बिना मरम्मत वास्तुदोषों से छुटकारा!

'वास्तु' शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के 'वस्' शब्द से हुई है। 'वस्' अर्थात वास करना या रहना। अतः वास्तु शास्त्र व वास्तु कला का अर्थ हुआ- निवास योग्य भवनों का निर्माण करने वाली कला। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि आधुनिक सदी की इस कला की जड़ें वैदिक काल में हैं। पर क्या वैदिक वास्तुशास्त्र का उद्देश्य भी मात्र ऊँचे-ऊँचे भव्य भवनों का निर्माण करना था? या उसके भीतर उच्च वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश था? यह भी विचारणीय है कि क्या वास्तुदोषों से मुक्त आवास ही हमारी सुख-समृद्धि के लिए उत्तरदायी है? या फिर कोई ऐसा तरीका है, जिसे हम वास्तुदोषों के कंटकों को परिणत कर सकें?

इन अनसुलझी गुत्थियों के समाधान हेतु चलते हैं, पंडित महोदय नरेश तिवारी जी के निवास स्थल पर। इन्होनें कुछ समय पूर्व ही अपने नए घर में प्रवेश किया है। नरेश तिवारी जी के निमंत्रण पर आज उनके परम मित्र सतीश उपाध्याय जी, जो कि अध्यात्मवेत्ता होने के साथ-साथ वैदिक वास्तुशास्त्र के ज्ञाता भी हैं, उनके घर आए हैं।  तो बिना विलम्ब किए, हम इन दोनों की चर्चा में शामिल होते हैं। 

सतीश उपाध्याय- वाह! नरेश बाबू, मानना पड़ेगा। घर तो आपने बहुत शानदार बनवाया है! लगता है, अपना सारा ज्ञान उड़ेल दिया है, इसके निर्माण में?

नरेश तिवारी- प्रयास तो मैंने पूरा किया है। हर दिशा का ध्यान रखकर अलग-अलग कक्षों को बनवाया है। कौन-सी दिशा खाली छोड़नी है? कौन-सी में भारी सामान रखना है? यह सारा आकलन वास्तुकार से करवाया है।

सतीश उपाध्याय- बहुत खूब! पर क्या आप जानते हैं कि वास्तुशास्त्र का यह ज्ञान प्राचीन काल में बहुत उन्नत था?

नरेश तिवारी- अच्छा! वो कैसे?

सतीश उपाध्याय- वास्तु शास्त्र के अंतर्गत दिशाओं का गणित व व्यवस्था... वास्तु पुरुष की स्थिति द्वारा लगाई जाती है।

नरेश तिवारी- वास्तु पुरुष! यह कौन है?

सतीश उपाध्याय- प्राचीन भारत के वास्तुशास्त्रियों का मानना था कि हर निवास स्थान में वास्तु पुरुष का वास होता है। परिवार कि सुख-समृद्धि, सदस्यों के बीच सामंजस्य, प्रेम आदि वास्तु पुरुष की प्रसन्नता पर निर्भर करता है। तो वहीं परिवार पर आने वाले संकट व दुःखों का कारण वास्तु पुरुष की अप्रसन्नता होती है।

नरेश तिवारी- मतलब? वास्तु पुरुष की प्रसन्नता-अप्रसन्नता से घर के सुख-संकट का क्या मेल?

सतीश उपाध्याय- प्राचीन वास्तुशास्त्रियों के अनुसार यह वास्तु पुरुष भूखंड पर लेता हुआ है। ... भवन निर्माण के समय यह ध्यान रखा जाता है कि वास्तु पुरुष के किस अंग कि दिशा में क्या बनना चाहिए, किस अंग वाला स्थान खाली रखना चाहिए। इस पुरुष की देहाकृति व दिशा के अनुसार ही वास्तु-कला के बहुत से नियम बनाए गए। इन नियमों का पालन करना वास्तु पुरुष को प्रसन्न करना है। ...

नरेश तिवारी- ज़रा विस्तार से यह भी बताइए कि वास्तु शास्त्र के इन नियमों का आधार क्या है, वैज्ञानिकता क्या है?

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क्या सामंजस्य है, वास्तु ओर अध्यात्म के मध्य? क्या हम मकान-निर्माण में जो वास्तुदोष रह गए हों, उन्हें आध्यात्मिक शक्ति के बल पर ठीक कर सकते हैं?ये सब जानने के लिए पढ़िए जून माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान २०१५ मासिक पत्रिका!

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