अनेकता में एकता = संगठन

प्रकृति का ज़र्रा-ज़र्रा विविधता की ओर इशारा करता हैं।  कहीं आकाश छूते पहाड़ हैं, तो कहीं समतल मैदान; कहीं रेगिस्तान है; तो कहीं हरी-भरी उपजाऊ भूमि।  एक बगीचे को देखें तो हम पाएँगे कि वृक्षों की पत्तियाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की हैं।  वृक्षों पर फूल विभिन्न रंगों के खिलते हैं।  पशु एवं पक्षियों में भी भिन्नता पाई जाती है।  यदि मनुष्य की बात करें, तो यहाँ भी हर स्तर पर विविधता देखने को मिलती है।  हर व्यक्ति का अलग रंग, अलग भाषा, अलग रूप! …

शायद इसी विविधता के कारण प्रकृति में खूबसूरती बानी रहती है।  परन्तु क्या मात्र विविधता होना ही काफी है? यदि गौर से देखा जाए तो हम पाएँगे कि विविधता में सुन्दरता तो तब झलकती है, जब अनेकता के साथ एकता भी हो। अलग-अलग फूलों के एकसाथ खिलने से ही एक क्यारी गुलशन बनती हैं; अलग-अलग शब्दों के एकसाथ बँधने पर ही एक सुन्दर कहानी बन पाती है; अनेक रंगों की सुंदरता जब एकसाथ मिलती है, तब ही इंद्रधनुष कहलाती है; आसमान में सरे तारे जब एक संग होकर निकलते हैं, तब ही प्यारे लगते हैं।

यदि व्यावहारिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए, तो एक गृहिणी की पाकशाला में भिन्न-भिन्न मसाले एकसाथ मिलकर ही व्यंजनों को रंग और स्वाद प्रदान करते हैं।  एक दर्ज़ी केवल सुई से ही सुन्दर पोषक नहीं बना सकता। इसके लिए उसे सुई के साथ कैंची, नापने का फीता, सिलाई मशीन आदि की भी आवश्यकता पड़ती है।  डॉक्टर भी सिर्फ एक ही औज़ार से ऑपरेशन नहीं कर देता। उसे अपने विविध उपकरणों का प्रयोग बारी-बारी से करना पड़ता है।  कहने का भाव की जब विविधता संगठित होकर एक्सटाः चलती है, तब ही सफलता कदम चूमती है।

अब प्रश्न यह उठता है कि जब यह बात सिद्ध है कि संगठन में ही शक्ति है और संगठित होने से ही सफलता मिलती है, तो फिर हम संगठित क्यों नहीं रह पाते? हम एकजुट होकर कोई कार्य क्यों नहीं कर पाते? इस एकता के नियम को हम अपने जीवन में लागू क्यों नहीं कर पाते? इन सभी कारणों को

पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए मार्च माह, २०१५ की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका…

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