अहं-मर्दिनी-माँ भगवती!

प्रत्येक वर्ष जब भी नवरात्रों का पावन पर्व आता है, तो शक्ति उपासक बड़े उत्साह एवं उल्लास से भर कर देवी माँ का पूजन-ध्यान-चिंतन और जय-जयकार करते हैं। वास्तव में माँ एक शक्ति ही हैं, जो सारे संसार का सृजन,पालन और संहार करती हैं। श्रीमद देवी भागवत महापुराण के प्रथम स्कन्ध में स्वयं देवी माँ कहती हैं- सर्वं खल्विद्मेवाह्म न्यदस्ति सनातनं अर्थात सबकुछ मैं ही हूँ। ... अपने जीवन-काल में हमने असंख्य बार यह श्लोक सुना होगा-

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। ...

अर्थात सबसे पहले तुम हमारी माँ हो। इस श्लोक में सारे रिश्ते माँ के बाद ही आते हैं। क्यों? क्योंकि संतान के लिए सहज स्नेह से सदा द्रवित रहने वाली एक माँ ही होती है। जब एक लौकिक माँ अपनी संतान के लिए कल्याणमयी रहती है; तो अलौकिक माँ जिसे हम जगत-जननी कहकर सम्बोधित करते हैं, उसका तो कहना ही क्या!
कैसे वो अलौकिक माँ हर युग में अपने शिशुओं को, हम मानवों को अज्ञानता की गहरी खाइयों में गिरने से रोक पाती है? पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए हिन्दी मासिक पत्रिका अखण्ड ज्ञान का अक्टूबर 2012 अंक।

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