बंदर से इंसान तक या इंसान से भगवान तक!

हमारी यह धरा विविध प्रकार के रंग-रूप वाले फल-फूल, पशु-पक्षी आदि लाखों जीवों की गृहस्थली है। यह विविधता और इंद्रधनुषी विभिन्नता- सृष्टि की बगिया में भिन्‍न-भिन्‍न फुलवारी कैसे आई?

उत्तरस्वरूप विज्ञान-जगत ने अपना मत रखा, चार्लस डार्विन के विकासवाद के रूप में। विकासवादी डार्विन इस विविधता का आधारभूत कारण सृष्टि में व्याप्त एक आरोहण क्रम को बताते हैं। ... इसी कारण एक-कोशिकीय से बहु-कोशिकीय जीव, सरल से जटिल संरचनायेँ, विभिन्न रूप वा क्षमता वाले जीव प्रकृति की अचेतन ऊर्जा शक्ति से गठित होते गए। एक लम्बी समयावधि के बाद, इसी प्रक्रिया द्वारा अंततः 'मनुष्य' की रचना हुई। 

... प्रकृति के केवल अचेतन व दृष्टिहीन प्रहारों द्वारा जीव का गठन- यह कितना तर्क-सम्मत है? 

... यदि पक्षियों से पशु बने हैं, तो आज भी पक्षियों का अस्तित्व क्यों है? सभी पक्षी विकसित होकर पशु क्यों नहीं गए? यदि बन्दरों में परिवर्तन होकर मानव बना, तो यह परिवर्तन सभी बन्दरों में क्यों नहीं हुआ? आज भी बंदर क्यों दिखाई देते हैं? 

... क्या जीवन प्रकृति के अंधाधुंध थपेड़ो की मार से विकसित हुआ? क्या सृष्टि स्वयंभू व स्व-विकसित है? क्या सच में कुछ ऐसी भी शक्ति है, जो चैतन्य है, विवेकशील बुद्धि से युक्त है? उसी के मार्गदर्शन में इस सृष्टि ने आकार लिया? सृष्टि के जीवों ने विकास की सीढ़ियाँ चढ़ी? ... दोनों ही मतों के समर्थक हमें समाज में मिल जाते हैं। कौन सही है, तथ्यपूर्ण है? कौन बौद्धिक अटकलों के वशीभूत है? इसका निर्णय कर रहे हैं, गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी, भौतिक विकासवाद और आध्यात्मिक विकासवाद के तुलनात्मक विश्लेषण द्वारा... जानने के लिये पूर्णतः पढ़िए दिसंबर माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान पत्रिका...

Need to read such articles? Subscribe Today