उफ! ये खर्राटे…

पाठकों! हमने लोगों को टी.बी., शुगर और थायराइड जैसी बीमारियों के इलाज के लिए तो अक्सर भागते देखा है। पर एक बीमारी ऐसी है जो है तो बहुत साधारण, पर इसके दुष्प्रभाव कई बार असाधारण हो जाते हैं। यहाँ तक कि इस बीमारी से रिश्ते बिखर जाते हैं, बसे-बसाए घर उजाड़ जाते हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इसमें रोगी खुद तो चैन से सोता है, पर उसके साथ वालों की नींद उड़ जाती है। आप समझ पा रहे होंगे कि हम किस बीमारी की बात कर रहे हैं!

जी हाँ! खर्राटे लेने की बीमारी! यह छोटी-सी दिखने वाली समस्या समय रहते ध्यान न देने पर कई बड़ी समस्याओं की जननी बन जाती हैं। इससे जुड़े घातक परिणामों के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए अमेरिकन स्लीप एसोसिएशन द्वारा गत कुछ वर्षों से 'स्टॉप स्नोरिंग डे' मनाया जाता है।

आइए, सबसे पहले खर्राटों के वैश्विक आँकड़ों पर एक नजर डालें-

1. मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया भर में करीबन आधी जनता कभी न कभी खर्राटे लेती है। इसमें से 25% नियमित खर्राटे लेने वालों की श्रेणी में पाए गए।

2. 30% लोग तीस साल की उम्र से नियमित खर्राटे लेते देखे जाते हैं। वहीँ अधेड़ अवस्था तक इसका अनुपात बढ़ते हुए 40% पाया गया।

3. यह समस्या महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक देखी जाती है। 40% पुरुष और 24% महिलायें नियमित खर्राटे लेते हैं।

4. 10 में से 1 बच्चे में खर्राटों की समस्या देखने को मिलती है, जिसमें लगातार खर्राटे लेने वालों का अनुपात 5.6% देखा गया है।

5. एक सर्वेक्षण में दो तिहाई दम्पति कहते पाए गए कि उनका पार्टनर …

ये आँकड़ें पढ़कर हो सकता है आपका मन कहे कि खर्राटे लेना कोई असामान्य बात तो नहीं है। तो इससे पहले कि आप अपनी इस राय को सही मान बैठें, खर्राटों के शारीरिक, मानसिक और रिश्तों पर पड़ते बुरे प्रभाव को भी अवश्य जानें। …

पूर्णतः जानने क लिए पढ़िए फरवरी माह'2020 की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका!

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