संस्कारशाला, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के समग्र शिक्षा प्रयास मंथन-सम्पूर्ण विकास केन्द्र द्वारा एक विशेष मासिक पहल है, जो 4 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए समृद्धि प्रदान करने वाला मंच है। यह पहल युवा मस्तिष्कों को शाश्वत गुणों और भावनात्मक दृढ़ता से आकार देने के उद्देश्य से डिज़ाइन की गई है। इन सत्रों में अनुभवात्मक शिक्षा और मूल्य-आधारित शिक्षा का समावेश किया जाता है।

इस माह मंथन-SVK ने ‘अक्रोध संस्कारशाला’ के माध्यम से धर्म के दशम् लक्षण पर विशेष प्रकाश डाला, जिसमें क्रोध पर नियंत्रण को एक महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य के रूप में रेखांकित किया गया। सुविचारित सत्रों ने विद्यार्थियों को यह समझने में सहायता प्रदान की, कि भावनात्मक नियंत्रण में क्षणिक शिथिलता भी उनके शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण को प्रभावित कर सकती है। संवादात्मक चर्चाओं एवं आत्मचिंतनात्मक गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों ने भावनात्मक सजगता तथा आत्मसंयम विकसित करने की व्यावहारिक रणनीतियाँ सीखीं।
जनवरी 2026 में, कुल 57 अक्रोध संस्कारशाला - दश धर्म लक्षणम् कार्यशालाएँ आयोजित की गईं, जिनसे DJJS की सभी शाखाओं में लगभग 2569 बच्चों को लाभ हुआ, जिनमें NRI बच्चे और देश भर के विभिन्न स्कूलों के छात्र शामिल थे।

- बेंगलुरु
- व्हाइट पर्ल ASR कन्वेंशन सेंटर, येलहंका
- हरियाणा
- जैन पब्लिक स्कूल – रेवाड़ी
- विद्यानंद कॉलोनी, आर.के. पब्लिक स्कूल – पानीपत
- उत्तर प्रदेश
- राजकीय बाल गृह (शिशु) – मेरठ
- गुरुकृपा स्कूल, रजनी विहार कॉलोनी – पिलखुवा
अक्रोध संस्कारशाला: दश धर्म लक्षणम् – इस माह का अक्रोध पर केंद्रित विषय कई मूल्य-उन्मुख पहलों और मंथन द्वारा संचालित सुविचारित गतिविधियों का आधार बना। धर्म के दसवें आवश्यक सिद्धांत के रूप में निहित इन सत्रों ने बच्चों को अपने विचारों, शब्दों और कार्यों में भावनात्मक संयम और सचेत प्रतिक्रिया विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
आकर्षक वीडियो के माध्यम से आवेगपूर्ण प्रतिक्रियाओं के दुष्परिणामों को वास्तविक जीवन प्रसंगों सहित प्रस्तुत किया गया, वहीं कथावाचन सत्रों द्वारा धैर्य एवं आत्मसंयम के प्रभावशाली नैतिक संदेशों का संप्रेषण किया गया। अंतःक्रियात्मक गतिविधियों, समूह चर्चाओं और उल्टी गिनती और गहरी साँस लेने के व्यायाम जैसी व्यावहारिक तकनीकों ने विद्यार्थियों को भावनाओं के रचनात्मक प्रबंधन के उपायों का प्रत्यक्ष अनुभव कराया। इस एकीकृत दृष्टिकोण के माध्यम से विद्यार्थियों में आत्म-जागरूकता तथा क्रोध की संतुलित एवं उत्तरदायी अभिव्यक्ति के प्रति परिपक्व दृष्टिकोण विकसित हुआ।
सत्र की समाप्ति शांतिमंत्र और प्रार्थना के साथ हुई। सभी ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के पवित्र कमल चरणों में अपना विनम्र प्रणाम अर्पित किया। उनकी दिव्य करुणा और मार्गदर्शन के माध्यम से इस माह की थीम ‘दश धर्म लक्षणम्’ विद्यार्थियों की मनोवृत्ति, व्यवहार एवं अंतःचेतना पर सूक्ष्म किन्तु गहन प्रभाव छोड़ने में समर्थ रही।
The sessions drew to a serene close with the collective chanting of the Shanti Mantra, fostering an atmosphere of calm and reflection. Participants offered their respectful obeisance at the sacred lotus feet of Divya Guru Shri Ashutosh Maharaj Ji. Through His benevolent grace and spiritual guidance, the essence of this month’s theme – दश धर्म लक्षणम् was meaningfully embodied, subtly influencing the students’ mindset, behaviour and inner consciousness.
