प्रभावों के प्रभाव!

आधुनिक जगत में प्रचलित कुछ ऐसे प्रभावों को जानते हैं, जो हमारे व्यवहार के अहम् हिस्से बन चुके हैं। उनको सही से समझकर हम अपने जीवन को एक नई दिशा दे सकते हैं।


बाईक शेडिंग इफेक्ट


आपके समक्ष एक ऑफिस की सच्ची घटना रखते हैं। उस ऑफिस में एक आवश्यक मीटिंग बुलाई गई। साथ ही, सब कर्मचारियों को यह संदेश पहुँचाया गया कि मीटिंग के बाद, रेस्तरां से खाना मँगवाकर सब एक-साथ लंच करेंगे। पर जानते हैं कि उस एक घंटे की मीटिंग में क्या हुआ? उस मीटिंग में 45 मिनट तक इसी बात पर चर्चा चलती रही कि खाने में छोले-भटूरे मँगवाए जाएँ या डीलक्स थाली या पिज़्ज़ा या कुछ और! मात्र 15 मिनट मीटिंग के विशेष मुद्दे पर थोड़ी सी चर्चा हो पाई, जिसे फिर अगली मीटिंग के लिए टाल दिया गया।


निश्चित ही ऐसी परिस्थितियों के आप भी साक्षी रहे होंगे, जहाँ सोच और चर्चा मूल और महत्वपूर्णी विषय की जगह किसी गैर ज़रूरी विषय पर चली जाती है। इसी व्यवहार को 'बाईक शेड इफेक्ट' कहते हैं।


इसी इफेक्ट को सबसे पहले, सन् 1957 में सी. पारकिंसन ने एक कार्यालय की कहानी के रूप में रखा था। उस कहानी में अफसरों को मिलकर एक महत्वपूर्ण विषय पर निर्णय लेना था कि परमाणु ऊर्जा प्लांट की मंजूरी देनी चाहिए या नहीं?...  बैठक शुरु हुई। अभी इस अहम् विषय पर चर्चा होनी आरम्भ ही हुई थी कि जहाँ प्लांट बनाना था, वहाँ उसके पास एक बाईक शेड ( बाईक्स खड़ी करने के लिए छप्पर डला एक स्थान) बनाने की बात उठी। इसके पीछे वजह रखी गई कि ऐसा करने पर कर्मचारियों व अफसरों को संतोष रहेगा कि उनके वाहन सुरक्षित खड़े हैं। इस प्रस्ताव को सब अफसरों ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। पर चर्चा दोबारा परमाणु प्लांट पर आ ही नहीं पाई। अपितु सबकी रुचि बाईक्स वाले स्थान का छप्पर कैसा हो...  इस ओर चली गई। क्योंकि छप्पर के विषय पर विचार-विमर्श करना सबके लिए सरल था। अतः सबने आगे का सारा समय सिर्फ इस निर्णय को लेने में लगा दिया कि छप्पर कैसा और किस रंग का होना चाहिए।


जिन अफसरों को परमाणु प्लांट जैसे गंभीर विषय के बारे में निर्णय लेना था, वे गैर ज़रूरी बाईक शेड जैसे विषय पर ही अपना चिंतन, समय और ऊर्जा व्यर्थ करते रहे। तभी से मनोविज्ञान में, ऐसे व्यवहार और सोच को 'बाईक शेड इफेक्ट' के नाम से पुकारा जाने लगा।


अगर इस प्रभाव का विश्लेषण करें, तो पाँएगे कि हम सब भी अक्सर अपना जीवन इसी इफेक्ट का अनुसरण करते हुए बिता देते हैं। कैसे? जानने के लिए पढ़िए हिंदी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका का जून 2019 अंक।

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