क्या आपको अध्यात्म की आवश्यकता है?

 

आज के तकनीकी और विकासशील युग में 'अध्यात्म' की क्या सार्थकता है? इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए आइए सबसे पहले इतिहास के पन्नों पर दर्ज कुछ प्रसंगों को पढ़ते हैं।

जब धन का आधिक्य भी रुग्ण मन को स्वस्थ नहीं कर पाया!


ओलिवर ब्लैक अमेरिका के एक उद्योगपति थे। बाहर से बेहिसाब समृद्धि हासिल करने पर भी आंतरिक दरिद्रता उनको किस स्तर तक छू चुकी थी, इसका विवरण ओलिवर खुद अपने शब्दों में देते हैं-


'... उस समय मेरी स्थिति बेहद दयनीय थी। इतनी कि मैं आधा मील दूर दवाई की दुकान तक जाने में भी घबराता था। मुझे रोगभ्रम (hypochondria) था।... कहने का मतलब कि तन से भले ही भला-चंगा दिखता था, लेकिन मन से काफी बीमार था। इस बीमारी से मुक्ति पाने के लिए बेहिसाब गोलियाँ खाता था। तनाव दूर करने की गोलियाँ, सिरदर्द के लिए ढेरों-ढेर गोलियाँ आदि। यहाँ तक कि मैं दर्शनशास्त्र की कक्षाओं में भी भाग लिया करता था- अपने जीवन की सार्थकता को समझने के लिए।'


परन्तु इन सभी तरीकों को अपनाने के बाद भी ओलिवर की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। मन से न तो तनाव गया, न ही नीरसता। धन-संपत्ति अनंत थी; किंतु मानसिक विपत्ति भी बेअंत थी।


फिर सन 1931 में, एक पार्टी में उनकी मुलाकात योगानंद परमहंस से हुई। तब उनके जीवन में क्या हुआ? इसे भी उनके ही द्वारा लिखी एक पंक्ति बखूबी दर्शाती है- He changed the whole direction of my life!-  उन्होंने मेरे जीवन की दिशा को पूर्णतः बदल दिया।' 


... कैसे? 


... जब व्यसनों ने जीवन को बुरी तरह जकड़ डाला!


... जब अपने ही बोझ समझने लगे!


इन सब में अध्यात्म की क्या आवश्यकता है? जानने के लिए पढ़िये आगामी महीने की जनवरी'19 हिंदी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका!

 

Need to read such articles? Subscribe Today