विघ्नहर्ता व प्रथम पूजित देव श्री गणेश की पावन उपस्थिति को दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (डीजेजेएस) द्वारा दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) की दिव्य कृपा से 22 से 24 सितम्बर 2026 तक कपूरथला, पंजाब में श्री गणेश कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया। इस कथा कार्यक्रम में अनेक श्रद्धालुओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाई। कार्यक्रम में पहुंचकर उन्हें भक्ति, संगीत और आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण दिव्य वातावरण का अनुभव हुआ। कथा का प्रारंभ भावपूर्ण भक्ति संगीत से हुआ, जिसने एक सम्मोहक और भक्तिमय वातावरण निर्मित किया तथा श्री गणेश की दिव्य कथा के माध्यम से भीतर की यात्रा के लिए एक उपयुक्त भूमिका तैयार की।

कथा का भावपूर्ण एवं ओजस्वी वाचन दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी की प्रचारक शिष्या साध्वी जयंती भारती जी द्वारा किया गया। उन्होंने सरल, स्पष्ट और रोचक प्रस्तुति के माध्यम से भगवान श्री गणेश से संबंधित कथाओं को मानो जीवंत ही कर डाला। साथ ही उनके भीतर निहित गहन आध्यात्मिक ज्ञान को भी उन्होनें उजागर किया। शास्त्रीय तथ्यों का आधार लेते हुए, साध्वी जी ने समझाया कि भगवान श्री गणेश के विविध गुण और दिव्य प्रसंग किस प्रकार बुद्धि, विवेक, नम्रता, आत्मानुशासन तथा विघ्नों पर विजय पाने के गहरे संदेश देते हैं। ये बाधाएँ केवल बाहरी परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि चंचल मन, इच्छाओं एवं अज्ञान से उत्पन्न आंतरिक अवरोधों के रूप में भी सामने आती हैं।
प्रवचन के माध्यम से साध्वी जी ने इस बात पर भी बल दिया कि ये प्राचीन शिक्षाएँ आज के समय में भी पूरी तरह से प्रासंगिक हैं। निरंतर प्रतिस्पर्धा, तनाव, ध्यान भटकाने वाली परिस्थितियों और भौतिक उपलब्धियों की सतत दौड़ से भरी दुनिया में, विभिन्न आयु-वर्ग के लोग अधिकाधिक आंतरिक स्थिरता, स्पष्टता और जीवन के गहरे उद्देश्य की तलाश कर रहे हैं। इसलिए, अध्यात्म किसी एक आयु या जीवन-चरण तक सीमित नहीं है; यह आंतरिक शक्ति, संतुलित जीवन और जीवन के प्रति अधिक सार्थक दृष्टिकोण विकसित करने की नींव बन सकता है।

कथा के केंद्र में यह गहन आध्यात्मिक सिद्धांत था कि सच्ची भक्ति आत्म-साक्षात्कार में परिणत होती है। कथा में बताया गया कि भगवान श्री गणेश से जुड़े प्रतीक जैसे कि उनके विशाल कान, बड़ा मस्तक, छोटी आँखें, हाथ में मोदक व अंकुश आदि गहरे आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक अर्थ समेटे हुए हैं। परंतु इन अर्थों को ब्रह्मज्ञान के माध्यम से होने वाले आंतरिक जागरण के बाद ही पूर्ण रूप से आत्मसात किया जा सकता है।
दशकों से, दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी ब्रह्मज्ञान का प्रसार कर रहे हैं और साधकों को अपने भीतर दिव्यता का अनुभव करने की दिशा में मार्गदर्शन दे रहे हैं। अध्यात्म के इस व्यावहारिक दृष्टिकोण के माध्यम से आज विविध क्षेत्रों के लोग अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक उत्तरदायित्वों के साथ अपने आध्यात्मिक पथ को संतुलित कर पाए हैं। साथ ही, वे अपनी आध्यात्मिक यात्रा को व्यक्तिगत एवं व्यावसायिक दायित्वों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाने में भी सक्षम हुए हैं।
उपस्थित श्रोताओं ने श्री गणेश कथा की सरल किंतु प्रभावशाली प्रस्तुति की खूब सराहना की। साथ ही, उन्होंने शाश्वत शास्त्रीय ज्ञान को समकालीन जीवन की वास्तविकताओं से जोड़ने की इसकी क्षमता को समझते व स्वीकारते हुए इसे जीवन में अपनाने पर भी अपनी इच्छा व्यक्त की। अनेक लोगों ने भविष्य में होने वाले डीजेजेएस कार्यक्रमों में भाग लेने में और ब्रह्मज्ञान के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर इस आंतरिक जागरण की यात्रा को आरंभ करने में भी गहरी रुचि दिखाई।