भारत की बात सुनाता हूँ!

एयर इंडिया का हवाई जहाज़ अमेरिका से भारत की ओर उड़ान भर रहा है। इसमे बैठे हैं-जॉन रिचर्डसन। उनके मानस-पटल पर अंकित है, भारत की तस्वीर। ऐसी तस्वीर, जो अत्यंत पारम्परिक व रूढ़िवादी मान्यताओं के रंग से रंगी है। जॉन भारत को मात्र साँप- सपेरों वाला दरिद्र व कर्मकांडी देश मानते हैं तथा भारतवासियों को अंधविश्वास व काले जादू में उलझे लोग! कुछ ऐसे ही दृष्टिकोण के साथ जॉन रिचर्डसन अपने मित्र डॉ. प्रणव दास के आमंत्रण पर भारत आ रहे हैं। डॉ.प्रणव भारतीय इतिहास व दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं। उनका उद्देश्य जॉन को भारत का कराना है। ताकि जॉन भारत के वास्तविक स्वरूप व संस्कृति से परिचित होकर अपनी मानसिकता को बदल सकें।

प्रातः काल... डॉ. प्रणव जॉन को गाँव की सैर कराने ले चले। सबसे पहले वे गाँव की प्रसिद्ध नदी के तट पर पहुँचे। यहाँ का नज़ारा जॉन के लिए अद्वितीय था। सामने से सूर्य उदित हो रहा था और ठंडी-ठंडी पवन बह रही थी। इन सब का आनंद उठाते हुए जॉन बोले-

जॉन- यहाँ की हवा में तो अजब सी ठंडक व ताज़गी है। 

डॉ. प्रणव- हाँ! प्रकृति यहाँ पर अपनी पूरी छटा बिखेरे हुए है। ज़रा नदी के पानी में हाथ डालकर तो देखो.

जॉन झुककर पानी में हाथ डालते हैं।

... देखो! ये नदी में कुछ फेंक रहे हैं। मैं सही सोचता था, भारत यानी अंधविश्वासों और झूठी मान्यताओं में फँसा देश! तभी तो  नदियों में उल्टी-पुलटी चीज़ें डालकर इन्हें दूषित कर दिया जाता है. कब समझेंगे ये भारतवासी?

डॉ. प्रणव- अरे! ठहरो! ठहरो! समझने की ज़रूरत जितनी इन्हें है, उतनी तुम्हें भी है। जिन्हें तुम उल्टी-पुलटी चीज़ें कह रहे हो,  वे सिक्के हैं। हमारे भारत में ऐसी मान्यता हुआ करती थी कि नदी में सिक्के डालने से जीवन में कामयाबी मिलती है।

जॉन- फिर से वही इल्लाजिकल (निराधार) बातें!

डॉ. प्रणव- इल्लाजिकल नहीं, पूर्णतः वैज्ञानिक(साइंटिफिक)!

जॉन (हैरानी से)- साइंटिफिक?

...

क्या डॉ. प्रणव अपने मित्र जॉन की मानसिकता को बदलने में सफल हो पाते हैं या नहीं? क्या जॉन का नज़रिया भारत के प्रति परिवर्तित होता है या नहीं? ये सब पूर्णत: जानने के लिए पढ़िये दिसम्बर'14 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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