क्या मेरा डब्बू कुछ बन पाएगा?

' मेरा बच्चा जीनियस बने! हर कक्षा में टॉप करे! इसकी बुद्धि कुशाग्र हो! यह खूब प्रगति करे!...'- अपने बच्चों के लिए ऐसे ही अरमान पलते हैं न आपके दिल में! और इन ख्वाबों को हकीकत में बदलने के लिए आप हर संभव प्रयास भी करते हैं। अपने मित्रों, पडोसियों, सहकर्मियों इत्यादि से जानकारी इकट्ठी करते रहते हैं। फिर आपकी पूरी कोशिश होती है कि उन सभी फार्मूलों को अपने बच्चों पर फिट कर दें। है न! लेकिन इतना करने पर भी जब मनचाहे परिणाम देखने को नहीं मिलते, तो आपको टैन्शन सताने लगती है- 'पता नहीं, यह क्या करेगा? इसके साथ के सारे बच्चे आगे निकल जाएँगे और यह डब्बू ही रह जाएगा!'

आप सभी अभिभावकों की इन्हीं परेशानियों को ध्यान में रखते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने एक 'सलाहकारी सत्र' आयोजित किया। इसमें माता-पिता ने अपने बच्चों की पढ़ाई, उनके भविष्य इत्यादि को लेकर अपनी समस्याएं रखीं। उनके प्रश्नों के समाधान वैज्ञानिक प्रमाणों एवं सटीक उदाहरणों द्वारा सुझाए वरिष्ठ सलाहकारों ने। प्रस्तुत है, उसी सत्र की कुछ झलकियाँ। इन्हें पढ़कर सम्भवत: आपको भी अपनी परेशानियों का हल ढूंढने में मदद मिलेगी।

अभिभावक (क)- मेरा तो मानना है कि जो बच्चे जीनियस होते हैं, वे जन्म से ही अपने भीतर काबिलियत लेकर आते हैं। क्या यह सही है?

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खुद 'जीनियस' शब्द भी आपकी इस सोच को गलत सिद्ध करता है कि निपुणता या योग्यता व्यक्ति में जन्मजात होते हैं। जीनियस लैटिन के 'gignere' से निकला है, जिसका अर्थ होता है - 'उत्पन्न करना'। यानी अपने भीतर कुशलता उत्पन्न करना।

अभिभावक 'क'- लेकिन कैसे? मैं तो अपने बच्चे पर खूब मेहनत करता हूँ। उसे जी-जान लगा कर पढाता हूँ। ट्यूशन भी लगाई हुई है। ऐसा भी नहीं है कि वह पढना नहीं चाहता। बहुत कोशिश करता है। पर फिर भी आउट-पुट ही नहीं निकलता।

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यदि एडिसन की बात करें- वे भी बचपन में पढ़ाई में कुछ खास प्रदर्शन  नहीं कर पाते थे। उनकी बुद्धि कुशाग्र नहीं थी। पर मेहनत और अभ्यास से उन्होंने अपने मस्तिष्क के अनचाहे सर्किट मिटाए और नए स्नायु नेटवर्क बनाते चले गए। इसी का परिणाम है कि आज एडिसन का नाम अनेक आविष्कारों के साथ जुडा है। तभी कहते हैं- जीनियस व्यक्ति की योग्यता में 99% योगदान उसकी मेहनत का होता है।

अभिभावक (ख)- मेरे बेटे का दिमाग तो बहुत तेज है। लेकिन उसने पढ़ाई को कभी गम्भीरता से नहीं लिया। जैसे-तैसे अब कॉलेज में आ गया है। मुझे तो उसके भविष्य को लेकर बहुत चिन्ता लगी रहती है। पता नहीं क्या होगा उसका? मैं तो उससे अब यही कहता हूँ- 'तेरे हाथ से समय निकल चुका है। तू अपने जीवन में अब किसी उपलब्धि को हासिल नहीं कर सकता।'

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ऐसे ही अभिभावक के अनेक प्रश्नों के वरिष्ठ सलाहकारों द्वारा समाधान जानने के लिए पूर्णतः पढिए अप्रैल'१५ माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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