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अनंत भक्ति को जागृत करने, अंतर शक्ति का संचार करने और साधकों को उनके सच्चे आध्यात्मिक सामर्थ्य की प्राप्ति की राह दिखाने के उद्देश्य से, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) की चंडीगढ़ शाखा द्वारा 14 मार्च 2026 को पंचकुला, हरियाणा में एक दिव्य सुन्दरकांड कथा का आयोजन हुआ। इस पावन प्रवचन का ध्येय भक्ति, साहस और समर्पण के उस मार्ग को उजागर करना था, जिसे प्रभु हनुमान ने अपने जीवन से प्रदर्शित किया, ताकि जनमानस श्रद्धा और गुरु के मार्गदर्शन में जीवन की चुनौतियों को पार करने की प्रेरणा पा सके।

Divine resonance of devotion; Sunderkand Katha illuminates Panchkula, Haryana with Spiritual Awakening

इस आयोजन में विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु और आध्यात्मिक जिज्ञासु उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए। प्रभु हनुमान की अचल भक्ति और आंतरिक शांति प्रदान करने के दिव्य वचन का चुंबकीय आकर्षण सभी को खींच लाया। दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) की शिष्या साध्वी वैष्णवी भारती जी ने अत्यंत प्रभावशाली ढंग से इस कथा का वाचन प्रस्तुत किया। कथा के मध्य भावपूर्ण भजनों और मंत्रोच्चारण ने वातावरण को भक्ति-रस से सराबोर कर दिया। जैसे-जैसे श्रीराम नाम का पावन मंत्र गूंजता रहा, भक्तगण सुन्दरकांड के शाश्वत भाव में डूबकर आध्यात्मिक उत्थान और आंतरिक परिवर्तन का अनुभव करते रहे।

साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि सुन्दरकांड केवल हनुमान जी की लंका यात्रा का वर्णन नहीं है, बल्कि आत्मा की परमात्मा से पुनर्मिलन की खोज का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि यह दृढ़ विश्वास, निस्वार्थ सेवा और अहंकार पर भक्ति की विजय का सौंदर्य निरूपित करता है। हनुमान जी आदर्श शिष्य हैं- अपार शक्ति के धनी होते हुए भी विनम्रता से युक्त। समुद्र पार करने की उनकी यात्रा चंचल मन को पार करने का प्रतीक है, जबकि माता सीता की खोज मानव में खोई हुई शांति की पुनः प्राप्ति का संकेत देती है।

Divine resonance of devotion; Sunderkand Katha illuminates Panchkula, Haryana with Spiritual Awakening

आधुनिक जीवन से तुलना करते हुए साध्वी जी ने कहा कि आज मनुष्य की चिंता, असुरक्षा और असंतोष का मूल उसके दिव्य स्वरूप से विच्छेदन में निहित है। जैसे हनुमान जी को जामवंत जी ने स्मरण कराया और उन्हें अपने छुपे सामर्थ्य का बोध हुआ, वैसे ही प्रत्येक व्यक्ति के लिए सच्चे गुरु की कृपा से अपनी अंतर चेतना का जागरण आवश्यक है।

डीजेजेएस प्रतिनिधि ने उल्लेख किया कि केवल शास्त्रों का श्रवण पर्याप्त नहीं है; उनके उपदेशों को जीवन में उतारना ही वास्तविक साधना है। प्रवचन का केंद्रीय विषय गुरु की अनिवार्य भूमिका रहा। साध्वी जी ने जोशपूर्वक कहा कि जैसे हनुमान जी के प्रत्येक कृत्य राम के स्मरण से प्रेरित थे, वैसे ही साधक का जीवन भी केवल परमज्ञानी गुरु के मार्गदर्शन में ही दिशा पाता है।

उन्होंने आगे समझाया कि गुरु केवल कर्मकांड सिखाने वाले शिक्षक नहीं होते, बल्कि वे ब्रह्मज्ञान के दाता होते हैं—वह दिव्य ज्ञान जो मनुष्य को अपने भीतर ईश्वर का अनुभव करने की सामर्थ्य प्रदान करता है। इस अनुभूति के बिना भक्ति अधूरी और सतही रह जाती है। साध्वी जी ने बताया कि हनुमान जी की शक्ति केवल शारीरिक सामर्थ्य में नहीं थी, बल्कि उनके भीतर हर समय विद्यमान दिव्यता की जागरूकता में थी।

इसी प्रकार, ब्रह्मज्ञान भक्त को ईश्वर से प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने का सामर्थ्य देता है, जिससे यांत्रिक प्रार्थनाएँ भी सच्ची भक्ति में परिणत हो जाती हैं। यह साधक और साध्य के बीच की दूरी को मिटाकर आध्यात्मिकता को सैद्धांतिक धारणा से जीवंत अनुभव में परिवर्तित कर देता है।

अंत में, साध्वी जी ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि वे हनुमान जी के गुणों को अपने जीवन में उतारें- निःस्वार्थ भाव से सेवा करें और चुनौतियों का निर्भीकता से सामना करें। उन्होंने सुंदर ढंग से कहा कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों या कर्मकांडों तक सीमित नहीं रहती; वह तो व्यक्ति के व्यवहार, करुणा और धर्मनिष्ठा में झलकती है।

निश्चय ही, पंचकुला में आयोजित सुन्दरकांड कथा ने आध्यात्मिक प्रकाश स्तंभ के रूप में धर्मप्रेमियों को यह स्मरण कराया कि सुन्दरकांड का सच्चा सार हमारे भीतर के ‘हनुमान’ का जागरण है।

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