जन-मानस के अंतःकरण को जाग्रत करने व भगवान शिव के पारलौकिक ज्ञान से परिचित कराने हेतु, दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी (संस्थापक एवं संचालक, डीजेजेएस) के दिव्य मार्गदर्शन में दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा राँची, झारखंड में 22 से 28 मार्च 2026 तक अलौकिक सात दिवसीय ‘श्री शिव महापुराण कथा’ का आयोजन किया गया। कथा व्यास, डॉ. सर्वेश्वर जी ने भगवान शिव से जुड़े आध्यात्मिक रहस्यों व प्रतीकों का विवेकपूर्ण व्याख्यान किया। कथा का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ हुआ। तत्पश्चात प्रस्तुत भावपूर्ण भजनों व आध्यात्मिक व्याख्यानों ने श्रद्धालुओं को भक्ति भाव व भगवान शिव की दिव्यता से मंत्रमुग्ध कर दिया।

कथा प्रवक्ता ने समझाया कि भगवान शिव परम चेतना हैं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड भगवान शिव का ही व्यापक रूप है। इसलिए, भगवान शिव के वास्तविक रूप को जानना अत्यावश्यक है क्योंकि वे योगिक पद्धतियों व ज्ञान के अवतार हैं। भगवान शिव का दिव्य तृतीय नेत्र ‘आध्यात्मिक जाग्रति’ का द्योतक है। शिव आध्यात्मिक पुनर्जागरण अथवा आत्मिक आनंद का प्रतीक हैं, जो अंतःकरण की अज्ञानता को नष्ट करते हैं।
डॉ. सर्वेश्वर जी ने कहा कि भगवान शिव को संहारक कहा जाता है। वास्तव में वे हमारे अहंकार, वासना और अज्ञानता का विनाश कर हमें अपने में ही विलीन कर लेते हैं।

उन्होंने आगे समझाया कि मनुष्य जीवन विशेषतः आध्यात्मिक खोज के लिए प्राप्त हुआ है, जिसे केवल पूर्ण सतगुरु द्वारा ही पूर्ण किया जा सकता है। पूर्ण सतगुरु अज्ञानता के आवरण को हटा अंतःकरण में प्रकाश का दर्शन करवाते हैं। अतः हमारा उद्देश्य भगवान शिव के सनातन स्वरूप को जानना और उनके जैसे महायोगी को खोजना होना चाहिए, जो हमें ब्रह्मज्ञान प्रदान कर शाश्वत ज्ञान व भक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर सकें।
गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी आज यही ब्रह्मज्ञान जन-जन को प्रदान कर, उन्हें जीवन के परम लक्ष्य की ओर अग्रसर कर रहे हैं। उनकी कृपा से भक्तों के लिए ध्यान-साधना द्वारा अध्यात्म की गहराइयों में उतर पाना संभव हो पाया है। ‘ब्रह्मज्ञान’ की दिव्य अग्नि नकारात्मकता व अज्ञानता का नाश कर शिव के शुद्ध तत्व रूप को जानने में हमें सक्षम बनाती है।
आध्यात्मिक आनंद व शांति रूपी अमृत का पान कराने वाली भगवान शिव कथा को श्रवण कर उपस्थित सभी भक्तजनों ने स्वयं को भाग्यशाली व कृतज्ञ महसूस किया।