संस्कारशाला, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान (DJJS) के समग्र शिक्षा प्रयास मंथन-सम्पूर्ण विकास केन्द्र (SVK) द्वारा एक विशेष मासिक पहल है, जो 4 से 12 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए समृद्धि प्रदान करने वाला मंच है। यह पहल युवा मस्तिष्कों को शाश्वत गुणों और भावनात्मक दृढ़ता से आकार देने के उद्देश्य से डिज़ाइन की गई है। इन सत्रों में अनुभवात्मक शिक्षा और मूल्य-आधारित शिक्षा का समावेश किया जाता है।

अगस्त 2026 में, मंथन SVK ने अपनी श्रृंखला “स्वच्छ आदतें, श्रेष्ठ संस्कार” के अंतर्गत “किचन हाइजीन” (रसोई की स्वच्छता) विषय पर एक प्रेरणादायी संस्कारशाला सत्र आयोजित किया। व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से बच्चों ने बर्तनों की स्वच्छता, समुचित खाद्य भंडारण और व्यवस्थित रसोई प्रबंधन के अनिवार्य नियमों को सीखा, जिससे उनमें व्यक्तिगत अनुशासन, उत्तरदायित्व और दैनिक आरोग्य के मूलभूत संस्कारों का बीजारोपण हुआ।
इस माह के दौरान संस्थान की विभिन्न शाखाओं में 45 संस्कारशाला कार्यशालाओं का सफल आयोजन किया गया, जिनसे लगभग 1,976 बच्चे लाभान्वित हुए। इनमें भारतभर के DJJS मंथन केंद्रों के विद्यार्थियों के साथ-साथ प्रवासी भारतीय (NRI) प्रतिभागी भी सम्मिलित रहे:

- उत्तर प्रदेश
- लाल बहादुर शास्त्री सरस्वती शिशु मंदिर, मुरादनगर
- गुजरात
- जी.डी. गोयनका पब्लिक स्कूल, जामनगर
- श्री सरस्वती विद्यालय, गोकुल नगर, जामनगर
- राजस्थान
- चेतना पब्लिक सेकेंडरी स्कूल, बोरखेड़ा, कोटा
इन सत्रों के माध्यम से बच्चों को यह समझाया गया कि बीमारियों और खान-पान संबंधी स्वास्थ्य समस्याओं से बचाव में रसोई की स्वच्छता की क्या भूमिका है। संवादात्मक गतिविधियों, व्यावहारिक प्रदर्शनों और ज्ञानवर्धक वीडियो के द्वारा बच्चों ने भोजन से पूर्व हाथ धोने, फल-सब्जियों को भली-भांति साफ करने, भोजन ढककर रखने, स्वच्छ बर्तनों का उपयोग करने, सुरक्षित भंडारण व प्रशीतन (रेफ्रिजरेशन), अपशिष्ट निस्तारण तथा खाद्य संदूषण (क्रॉस-कंटेमिनेशन) से बचाव के नियम सीखे। इसके साथ ही, गैस बर्नर व नल बंद रखने, ज्वलनशील सामग्री को अग्नि से दूर रखने तथा सिंक व कार्य-सतहों को स्वच्छ रखने जैसे दैनिक सुरक्षा उपायों के प्रति भी विद्यार्थियों को सजग किया गया।
इसके अतिरिक्त, कार्यशालाओं में रसोई की स्वच्छता को अनुशासन, स्वावलंबन और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ा गया। बच्चों को अपने बर्तन स्वयं धोने, रसोई को व्यवस्थित रखने, बड़ों की सहायता करने, भोजन-जल परोसने और परिवारजनों की आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील रहने हेतु प्रेरित किया गया। इन सरल व्यवहारों के माध्यम से बच्चों ने जाना कि रसोई केवल भोजन निर्माण का स्थान नहीं, बल्कि वह दायित्व-बोध, सेवा-भाव और आत्मीय मूल्यों को व्यवहार में लाने का एक पावन माध्यम है।
अंत में समस्त प्रतिभागियों ने सामूहिक रूप से शांति मंत्र का उच्चारण किया, जिससे वातावरण शांति, सकारात्मकता एवं आध्यात्मिक आनंद से ओतप्रोत हो उठा। तत्पश्चात सभी बच्चों ने श्रद्धापूर्वक दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के पावन चरणों में नमन अर्पित कर उनकी दिव्य कृपा एवं आशीर्वाद की प्रार्थना की।
