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भक्ति-पथ पर बढ़ रहे अनुयायियों की आध्यात्मिक वृद्धि एवं गुरु-शिष्य के अलौकिक संबंध को सुदृढ़ करने हेतु दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा 5 जनवरी 2020 को पंजाब के  नूरमहल आश्रम में मासिक सत्संग समागम का आयोजन किया गया। असंख्य श्रद्धालुओं ने भक्ति रस और दिव्य प्रेम से परिपूर्ण भजनों एवं प्रवचनों का लाभ उठाया। 

Monthly Spiritual Congregation Highlighted the Eternal Spiritual Bond at Nurmahal, Punjab
गुरुदेव सर्व श्री आशुतोष महाराज जी जो संस्थान के संस्थापक एवं संचालक है उनके समर्पित प्रचारक शिष्य एवं शिष्याओं ने उपस्थित भक्तजनों को प्रवचनों एवं सुमधुर भजनों के माध्यम से भक्ति मार्ग पर दृढ़ता एवं सजगता से चलते रहने की प्रेरणा दी। मानव प्रेम प्रतिबंधात्मक, योग्यता और जन्मजात बंधनों पर आधारित होता है। वहीं गुरु और शिष्य का आत्मीय संबंध शाश्वत और अनंत हुआ करता है। इसमें न तो कोई शर्त है और न कोई स्वार्थ की भावना। अगर कुछ है तो अनंत निश्चल प्रेम! उन्होंने उपयुक्त रूप से समझाया कि ईश्वर दर्शन और भक्ति-पथ के जिज्ञासुओं को भगवान उनके आरंभिक अविकसित दौर में स्वयं को स्वतः प्रकट नहीं किया करते। अपितु एक भक्त को स्वयं तक पहुँचाने के लिए वह पारदर्शी अंतर्ज्ञान, ईश्वर-चेतना, और एक तत्त्ववेता ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शिक्षाओं का उपयोग करते हैं। उन्होंने बताया कि जब गुरु एक शिष्य को आत्मज्ञान प्रदान करते है तो उस जीवात्मा को ब्रह्मा की भांति आध्यात्मिक जन्म देते हैं; गुरु विष्णु का भी रूप है क्योंकि वह  शिष्य के आध्यात्मिक जीवन में उसकी आत्मा का संरक्षण करते हैं; तथा  गुरु शिव रूप में जीव के अहं को नष्ट कर उसे ईश्वर विलीन करते हैं। जिस प्रकार नल से पानी पीने के लिए झुकना पड़ता है, उसी प्रकार गुरु के श्री चरणों से आध्यात्मिक अमृत को प्राप्त करने के लिए स्वयं को विनम्रता और नम्रता की मूर्त बनाना पड़ता है। 
अपने व्यक्तित्व पर चढ़े अधिग्रहित दोषों को देखने के लिए एक मनोवैज्ञानिक दर्पण की आवश्यकता होती है। गुरु इसी दर्पण का कार्य करते हैं। वह शिष्य को उसके दोषों से ग्रसित आत्म-छवि का प्रतिबिंब दिखाते हैं। उसे इस अज्ञानता के अंधकार से बाहर निकलने का मार्ग दिखाते हैं। जो गुरु पर श्रद्धा और विश्वास रखकर उनके बताए मार्ग का अनुसरण करते  हैं वही अज्ञानता के तम से बाहर निकलने में सफल हो पाते हैं। जो स्वयं ही मार्ग खोजने का प्रयास करते हैं निःसंदेह वह जनम-मरण के चक्रव्यूह में फंस कर रह जाते हैं। 
गुरु शिष्य का तब तक रूपांतरण करते हैं जब तक कि वह पूर्णता को प्राप्त नहीं कर लेता। वह अपने शिष्यों को भिन्न-भिन्न विधियों से और चेतना के विभिन्न स्तरों पर देखते, निर्देश और चेतावनी देते हैं। गुरु कभी-कभी हृदय के मौन में प्रत्यक्ष रूप से शिष्य का पथ-प्रदर्शन करते हैं। स्थूल रूप में अनुपस्थित होने पर भी अपने शिष्य का मार्गदर्शन एवं संरक्षण करते हैं। एक माँ अपने बच्चे की देखभाल सदैव करती है चाहे वह दुनिया के दूसरे छोर पर क्यों न हो। उसी प्रकार गुरु का मार्गदर्शन हर समय आवश्यक भी है और उपलब्ध भी रहता है। अतः गुरु का अनुसरण करें और वह आपको सुरक्षित रूप से आपके लक्ष्य तक ले जाएंगे।

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