गणपति सहित धन-लक्ष्मी का पूजन करें!

वनवास काल में यक्ष ने युधिष्ठिर से एक प्रश्न पूछा था- 'मृतः कथं स्यात् पुरुषः' अर्थात् कौन पुरुष मरा हुआ है? उत्तरस्वरूप  युधिष्ठिर ने अद्भुत उत्तर दिया- ... एक दरिद्र पुरुष मरा हुआ है।

भारत के एक कुशल महामंत्री चाणक्य से किसी ने पूछा- 'शून्यता क्या है?' उत्तरस्वरूप उन्होनें अपने अर्थशास्त्र में एक महावाक्य गढ़ दिया- 'सर्व शून्य दरिद्रताम्' अर्थात् एक दरिद्र के लिए सकल संसार शून्य है।

... धन के अभाव का प्रभाव ... इतना भीषण! इतना दारुण! यहीं कारण है कि हमारी संस्कृति में 'धन-संपदा' को एक मुख्य देवी कि उपाधि दी गई- 'महामाई लक्ष्मी'! दीपावली पर्व पर 'पूजन'  की एक परम्परा बनाई गई, जिसके तहत घर-घर में माता लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। यह परम्परा लक्ष्मी देवी कि जीवन में अनिवार्यता घोषित करती है- 'बिन लक्ष्मी सब सून!'

परन्तु पाठकों! इस बात में हमें एक बात सदा याद रखनी होगी। माँ लक्ष्मी की सवारी क्या है? 'उल्लू'! हमारे संस्कृति पुरुषों ने जहाँ लक्ष्मी-पूजन का विधान बनाया; वहीँ लक्ष्मी जी कि सवारी उल्लू दर्शा कर हमें सतर्क भी किया। आशय यह है कि ये जिस भी मस्तिष्क पर सवार हो जाती हैं, उसे 'उल्लू' समान ही बना देती हैं। वह रात्रि को जागने लगता है, माने उसे अंधकार, अज्ञानता व अहंकार प्रिय हो जाते हैं।

मतलब कि धन का अभाव तो घातक है ही, धन का दुष्प्रभाव उससे भी अधिक घातक है। धन के बिना 'स्वान' जैसी स्थिति, धन के साथ 'उल्लू' जैसी स्थिति! फिर उपाय क्या है? क्या करें? धन अर्जित करें या न करें? भोगें या न भोगें?

कैसे किया हमारे पूर्वजों ने इस पहेली का हल? ...आखिर धन को कोई केवल सद्कार्यों के लिए ही तो नहीं कमाता। स्वयं व परिवार के लिए भी तो कमाता है। क्या इसमें भी कोई बुराई है? ऐसे ही धन सम्बन्धी सभी प्रश्नों के समाधान को पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए नवम्बर माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान पत्रिका! 

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