मैं नेत्रहीन भी हूँ, नेत्रवान भी!

देवी सुवर्चला का वर्णनं है। ऋषि देवल की पुत्री सुवर्चला ज्ञानमणि और ओजपूर्ण व्यक्तित्व की धनी थी। दार्शनिक मेधा वाली यह विदूषी सौन्दर्य की भी स्वामिनी थी। जब इनकी विवाहोचित आयु हुई, तो पिता देवल चिंतित हुए कि ऐसी अद्वितीय पुत्री के सुयोग्य वर कहाँ से लाएँ? ... तब पुत्री ने सुझाव दिया- 'पिताश्री, आप एक स्वयंवर का आयोजन कीजिए। उसमें उच्च कोटि के विद्वत पुरुषों को आमंत्रण भेजिए। मैं उस सभा में एक विशिष्ट प्रश्न पूछूँगी। जो मेरे प्रश्न का यथोचित उत्तर दे देगा, उसी का मैं पति रूप में वरण करुँगी।' पिता ने प्रसन्नतापूर्वक पुत्री की अभिलाषा पूर्ण की. ... देवी सुवर्चला ने भरी सभा में प्रश्न उछाला-

... आप में से वह पुरुष आगे आए, जो अंधा भी है और आँखवाला भी है; जो नेत्रहीन होने के साथ-साथ नेत्रवान भी है। वही मेरा पति होने के लिए उपयुक्त है।

शर्त सुनते ही सभा उद्वेलित हो गई। भला यह कैसी विचित्र प्रहेलिका है! दोनों स्थितियाँ तो विरोधाभासी हैं। एक ही पुरुष में दोनों की विद्यमानता कैसे हो सकती है? विद्वत समाज अनुत्तरित रह गया। धीरे-धीरे सभी वापिस लौट गए।

फिर एक दिन... विचारवान ऋषिकुमार श्वेतकेतु का पदार्पण हुआ. ... उन्होंने ऋषि देवल से कहा- 'आप अपनी पुत्री को यहाँ बुला लें। मैं उत्तर देने हेतु प्रस्तुत हूँ।' सुवर्चला आई, तो ऋषिकुमार ने सम्बोधित करते हुए कहा-

श्वेतकेतु- देवी! तुम्हारी कथनी के अनुसार मैं वह पुरुष हूँ, जो अंधा भी हूँ, आँखवाला भी हूँ.

कैसे श्वेतकेतु सुवर्चला को विवेचना दे पाए? वह क्या दृष्टिकोण था, जिसके द्वारा वह ऐसा कह पाए? जानने के लिए पढ़िए फरवरी माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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