दिव्य धाम में आयोजित मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम ने सभी के कल्याण हेतु दिव्य पथ प्रदान किया

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हमें अपना आशीर्वाद दें, हे दिव्य भगवान! कभी भी आलस्य या अनर्गल चर्चा हमें नियंत्रित नहीं कर पाएं। हम हमेशा आपके प्रिय बने रहें। आपकी संतान होने के नाते, हम इस ज्ञान की किरणों को हर जगह फैला सके। (ऋग्वेद)

दिव्य धाम में मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रम का शुभारम्भ वेदों मंत्रों के उच्चारण से हुआ, जिसने निस्वार्थता की राह पर चलने और सत्य का संदेश फैलाने के लिए प्रेरित किया। सर्व श्री आशुतोष महाराज जी ने अपने प्रत्येक शिष्य को ऐसी ही भावना से ओतप्रोत हो मार्ग पर बढ़ने हेतु प्रेरित किया है। गुरुदेव के दिव्य लक्ष्य में योगदान करते हुए, हमें इस तथ्य के प्रति सचेत रहना होगा कि हम आलस्य और व्यर्थ की बातों में अपनी बहुमूल्य श्वासें बर्बाद न करें। विश्व में प्रकाश को फैलाने के लिए एक सूक्ष्म भावना, इरादा और प्रयासों की आवश्यकता होती है जो हम सभी को प्रदान कर सकते हैं।
गुरु-शिष्य संबंध के बंधन को पोषित करने, प्रेरित करने और दृढ़ करने के लिए, दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान, देश भर में ऐसी सभाएँ करता है और 6 जनवरी, 2019 को ऐसा ही विलक्षण कार्यक्रम दिल्ली में आयोजित किया गया। संस्थान प्रचारकों ने समझाया कि वास्तविक स्वतंत्रता, कल्याण और शांति के वास्तविक मार्ग की खोज करने के लिए न तो विज्ञान और न ही प्रौद्योगिकी बल्कि व्यावहारिक आध्यात्मिकता ही एकमात्र सहारा है। हर युग में समय के आध्यात्मिक सतगुरु अपने आध्यात्मिक ओज से सम्पूर्ण समाज को जागृत करते है।

उन्होंने समझाया कि एक समर्पित शिष्य को हमेशा सच्चाई और धर्म का संदेश फैलाने के लिए उत्साह और जोश से भरा होना चाहिए और कठिनाइयों से नहीं डरना चाहिए। उन्होंने आगे भगवान बुद्ध के उत्साही शिष्य पूर्णा का उद्धरण दिया। एक बार मार्ग से गुजरते हुए भगवान बुद्ध ने इच्छा व्यक्त की कि कोई इस गावं के लोगों को सत्य और धर्म का संदेश दे। पूर्णा ने तुरंत आदेश माँगा लेकिन भगवान बुद्ध ने चिंता व्यक्त की कि ग्रामीण असभ्य हो सकते हैं और शायद उनकी बात नहीं सुनेंगे। शायद उसे गाँव से बाहर फेंक दें, जिस पर पूर्णा ने कहा- "तो क्या तथागत, तब मैं अपने आप को भाग्यशाली समझूंगी कि उन्होंने मुझे गाँव से बाहर निकाल दिया और मुझे चोट नहीं पहुँचाई या मुझे नहीं मारा"। फिर भगवान बुद्ध ने कहा- "क्या होगा अगर वे क्रूर और क्रोध में आपको मार दे"। इस पर पूर्णा ने उत्तर दिया - "तब मैं अपने आप को दुनिया में सौभाग्यशाली मानूंगी कि इस सत्य और ईश्वरीय संदेश को फैलाने के लिए जीवन को त्याग दिया।" ऐसा ही शिष्य का भाव होना चाहिए।

संस्थान प्रचारकों ने समझाया कि विभिन्न चुनौतियाँ और बाधाएँ में एक भक्त को विश्वास का संबल ले भक्ति मार्ग से गुजरना पड़ता है। जिस प्रकार नदियों का अथाह जल महासागर को विचलित नही करता, उसी तरह जिसके मन में शांति स्थापित हो जाती है फिर कोई भी संघर्ष या बाधाएं उसे विचलित नहीं कर पाती।
भक्तों द्वारा गाए गए भक्ति गीत ज्ञान और भावों से ओतप्रोत थे। हजारों लोग आध्यात्मिकता और दिव्य प्रेम की आभा में डूब गए। कार्यक्रम का समापन सभी भक्तों के लिए प्रसादम भोज द्वारा किया गया।
 

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