दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) के दिव्य निर्देशन में 30 अगस्त से 03 सितंबर 2026 तक मुक्तसर, पंजाब में श्रीकृष्ण कथा का आयोजन किया गया। इस कथा का उद्देश्य भीतर सुप्त श्रीकृष्ण-चेतना को जागृत करना एवं श्रद्धालुओं को भक्ति व सच्ची उपासना की ओर प्रेरित करना था। पाँच दिनों तक चलने वाली इस कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीकृष्ण की दिव्य शिक्षाओं के अमूल्य रत्नों को संजोने के लिए एकत्रित हुए।

कथा व्यास साध्वी सौम्या भारती जी ने आत्मा को तृप्त करने वाले प्रवचनों के माध्यम से यह समझाया कि भगवान श्रीकृष्ण शाश्वत चेतना हैं, जिन्हें पूर्ण गुरु की कृपा से प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है। कथा का शुभारम्भ गुरुदेव के शिष्यों द्वारा प्रस्तुत आत्मा को झंकृत करने वाले सुमधुर भजनों से हुआ। स्थानीय और क्षेत्रीय मीडिया ने भी इस आयोजन को उत्साहपूर्वक कवर किया।
साध्वी जी ने स्मरण कराया कि भगवान श्रीकृष्ण सदृश दिव्य सत्ता का अवतरण एक मुख्य उद्देश्य से होता है - अज्ञान की नींद से आत्माओं को जागृत कर उन्हें उनकी शाश्वत पहचान से जोड़ना। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ केवल कथाएँ नहीं, बल्कि हमारे आध्यात्मिक सामर्थ्य का दर्पण हैं।

कथा में यह स्पष्ट किया गया कि श्रीकृष्ण केवल प्रिय ग्वाल, सखा या दार्शनिक के रूप में ही वंदनीय नहीं, अपितु सर्वप्रथम पूर्ण गुरु के रूप में पूजनीय हैं, जो शाश्वत ब्रह्मज्ञान प्रदान करते हैं और दिव्य चक्षु को जागृत करते हैं। बाल लीलाओं का भावपूर्ण वर्णन करते हुए साध्वी जी ने बताया कि श्री कृष्ण का यह आनंदमय स्वरूप हमें शिक्षा देता है कि आत्मा मूल रूप से निर्मल, आनंदमय और निष्कपट होती है। माखन चुराकर मटकी फोड़ने की लीला, आत्मा की स्वाभाविक मधुरता को धारण करने और अहंकार रूपी कठोर आवरण को हटाने की ओर संकेत करती है।
आगे, साध्वी जी ने रासलीला को दिव्य प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति बताया, जहाँ व्यक्तिगत आत्मा (गोपी) परम चेतना (श्रीकृष्ण) के साथ एकत्व का अनुभव करती है। यह प्रेम भावनात्मक निर्भरता नहीं, बल्कि पूर्ण आत्म-समर्पण है।
साध्वी जी ने प्रसंगों की श्रृंखला में यह भी कहा कि गीता केवल दो योद्धाओं का संवाद नहीं, बल्कि पूर्ण गुरु (श्रीकृष्ण) और संकटग्रस्त जिज्ञासु (अर्जुन) के बीच दिव्य संवाद है; जिसका उद्देश्य अर्जुन को अज्ञानता की नींद से जगाकर, विवेक की राह पर अग्रसर करना है।
निष्कर्ष में साध्वी जी ने कहा कि आज जन-जन के लिए ब्रह्मज्ञान अनिवार्य है, ताकि वे भगवान को कल्पना के रूप में नहीं, बल्कि अपने अंत:करण में एक सजीव, प्रकाशमय उपस्थिति के रूप में अनुभव कर सकें। पूर्ण गुरु के बिना शास्त्र केवल शब्द मात्र रह जाते हैं; किंतु उनकी कृपा से वही शास्त्र जीवंत सत्य बन कर अन्तर्हृदय में उद्घाटित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि सच्ची कृष्ण-भक्ति वहीं आरंभ होती है, जहाँ ब्रह्मज्ञान का उदय होता है; क्योंकि जागृत दिव्य चक्षु के द्वारा ही साधक ध्यान में श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप का साक्षात्कार कर पाता है। साध्वी सौम्या भारती जी ने सभी का आह्वान किया कि वे सत्यनिष्ठा, आनंद और पवित्रता के साथ श्रीकृष्ण के मार्ग पर चलें।
इस आयोजन की आध्यात्मिक तरंगों ने उपस्थित श्रद्धालुओं के भीतर भक्ति का जागरण किया और साधकों को अपनी अंतर्यात्रा पर चिंतन करने के लिए प्रेरित किया। धर्मनिष्ठ जीवन, सत्य एवं आत्म जागृति पर दिए गए संदेशों ने उपस्थित श्रद्धालुओं के नैतिक मूल्यों को और अधिक सुदृढ़ किया।