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हाल ही में 5 दिसंबर 2021 को दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा जोधपुर, राजस्थान में मासिक आध्यात्मिक भंडारा कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम के द्वारा समाज के लिए नि:स्वार्थ सेवा का महत्व समझाया गया।

Value of Selfless Contribution to Society Explained at Monthly Spiritual Congregation - Jodhpur, Rajasthan

वैश्विक महामारी के इस दौर में हर कोई खुश रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। असुरक्षा, लालच, ईर्ष्या, भय, इत्यादि के कारण इंद्रियों से प्रेरित मन कभी शांत नहीं रहता। हम शांति पाने और लाने के लिए अनेकों प्रयास करते हैं; लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण ऐसा कर नहीं पाते। और न ही समाज की बेहतरी के लिए नि:स्वार्थ सेवा अर्पित कर पाते हैं । आज स्वार्थ के चलते, ऐसा लगता है मानो मानव समाज को जोड़ने वाला सूत्र टूट गया है।

इन परिस्थितियों में इन मासिक आध्यात्मिक कार्यक्रमों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। कारण कि ये नि:स्वार्थता, भक्ति और वैश्विक शांति के वास्तविक सार को उजागर करते हैं।

Value of Selfless Contribution to Society Explained at Monthly Spiritual Congregation - Jodhpur, Rajasthan

कार्यक्रम की शुरुआत वैदिक मंत्रोच्चारण से हुई। इसके बाद प्रेरक प्रवचनों व भक्तिपूर्ण भजनों ने अंतर्भावों को उठाने की भूमिका निभाई। इनके द्वारा सबने अपने विचलित मन में सुकून का अनुभव किया। फिर संस्थान के विद्वत प्रचारकों ने महाभारत के उदाहरणों के माध्यम से समाज में सच्चे व नि:स्वार्थ योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पितामह भीष्म, जिन्होंने राजा का पद त्याग दिया और आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा कर डाली; लेकिन भीष्म का यह त्याग समाज के लिए उचित नहीं रहा। इस त्याग ने उन्हें सिंहासन पर आरूढ़ कौरवों की सेवा के बंधन में सदा के लिए बांध दिया। कर्ण का जीवन भी अंतर्विरोधों से भरा था। वे दानवीर थे लेकिन उनके प्रिय मित्र थे दुर्योधन और वो हमेशा ईर्ष्या की आग में जलते रहे। द्रोणाचार्य ने भी अधर्म के समर्थन का मार्ग चुना। यूँ तो द्रोणाचार्य एक नि:स्वार्थ शिक्षक थे। अतः वे बिना धन लिए अध्यापन करते थे। परन्तु उनका पुत्र अश्वत्थामा उनकी सबसे बड़ी कमजोरी था। द्रोण के पुत्र-मोह ने उन्हें धर्म के मार्ग से विचलित कर दिया। अंततः वे चुपचाप दुर्योधन की सभी दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों का समर्थन करते रहे।

इन कथाओं से पता चलता है कि इन्होंने अधर्म का ही समर्थन किया। इन्होंने त्याग किए और कष्ट सहे, लेकिन इनके सभी प्रयास अधर्म का समर्थन करने के लिए थे। इनके कार्यों ने समाज के लिए कुछ अच्छा नहीं किया; बल्कि पतन ही किया। युग बीतते हैं, पर परिस्थितियां एक जैसी ही रहती हैं। केवल पात्र बदल जाते हैं। हम भी अच्छे कार्य करते हैं, लेकिन निहित स्वार्थ के साथ। एक सच्चा ब्रह्मज्ञानी ही नि:स्वार्थ प्रेम व सेवा की शक्ति को जानता है कि इनसे कैसे बिगड़ी हुई सामाजिक स्थिति को बदला जा सकता है। केवल एक पूर्ण दिव्य गुरु ही एक आत्मा को जागृत कर सकते हैं, जैसे कृष्ण ने अर्जुन को किया था।   

केवल ध्यान ही हमारे मन व विचारों को नियंत्रित कर सकता है। भक्त को निःस्वार्थ भाव से पूरी तरह गुरु के सामने आत्मसमर्पण कर अपने मार्ग में आने वाली सभी चुनौतियों को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए। सेवा के किसी भी अवसर को एक सेवक को खुशी-खुशी स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि तभी वह गुरु की शिक्षाओं को आत्मसात करने और इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने में सक्षम होगा।  

ये कार्यक्रम हर बार आध्यात्मिक शक्ति के स्रोत के रूप में सिद्ध होते हैं, जो नि:स्वार्थता, भक्ति और पूर्ण गुरु के महत्व को समझाते हैं। आत्म-जागृति के इस मार्ग में पूर्ण गुरु ही शिष्य के एकमात्र मार्गदर्शक होते हैं।

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