दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा 27 एवं 28 अक्टूबर 2025 को नूरमहल आश्रम, पंजाब में छठ पूजा महोत्सव अत्यंत श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। यह उत्सव दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) की कृपा और दिव्य मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। छठ पूजा, भारत के प्राचीनतम और आध्यात्मिक रूप से अत्यंत गूढ़ पर्वों में से एक है, जो जीवन में पवित्रता और अनुशासन का प्रतीक है। यह पर्व सूर्य देवता की पूजा अर्चना का पर्व है, जो पृथ्वी पर सम्पूर्ण जीवन को बनाए रखने वाली ऊर्जा और जीवन शक्ति के शाश्वत स्रोत हैं।

दिव्य सरोवर में, श्रद्धालुओं ने 27 अक्टूबर 2025 को अस्त होते सूर्य को संध्या अर्घ्य अर्पित किया और उनके जीवनदायी प्रकाश के लिए हृदय से कृतज्ञता प्रकट की। अगले दिन प्रातः 28 अक्टूबर 2025 को उन्होंने उदित होते सूर्य के प्रति श्रद्धा के रूप में उषा अर्घ्य अर्पित किया ।
27 अक्टूबर की संध्या को दिव्य दर्शन भवन, नूरमहल में एक भजन संध्या का आयोजन भी किया गया। पूरा वातावरण भक्ति और कृतज्ञता की भाव तरंगों से गूँज उठा। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता साध्वी गरिमा भारती जी सहित संस्थान के अन्य प्रचारकगण भी उपस्थित रहे। आत्मस्पर्शी भजन-संगीत ने अत्यंत दिव्य और मंत्रमुग्ध करने वाला वातावरण उजागर कर दिया।

साध्वी गरिमा भारती जी ने अपने प्रेरणादायक प्रवचननों में छठ पूजा के पीछे छिपे गहन संदेश को बहुत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इन परंपराओं और अनुष्ठानों के पीछे एक गूढ़ आंतरिक सत्य निहित है: 'बाहरी उपासना से आंतरिक अनुभूति की यात्रा'।
साध्वी जी ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के प्रवचनों के अनुसार ऊषा अर्घ्य (प्रातःकालीन अर्घ्य) और संध्या अर्घ्य (सांध्यकालीन अर्घ्य) के पीछे का गूढ़ रहस्य स्पष्ट किया। उन्होंने कहा- उदयमान सूर्य नए जीवन, नई आशा और नए आरंभ का प्रतीक है। जैसे ही सूर्य की पहली किरण पृथ्वी को स्पर्श करती है, समस्त प्रकृति जीवंत हो आनंद से झूम उठती है। इस प्रकार, उदयमान सूर्य को अर्घ्य देना एक नए दिन और नए जीवन के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक है।
परंतु, अस्त होता सूर्य भी हमें एक महान संदेश देता है, वह जीवन की गौरवशाली संध्या का प्रतीक है।
साध्वी जी ने बताया कि एक बार एक जिज्ञासु ने दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी से प्रश्न किया कि “महाराज जी, मनुष्य की मृत्यु कैसी होनी चाहिए?” इस पर श्री महाराज जी ने उत्तर दिया- “मृत्यु ऐसी होनी चाहिए जैसे अस्त होता सूर्य। जब संत महापुरुष देह त्याग करते हैं, उनके मुख पर शांति और दिव्यता की आभा झलकती है। परंतु जब एक सामान्य व्यक्ति मरता है, तो उसका चेहरा मलिन और निर्जीव हो जाता है। अतः हमारे जीवन के अंतिम क्षण भी उतने ही गौरवशाली होने चाहिए जितना एक सुंदर सूर्यास्त।”
अब, इस महत्त्वपूर्ण क्षण में भी हम कैसे उज्जवल बने रह सकते हैं? इसके प्रेरणा स्रोत भी अस्त होते सूर्य हैं। संध्या के आकाश में सुंदरता से चमकता सूर्य हमें यही सिखाता है कि उसने पूरे दिन प्रकृति के नियमों का पालन किया है। अपना कर्तव्य पूर्ण किया, स्वयं उज्ज्वल रहा और सभी के कल्याण हेतु कार्यरत रहा। यही कारण है कि वह गर्व और शांति के साथ अस्त होता है।
उसी प्रकार, हमें भी अपने सभी उत्तरदायित्वों को निष्ठा और समर्पण के साथ निभाते हुए अपने जीवन को दैवीय और प्राकृतिक नियमों के अनुसार जीना चाहिए। सांसारिक जिम्मेदारियां निभाते हुए, हमें एक पूर्ण आध्यात्मिक गुरु की शरण लेनी चाहिए, जो हमें ब्रह्मज्ञान की शाश्वत विद्या प्रदान कर, हमारे आध्यात्मिक लक्ष्य को भी पूर्ण करवा सके। तभी जीवन के अंत में हम दुर्बलता या दुख में नहीं, बल्कि संतोष और आंतरिक शांति की आभा के साथ प्रस्थान कर सकें।
ऋग्वेद में हमारे ऋषियों ने ईश्वर से प्रार्थना की है: “हे सूर्यदेव! जैसे आपका उदय और अस्त- दोनों सुंदर और दिव्य हैं, वैसे ही इस संसार में मेरा आगमन और इस संसार से मेरा प्रस्थान भी उसी मधुरता और अनुग्रह से परिपूर्ण हों।”
इस प्रकार, ऐसे गहन प्रेरणादायक संदेशों से ओत-प्रोत यह कार्यक्रम सभी के लिए अविस्मरणीय रहा।