ठक्-ठक्! क्या ईश्वर है?

क्या ईश्वर है या नहीं है? क्या ईश्वर कल्पना में गढ़ी एक कृति है या फिर इस विश्व का सृष्टा व नियामक तत्व है? क्या ईश्वर मूढ़, अशिक्षित व असभ्य लोगों के भय और अज्ञान का परिणाम है या सभ्य वैज्ञानिक समाज के तकनीकी यंत्रों और पहुँच से बाहर की कोई ऊँची, सूक्ष्म, दिव्य सत्ता है? इन प्रश्नों का उत्तर जब भी खोजना चाहा, समाज दो वर्गों में बंट गया- आस्तिक व नास्तिक। नास्तिक सिरे से ईश्वर को नकारता है, उसकी सत्ता पर प्रश्नचिह्न उठाता है। वहीं आस्तिक ईश्वर में गहरी आस्था व विश्वास रखता है। उसके होने के अनेक दृश्य व अदृश्य प्रमाण समक्ष रखता है।


इस विषय-वस्तु को दृष्टि में रखकर प्रस्तुत है एक नाटक। इस नाटक में अनेक दृश्य हैं व प्रत्येक दृश्य के अलग-अलग पात्र हैं। ये पात्र दुनिया के जाने-माने लोग हैं। ... इन पात्रों का परिचय देने व दृश्यों की समीक्षा करने वाले पात्र का नाम है- 'सर्वज्ञ'।


...
(रिचर्ड डाकिन्स बी. बी. सी. रेडियो के टु-डे कार्यक्रम में...)


रिचर्ड- मैं नहीं मानता कि कोई ईश्वर-तीश्वर है। यह सब आस्तिकों का फैलाया भ्रम है। और जो आस्तिक होने का दिखावा करते हैं, उनमें से अधिकतर न तो गिरजाघर जाते हैं, न बाइबल पढ़ते हैं। और तो और, उन्हें तो यह भी नहीं पता होगा कि न्यू टेस्टामेन्ट की पहली किताब कौनसी है! ईश्वर को मानने का केवल धोखा देते हैं...

फ्रेसर (पादरी)- अच्छा रिचर्ड, मैंने सुना है कि तुम डार्विन के बहुत बड़े प्रशंसक हो। उसकी मशहूर किताब 'ऑरीजन आफ स्पीशीज' का चौथा टाइटल क्या है? ज़रा बताओ तो? 


रिचर्ड (अटकते हुए)- अं... अं... पता है मुझे?


फ्रेसर- हाँ-हाँ बताओ।


रिचर्ड- याद क्यों नहीं आ रहा... अं... अं... ओ गॉड!


सर्वज्ञ- देखा आपने! क्या विरोधाभास है? एक नास्तिक... वह ईश्वर को पुकार रहा है (ओ गॉड), ताकि ईश्वर उसे याद दिलवा दे उस किताब का शीर्षक जिसको बताकर वह यह सिद्ध कर सके कि ईश्वर नहीं है।क्या यह ईश्वर के सर्वव्यापी ... होने का प्रमाण नहीं? ....


यदि तुम नास्तिकों के सामने ईश्वर प्रत्यक्ष भी हो जाए, ... अन्य लोग उसके होने की गवाही भी दें, तो भी तुम उसे नहीं मानोगे। एक भ्रम, छलावा, धोखा कहकर नकार दोगे। ...


तो क्या है वो पैमाना, वो मार्ग... जानने के लिए पूर्णत:पढ़िए नवम्बर माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका २०१४...

Need to read such articles? Subscribe Today