वो तूफान, जो तूफानों से भिड़ गए!

महाकुंभ (उज्जैन, 2016) के आयोजन में एक अनोखा दृश्य देखने को मिला। दो तूफानों को आमने-सामने होकर एक-दूसरे से लोहा लेते देखा गया। एक तूफान था, जो प्रकृति की कमान से अंधड़ गति से छूटा था। घनघोर घटाएँ, चक्रवाती हवाएँ... झंझावाती बरसात ... मानो इंद्र ने कुपित होकर इस तपोभूमि पर वज्रपात कर डाला हो! सिंहस्थ का अधिकाँश भाग इस तूफान की चपेट में आ गया। कुछ शिविर तो पूरे के पूरे ढह गए। पंडाल उखड़ गए, तहत-नहस हो गए। तोरण द्वार धराशायी हो गए।

लेकिन... इस प्रलयकारी मंजर में एक तपस्या-स्थली गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की भी थी। प्राकृतिक तूफान आते ही इस शिविर से उसकी टक्कर का दूसरा तूफान उठा। यह तूफान था- महाराज जी के बेटे-बेटियों का। उनके सीनों से उठते जज़्बातों के जज़्बे का! गुरु महाराज जी का प्यार  उनकी रगों में दौड़ते खून  में कैसे रला-मिला है-इसका आँखों को भावाश्रुओं से धो देने वाला प्रमाण सिंहस्थ में देखने को मिला। ये युवा ह्रदय में प्रेम और तन पर गुरूवर के स्वरूप वाली टी-शर्ट पहन कर मिट्टी में मिट्टी हो गए। खराब मौसम के घातक हमलों से जूझ गए। क्रांति ढोल बजा-बजा कर उन्होंने सबको बता दिया- हम युगपुरुष आशुतोष के अजेय स्रृजन सेनानी हैं! मोह की लोरियों ने नहीं, गुरुवर के शौर्य-गीतों ने हमें पाला-पोसा है-

तुम्हारे रक्त में निर्बाध गति है नौजवानों!

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गुरुवर के तुम्हीं सुग्रीव हो, हनुमान हो तुम!

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है गुरुवर साथ रख विश्वास बढ़ चलो सत्य-पथ पर!

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बरसात का प्रकोप सिंहस्थ की नगरी को बहा रहा था। ब्यौरे मिलते हैं कि बहुत से तीर्थयात्रियों को सिर छुपाने के लिए  सही-सलामत शिविर नहीं मिल रहे थे। ऐसे में दिव्य ज्योति शिविर का भव्य पंडाल परिसर उनके लिए गोवर्धन की छत्रछाया जैसा सिद्ध हुआ। हमारे रिकार्ड रजिस्टर बताते हैं- तूफान वाली रातों में हजारों लोगों ने इस गोवर्धन तले शरण ली।

...उसे किसने अपनी कृपा की अदृश्य कनिष्ठिका पर उठाया हुआ था? किसकी सेवा की अडोल लाठियाँ लगाईं गई? पूर्णत: जानने के लिए पढ़िए जुलाई'16 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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