यह सार्वभौमिक तथ्य है कि भगवान के प्रति प्रेम और कृतज्ञता को व्यक्त करने हेतु मानव ने भक्ति रचनाओं व प्रार्थनाओं का संबल लिया है। सर्वशक्तिमान व दिव्यतम चेतना की महिमा का गुणगान करना व सुनना मन, बुद्धि व हृदय को आनंद, शांति और ऊर्जा से भर देता है। ईश्वर महिमा का गुणगान जीवन में भय, चिंता और अन्य नकरात्मकताओं को समाप्त करने का अचूक मार्ग है। भक्ति संगीत द्वारा वातावरण में शुद्धता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी के असीम आशीर्वाद द्वारा भारतीय भक्ति संगीत की प्राचीन विरासत को प्रगट करते हुए, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने 8 जून, 2019 को होशियारपुर, पंजाब में एक भक्ति संगीत कार्यक्रम “भज गोविंदम” (प्रभु चरणों में सरस समर्पण) का आयोजन किया। साध्वी रूपेश्वरी भारती जी ने आध्यात्मिक विचारों द्वारा भक्ति संगीत में निहित सार और आंतरिक विज्ञान को व्यक्त किया।

साध्वी जी ने “नाद” के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि “सामवेद” नाद और स्वर मंत्रों का वेद है। भजन और प्रार्थनाएं, नादब्रह्म से प्रस्फुटित पवित्रता और आनंद से भरी ध्वनि है। इन ध्वनियों को ईश्वर की वास्तविकता का अनुभव करने में उत्प्रेरक माना गया है। भजन या प्रार्थना को सुनने से प्राप्त संतोष और शांति का स्तर अविश्वसनीय है। यह संगीत मन को शांति प्रदान करने के साथ-साथ हमारे विनाशकारी विचारों और कार्यों को सकारात्मकता में बदलने हेतु सक्षम है। शोध द्वारा यह सिद्ध किया गया है कि भजन और मंत्रों को सुनने से हमारी तंत्रिका कोशिकाएँ सक्रिय हो जाती हैं, जो अच्छी न्यूरॉन 'डोपामाइन' को छोड़ती हैं और हमें अधिक विश्लेषणात्मक और एकाग्र बनाती हैं। साथ ही यह संगीत मानवीय गुणों के निर्माण में सहयोग करता है।
साध्वी जी ने समझाया कि मात्र अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति हेतु प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। सकारात्मक विचारों से उत्पन्न प्रार्थना या भजन सकारात्मक स्पंदन को पैदा करते हैं। भजन एक आध्यात्मिक अनुशासन है जिसका उद्देश्य सर्वोच्च शक्ति पर मन को केंद्रित करना है। ब्रह्मज्ञान के माध्यम से ही व्यक्ति परमात्मा में विलीन हो सकता है और स्वयं के सच्चे आनंद का अनुभव कर सकता है। भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति, समाज को वास्तविक धर्म के मार्ग पर अग्रसर करती है। यह समाज में सद्भाव बनाए रखने का सटीक तरीका है। लेकिन ऐसी भक्ति मात्र ईश्वर दर्शन से प्राप्त हो सकती है। आत्मबोध व ईश्वर दर्शन, मानव में दिव्य गुणों को जागृत करता है और उसके भीतर प्रसन्नता, कृतज्ञता, क्षमा और करुणा को भर देता है।

साध्वी जी ने कहा कि भगवान के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा व्यक्त करने के लिए उनके साथ एक वास्तविक संबंध स्थापित करने की आवश्यकता है। जिस प्रकार एक ट्रांसमीटर अपने श्रोता के साथ संबंध स्थापित करने के लिए ध्वनि तरंगों का उत्सर्जन करता है, उसी प्रकार हमें भी ईश्वर से संबंध स्थापित करने हेतु ब्रह्मज्ञान की आवश्कता है। पूर्ण सतगुरु की कृपा से ही एक साधक ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर सकता है। ब्रह्मज्ञान द्वारा ही ईश्वर के वास्तविक नाम से जुड़कर मानव प्रार्थना और भजनों के माध्यम से पूर्ण परमानंद और सकारात्मक स्पंदनों का अनुभव कर सकता है।
साध्वी जी ने अंत में बताया कि परम पूजनीय सर्व श्री आशुतोष महाराज जी एक महान व पूर्ण सतगुरु हैं, जो ब्रह्मज्ञान के माध्यम से साधकों को वास्तविक लक्ष्य प्रदान करते हैं। एक साधक को आध्यात्मिक और संज्ञानात्मक उत्थान हेतु अपने गुरु के निर्देशों का दृढ़ता और विश्वास से पालन करना चाहिए। भौतिकता के इस युग में ध्यान के माध्यम से भगवान का निरंतर स्मरण साधक को नवजीवन से भर देता है।