गौवंश की ओर सहानुभूति की आवश्यकता प्रतिपादित करती

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13 अप्रैल 2018 से 19 अप्रैल 2018 तक महाराष्ट्र के पाथर्डी (जिला अहमद नगर) में  दिव्य ज्योति जागृति संस्थान द्वारा सात दिवसीय भव्य गौ कथा आयोजित की गई। इस अवसर पर श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी गरिमा भारती जी ने कथा वाचन द्वारा गौ सेवा के महत्व पर बल दिया। साध्वी जी ने श्रीमद्भागवत महापुराण के दृष्टांत द्वारा इस तथ्य को सभी के आगे बखूबी प्रस्तुत किया। साध्वी जी ने उल्लेख किया कि एक बार मनुष्यों के शोषणकारी दोहन से व्यथित हो पृथ्वी ने गाय का रूप धारण किया| धरती ने किसी प्रकार की कोई पैदावार, अन्न, फसल, फल यानि कोई उपज न करने का फैसला कर लिया। उस समय भगवान विष्णु ने गौ रूप धारण की पृथ्वी से इंसानों को एक और मौका देने का अनुरोध किया। साथ ही, भगवान विष्णु ने आश्वासन भी दिया कि अगले अवतार में वह उनकी रक्षा करेंगे और अपने जीवन चरित्र के माध्यम से जगत में गौ सेवा का एक उदाहरण भी स्थापित करेंगे। इसलिए, श्री कृष्ण के रूप में भगवान विष्णु ‘गो-पाल’ (गायों के संरक्षक) बने। माखन के लिए अपनी रूचि के साथ, श्री कृष्ण के रूप में भगवान विष्णु ने गायों के लिए अपनी प्रतीकात्मक पसंद को प्रस्तुत किया| लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह कि उन्होंने मानव जाति के लिए गायों की आवश्कता को सिद्ध करते हुए उनकी रक्षा करने की आवश्यकता को स्पष्ट समझाया।

साध्वी जी ने समकालीन समय में भी गायों के लिए सुरक्षात्मक देखभाल प्रदान करने की आवश्यकता से जुड़े मुद्दे को भी उठाया। साध्वी जी ने कहा कि तथ्य बताते हैं कि आज गाय का उपयोग केवल दूध प्राप्ति होने तक किया जाता है फिर या तो उन्हें त्याग दिया जाता है या कसाईयों को सौंप दिया जाता है। इसलिए इस समय, गायों की ओर अपनी जिम्मेदारी को समझना महत्वपूर्ण है। साध्वी जी ने जोर देकर कहा कि गाय मारने योग्य नहीं है बल्कि वे तो अपने आसपास के परिवेश के लिए भी अत्यंत संवेदनशील होती हैं। जब हम मनुष्य एक दूसरे के लिए ही विचारशील नहीं होते तो मौखिक तौर पर कुछ न कह सकने वाली गौ की देखभाल या उसके प्रति सहानुभूति भला कैसे संभव है| इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हुए साध्वी जी ने आंतरिक स्थिरता व शांति को समझने की आवश्यकता को उजागर किया क्योंकि केवल तभी गायों के लिए संवेदनशील हुआ जा सकता है।

साध्वी जी ने आंतरिक आशांति के निवारण के रूप में आंतरिक जागरूकता उत्पन्न करने वाली प्राचीन भारतीय तकनीक ब्रह्मज्ञान की भी चर्चा की। इस विधि से ही एक व्यक्ति व्यावहारिक रूप से अपने भीतर साक्षात् ईश्वरीय अनुभूति करने में सक्षम हो पाता है| इसी के साथ, अंत:करण में आंतरिक बुद्धिमता यानि विवेक प्रकट होता है, जिससे व्यक्ति विनम्र, रचनात्मक और संवेदनशील बन जाता है। शाश्वत ज्ञान से जुड़े होने के कारण, व्यक्ति का हृदय गौ माता के लिए भी सहानुभूति से भर उठता है। हालांकि, इसके लिए सबसे पहले एक पूर्ण तत्ववेता सतगुरु की तलाश करनी चाहिए क्योंकि एक सच्चे गुरु की कृपा के बिना ब्रह्मज्ञान पाना संभव नहीं। इस प्रकार, साध्वी जी ने उपस्थित भक्तों को वर्तमान युग के सतगुरु श्री आशुतोष महाराज जी से ब्रह्मज्ञान लेकर अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करने के लिए प्रेरित भी किया|

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