भगवान शिव द्वारा प्रदत्त आत्म-साक्षात्कार, करुणा और संतुलन के शाश्वत ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाकर आंतरिक परिवर्तन और सार्वभौमिक सद्भावना का मार्ग प्रशस्त करने हेतु ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’ द्वारा 9 से 15 नवंबर 2025 तक गुरुग्राम, हरियाणा में ‘भगवान शिव कथा’ का आयोजन किया गया। कथा का वाचन सुप्रसिद्ध विद्वान व आध्यात्मिक प्रवक्ता ‘दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी’ (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) के शिष्य डॉ. सर्वेश्वर जी द्वारा किया गया। कथा के माध्यम से ‘शिव महापुराण’ में भगवान शिव द्वारा प्रतिपादित ध्यान और वैराग्य के ज्ञान को सरल रूप में प्रस्तुत कर श्रोताओं को आध्यात्मिक जागृति तथा धर्ममय जीवन की प्रेरणा प्रदान की गई।

डीजेजेएस के भारतीय गो संरक्षण व संवर्धन प्रकल्प ‘कामधेनु’ को समर्पित इस कथा ने इस बात पर बल दिया कि वास्तविक आध्यात्मिकता केवल भक्ति में ही नहीं, बल्कि सभी प्राणियों की निस्वार्थ सेवा में भी निहित है। आयोजन ने भगवान शिव के सर्वव्यापक स्वरूप को गौ-सेवा के सिद्धांत से सुंदर रूप में जोड़ते हुए स्पष्ट किया कि दोनों ही धर्म और जीवन के मूल प्रतीक हैं।
कथा में प्रस्तुत भगवान शिव के भक्तिमय भजन और मंत्रोच्चारण ने प्रतिदिन असंख्य श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हुए पंडाल में एक व्यापक आध्यात्मिक वातावरण निर्मित किया। कार्यक्रम में एनसीआर (NCR) क्षेत्र के कई विशिष्ट अतिथियों एवं प्रख्यात गणमान्य व्यक्तियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई। साथ ही, कथा को क्षेत्रीय समाचार पत्रों, स्थानीय मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर व्यापक सराहना और उल्लेख प्राप्त हुआ।

अपने आध्यात्मिक प्रवचनों में डॉ. सर्वेश्वर जी ने ‘शिव तत्त्व’ का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हुए समझाया कि भगवान शिव केवल कर्मकांडों या पौराणिक कथाओं तक सीमित एक देव मात्र नहीं हैं, बल्कि जन्म–मृत्यु के बंधनों से परे शुद्ध चेतना (चैतन्य) के साकार रूप हैं। उन्होंने भगवान शिव को ‘आदियोगी’ “योग व ध्यान के प्रथम गुरु”, के रूप में वर्णित किया, जो गति में स्थिरता और अराजकता में ज्ञान के प्रतीक हैं।
डीजेजेएस प्रतिनिधि ने समझाया कि ‘भगवान शिव का ज्ञान’ हमें जीवन की विपरीतताओं के बीच सामंजस्य स्थापित करना सिखाता है, चाहे वह वैराग्य व पारिवारिक जीवन हो, विनाश व सृष्टि हो, या फिर मौन व अभिव्यक्ति। भगवान शिव अहंकार के शमन और आंतरिक जागृति के प्रतीक हैं। उनके दिव्य गुणों जैसे करुणा, समभाव व आत्म-साक्षात्कार पर मनन करने से मनुष्य इच्छाओं, भय व अज्ञान से ऊपर उठकर अपने उच्चतर स्वरूप को पहचानने की क्षमता विकसित करता है।
डॉ. सर्वेश्वर जी ने समझाया कि भगवान शिव का मार्ग अंध-भक्ति का नहीं, बल्कि अनुभवजन्य ज्ञान का है, जिसे ‘ब्रह्मज्ञान’ और आंतरिक पवित्रता के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव का सच्चा पूजन केवल प्रसाद अर्पित करने में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण के द्वारा स्थिर मन और निःस्वार्थ हृदय विकसित करने में निहित है।
उन्होंने यह भी समझाया कि ऐसा साक्षात्कार केवल एक पूर्ण गुरु की कृपा से संभव है, जो भगवान शिव की भाँति अज्ञान का विनाश कर साधक की आंतरिक चेतना को प्रकाशित करते हैं। पूर्ण सतगुरु दिव्य ज्ञान के जीवंत स्वरूप होते हैं तथा वे साधकों को कर्मकांडों से परे, सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव की ओर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। डॉ. सर्वेश्वर जी ने कहा कि ‘सतगुरु’ वर्तमान समय के महादेव का प्रतिबिंब हैं, जो मानवता को ‘ब्रह्मज्ञान’ द्वारा अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं।
डीजेजेएस प्रतिनिधि ने निष्कर्ष देते हुए कहा कि ‘ब्रह्मज्ञान’ प्राप्त व्यक्ति का जीवन स्वयं एक ध्यान बन जाता है व उसका प्रत्येक कर्म ईश्वर के चरणों में समर्पित एक पवित्र भेंट। उन्होंने सभी से भगवान शिव के आदर्श जैसे आंतरिक शांति, प्रेम और करुणा इत्यादि को अपने जीवन में अपनाने का आग्रह किया। उन्होंने भक्तों को स्मरण कराते हुए कहा कि भगवान शिव का वास्तविक सार किसी दूरस्थ स्वर्ग में नहीं, अपितु हमारी ही अंतर-चेतना में विद्यमान है, जो एक ‘पूर्ण सतगुरु’ के मार्गदर्शन में ‘ब्रह्मज्ञान’ के माध्यम से प्रकट होता है।
‘भगवान शिव कथा’ ने उपस्थित सभी श्रद्धालुओं के हृदयों पर गहरी आध्यात्मिक छाप छोड़ी। इस कथा के माध्यम से भगवान शिव की शिक्षाओं में निहित गूढ़ अध्यात्मिक संदेश को ‘कामधेनु’ संरक्षण के जीवन-पोषक उद्देश्य के साथ सुंदरता से जोड़ते हुए प्रस्तुत किया गया।