश जो कितना विकसित है। वहाँ की हालात क्या है? एक-एक साल में वहाँ कितने बड़े-बड़े हथियारों का व्यापार होता है, खरीदे बेंचे जाते है। तो फिर वहाँ पर हिंसा खत्म क्यों नहीं होती। हिंसा जब खत्म हो सकती है जब प्रत्येक मनुष्य का भीतर शांत हो। हथियारों को खत्म कर भी हिंसा नहीं रोक सकते। क्योंकि जिसके मन में हिंसा है वह अपने हाथों को हथियार बना लेगा।

यही किया महात्मा बुद्ध ने अंगुलिमाल डाकू के साथ। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से गीता में कह रहे है-

चज्चलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ।। (गीता 6:34)

हे श्रीकृष्ण! यह मन बड़ा चंचल, प्रमथन स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है। इसलिये उसको वश में करना मैं वायु के रोकने की भाँति अत्यन्त दुष्कर मानता हूँ ।।

तब श्रीकृष्ण कहते है-

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गुह्राते ।। (गीता 6:35)

हे महाबाहो! नि:सन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है; परंतु हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है ।।

अर्थात् मनुष्य जब पूर्ण गुरु के सान्निध्य में आत्मज्ञान को प्राप्त करना है और हमेशा अभ्यास करता है तो चंचल मन को वश में किया जा सकता है। अन्यथा और कोई भी उपाय नहीं है। केवल और केवल ब्रह्मज्ञान के द्वारा ही मन विचार हिंसा को रोका जा सकता है।

यह केवल मात्र कथनी नहीं है इसे प्रमाणित किया भी है और होते हुए भी देखा है। श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा से तिहाड़ जेल व देश की अन्य जेलों में सेवा व सत्संग का मौका मिला। इस परिवर्तन को घटित होते देखा है कि कैसे इंसान का ब्रह्मज्ञान के द्वारा परिवर्तन संभव है। तिहाड़ जेल के अपराधी जिन्हें हम सोच सकते है कितने खूंखार अपराधी होते है। लेकिन आज जब तिहाड़ जेल में 'ब्रह्मज्ञान' की नदी बह रही है तो वहाँ की तो काया ही पलट गई। जिस जिव्हा से हमेशा अपशब्द निकलते थे, जो हाथ कभी सिर्फ हथियार उठाया करते थे, जिन हृदयों में केवल लोगों से बदला लेने की भावना रहती थी, आज वो इस समाज को बदलने के लिए तैयार बैठे है। जिनके हृदय-मुख से हमेशा यह भावना निकलती थी हम बाहर जाते ही पहले उसे ठिकाने लगाएँगे जिसने हमें यहाँ भेजा है। लेकिन ब्रह्मज्ञान से ऐसा परिवर्तन आया कि अब उन हृदयों में सौहार्द और प्रेम की भावना है। आज उन जिव्हा से प्रभु के तराने निकला करते है। अब वह प्रभु सुमिरन में लीन रहा करते है। अब उनका कथन है- हम बाहर जाकर उन लोगों को भी संदेश देंगे ब्रह्मज्ञान का और उन्हें ये बताएंगे जिस प्रकार हमारा जीवन बदला है आप भी अपना जीवन बदल सकते है।

Reformed turns Reformers (सुधरकर जो बने सुधारक) इस पुस्तक में उनके स्वयं के अनुभव लिखे हुए है। ग्वालियर, उत्तराखंड, तिहाड़, राजस्थान, पंजाब ऐसी 22 जेलों में यह 'अन्तरक्रान्ति' (www.antarkranti.org)  प्रकल्प कार्यरत है।

हम इस मन को सही दिशा दे दें उस ईश्वर की ओर। तो समाज कभी भी पतन की राह पर नहीं जाएगा। सिर्फ उत्थान का कारण बनेगा। एक ध्यान आत्मज्ञान ही वो पद्धति है जिससे इंसान के मन विचार को शांत कर सकारात्मकता की ओर ले जाया जा सकता है। आज समाज में चारों ओर समस्याएँ बहुत है समाधान सिर्फ एक है मनुष्य जागृत हो जाए। जब यह आध्यात्मिक क्रांति समाज में आ गई तो शांति भी अवश्य आ जाएगी। सिर्फ राम को तत्व रूप में भीतर से जानना होगा।

इसीलिए हम यह उद्घोष करते है-

विश्व में शांति कैसे आएगी? ब्रह्मज्ञान से। ब्रह्मज्ञान कहा से मिलेगा? दिव्य ज्योति जागृति संस्थान से।

तो इस दीपावली अपने भीतर के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान प्राप्त कर अन्तःकरण में प्रकाश स्वरूप से दिव्य दीपावली उत्सव अवश्य मनाए। और फिर देखें कैसे समाज में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

1 Comment

  1. Geetanjali SaggarOctober 27, 2019 13:57

    Jmjk.This blog shows us the right way to fill up good qualities in oir life.

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