चीन का ड्रैगन- मेड इन इंडिया!

…एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन के लंच ब्रेक के दौरान भारत के वैदिक विद्वान श्री देव गोस्वामी तथा चीन के साहित्यकार (मिस्टर चेन), धार्मिक पंडित (मिस्टर चिंग) व इतिहासकार (मिस्टर चाओ) के बीच एक रोचक बहस छिड़ जाती है। गोस्वामी जी प्रमाण सहित चीनी विद्वानों को समझाते हैं कि किस प्रकार चीन के इतिहास, दर्शन, साहित्य, कला, ज्ञान-विज्ञान का आधार भारतीय संस्कृति व संस्कार हैं- यहाँ तक कि चीन का राष्ट्रीय प्रतीक- 'ड्रैगन' भी मूल रूप से भारत का शेषनाग है।  आइये, आगे की चर्चा सुनते हैं-

मिस्टर चाओ- आपके तर्कों को मानें तो, हमारी प्राचीन जीवन-शैली बहुत हद तक वैदिक ही रही होगी! हम बिल्कुल आप भारतीयों की तरह ही जीते होंगे।  क्यों मिस्टर देव?

श्री देव गोस्वामी- जीते! सिर्फ जीते ही नहीं, वरन आपके मृत्यु सम्बन्धी संस्कार भी वैदिक प्रथाओं का ही अनुसरण करते थे। सामान्यतः ऐसी मान्यता है कि प्राचीन चीनी पूर्वज भी शवों को गाड़ा करते होंगे। परन्तु ऐतिहासिक वर्णन कुछ और ही कहते हैं। शोधक मार्कोपोलो अपने ग्रंथ- 'The Travels of Marco-Polo (Vol.२)'  में प्राचीन चीन की प्रथाओं में दाह-संस्कार की पुष्टि करते हैं।  … इब्न बटूटा का कहना है- (प्राचीन) चीनी लोग ईसाई मान्यताओं के समर्थक नहीं थे तथा मूर्ति पूजक थे। वे मृतकों के शवों को हिन्दुओं की भाँति जलाया करते थे। ' सो, मिस्टर चाओ, आप देख सकते हैं, वैदिक रीति-रिवाज़ किस तरह चीनी जान-जीवन और मरण में अपनी पैठ बनाये हुए थे।

मिस्टर चाओ- देखिये, जान-जीवन के सबसे महत् प्रतीक- 'त्योहार' होते हैं। हमारे पर्वोत्सव, त्योहार आदि तो आपसे बिल्कुल भिन्न हैं।

श्री देव गोस्वामी- मिस्टर चाओ, कैसी बात करते हैं? आपने तो हमारे वसंतोत्सव को बड़े चाव से सहृदय अपनाया है। रिकार्ड में वर्णन मिलता है कि ३० जनवरी १९८७ को आपने बड़ी धूम-धाम से यह त्योहार मनाया था।  उस दिन पीले वस्त्र पहने, पतंगे उड़ाईं, वृक्षों पर झूले डालकर झूले।

वसंतोत्सव के झूलों का वर्णन सुनकर मिस्टर चाओ स्वयं सहमति-असहमति के बीच झूलते दिखाई दिए। श्री देव गोस्वामी कहते गए…

श्री देव गोस्वामी- आप मानें या न मानें, विश्वव्यापी वैदिक संस्कृति ने आपके छोटे-से छोटे पदार्थों को भी प्रभावित किया है। …

आगे कैसे श्री देव गोस्वामी ने इतिहास के अनखुले पन्नों को बखूबी खोला? कौनसे अनकहे किस्सों का ज़िक्र किया? चीन भारतीय संस्कृति द्वारा रचित है।  कैसे? चीन और किन-किन पहलुओं में प्राचीन भारत की सांस्कृतिक धरोहरों का ऋणी है, ये सब पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए अप्रैल'१५  माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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