प्रेय में मग्न या श्रेय की लगन?

एक बार दो घनिष्ट मित्र व्यापार के सिलसिले में जहाज़ से दूसरे शहर जा रहे थे। जहाज़ सभी प्रकार की उख-सुविधाओं से अटा हुआ था। दोनों ही मित्र बेहद खुश थे। परन्तु दुर्भाग्य! मौसम ने करवट बदली। अचानक आसमान ने काले बादलों का कम्बल ओढ़ लिया। प्रचंड आँधी-तूफ़ान उनके जहाज़ को ... । हाय! अचानक सागर के गर्भ से तकरीबन 15 फुट ऊँची एक लहर उठी और जहाज़ के ऊपर इतनी जोर से झपटी कि वह चरमराता हुआ सागर में विलीन हो गया। उस पर सवार सभी लोग भी लहरों की भेंट चढ़ गए। पर शायद इन दोनों मित्रों की जीवन-रेखाओं में अभी मृत्यु का योग नहीं था। तभी तो इनके हाथ लकड़ी का एक टुकड़ा लग गया, जिसके सहारे ये एक टापू तक पहुँच गए।

वह टापू बेहद सुनसान .... वहाँ न चिड़िया न बंदा! .. दूर-दूर ... बस घने ज़हरीले पेड़-पौधे। दोनों सहम गए। ... इस टापू से कैसे निकला जाए? कुछ नहीं सूझ रहा था। ... तभी एक मित्र ने दूसरे से कहा- 'मित्र, क्यों न हम टापू को आधा-आधा बाँट लें? हमारे पास कुछ शेष तो बचा नहीं है। बस ईश्वर से  प्रार्थना करते हुए मैं दूसरी ओर निकल पड़ता हूँ और तुम इसी राह को पकड़ लो। जिसकी किस्मत होगी, उसकी प्रार्थना परमात्मा मंजूर कर लेगा और वह बच  निकलेगा।'  यह सोच दोनों हाथ जोड़ बोले- 'हे प्रभु! अब हम तेरे हवाले।' और दोनों अपनी-अपनी राह पर बढ़ चले। ...रात-दिन, सावन-पतझड़, गर्मी-सर्दी- ये विलोम सदा से इंसान के जीवन के पर्याय रहे हैं। तभी तो वेह एक क्षण में सुख का अनुभव करता है, तो दूसरे ही पल उसे दुःख आ घेरता है। ...पर दुःख ... दुःख में उसे याद आती है उस सत्ता की ... कई बार हमारी करुण प्रार्थना को सुनकर वह परमात्मा पसीज उठता है और हमारी इच्छाएँ पूरी भी कर देता है।  परन्तु ... सावधान! कहीं हमारी प्रार्थना कुंभकर्ण या भस्मासुर जैसी तो नहीं! क्या प्रार्थनाएं इन दोनों मित्रों ने की होंगी, इस टापू पर बढ़ते हुए, जानने के लिए पढ़िए मार्च 2013 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान पत्रिका।

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