कर लो दुनिया मुट्ठी में!

'अरे, इस बेचारे को कुछ मत कहो। यह तो दीन-हीन, लाचार व कमज़ोर सा है...

'क्या आप अपने बारे में ये शब्द सुनना पसंद करेंगे?  नहीं! बच्चे तक खुद को कमज़ोर सुनना पसंद नहीं करते। तभी तो बचपन में जब भी हम खेलते-खेलते गिर जाते थे और रोने लगते थे, तो हमारे माता-पिता हमें उठाते हुए अक्सरां ये शब्द बोला करते थे-' अरे, जल्दी से उठो! ऐसे रोते नहीं है। कुछ भी तो नहीं हुआ। छोटी सी चोट है, जल्द ही ठीक हो जाएगी। रोते तो कमज़ोर लोग हैं, पर तुम कमज़ोर थोड़े न हो। तुम तो हमारे शेर बच्चे हो। बहादुर हो ...'इन शब्दों को सुनकर जैसे हमें नवीन उत्साह मिलता था और हम झट अपने आँसुओं को पौंछ कर फिर से खेल के मैदान में उतर जाते थे।

पर क्या बड़े होकर हम जीवन के मैदान में उसी उत्साह से उतर पाते हैं?  कहीं चोट या हार का भय हमें एक कोने में सिमटा तो नहीं देता? हम छोटी-छोटी समस्याओं के आगे शक्तिहीन, असहाय हो अपने अस्त्र-शस्त्र तो नहीं डाल देते? इसको जाँचने के लिए एक ' पर्सनेलिटी टेस्ट' करते हैं। नीचे लिखे कुछ सवालों का अपने व्यवहार के अनुरूप जवाब ' क' या ' ख' में दीजिए-

1.  किसी कार्य को करने के लिए-

  क) आप पूरे जोश के साथ आगे बढ़ते  हैं और उसको खत्म करके ही दम लेते हैं।
  ख)  आप योजनाएं तो खूब बनाते हैं, पर अफसोस उनको क्रियान्वित नहीं कर पाते।


2.   कोई कार्य करते समय...

 क) आप भूतकाल में हुई गलतियों से सबक ले कर विचारपूर्वक आगे के कार्यों को करते हैं।
 ख)  व्यर्थ की चिंताओं में फँसकर, एकाग्रता खोकर कार्य करते हैं।

3. ...

4.   समस्या आने पर आप...

क) डटकर उनका सामना करते हैं।

ख) घुटने टेककर बैठ जाते हैं।


5.   अपनी बात को रखने के लिए आप...

क) नम्रतापूर्वक ठोस दलीलें रखते हैं।

 ख)  गुस्से में बिना सिर-पैर की बातें करते हैं।

6.    आप समय का...   

  क) सदुपयोग करते हैं।

  ख) बेकार जाने देते हैं।

आकलन कीजिए! यदि आपके अधिकतर उत्तर ' ख' की श्रेणी में आते हैं,  तो सावधान हो जाइए। आपकी शक्तियाँ क्षीण हो के कगार पर हैं। दुर्बलता आप पर हावी हो रही है। आपके असफल होने की सम्भावनाएँ काफी अधिक है गई  हैं, क्योंकि दुर्बलता और असफलता का नाता बहुत गहरा है। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे-' मनुष्य की दुर्बलता से अधिक भयंकर कोई पाप नहीं है।'  दुर्बलता सब प्रकार के पापों की जननी है क्योंकि यदि हम दुर्बल हैं, तो हम अन्याय के आगे झुकते रहेंगे। अन्याय सहने से हमारी प्रगति के सभी मार्ग बन्द हो जाएँगे। परिणामस्वरूप सफलता हमसे कोसों दूर चली जाएगी।


सफलता प्राप्त करने हेतु  हम अपनी शक्तियों को नष्ट होने से कैसे बचाएँ,  ये सब पूर्णत: जानने के लिए पढ़िये दिसम्बर'14 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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