आइए, शपथ लें...

शास्त्र कहते हैं, एक शिष्य निरन्तर चलता है। इस 'निरन्तर' शब्द का अर्थ समझते हैं आप? ऐसा समर्पण, ऐसा चिंतन, ऐसी गति, ऐसी मति, ऐसा अरमान, ऐसा ईमान- जिसमें न कोई अटकन हो, न कोई अड़चन! न कोई रुकावट हो, न ही थकावट! एक ऐसा सिलसिला, जिसका आरम्भ तो है, पर अंत नहीं।

वैसे भी, गुरु-भक्तों की डगर और उनका सफर तो हमेशा से संसार से जुदा ही रहा है... चाल में भी और अंदाज़ में भी! संसार में हासिल की गई किसी भी वस्तु पर निर्माण-तिथि के साथ समाप्ति-तिथि भी छपी होती है। सांसारिक नौकरी में भी यदि प्रवेश तिथि है, तो साथ में रिटायरमेंट तिथि भी है। पर ऐसा संसार में होता है, गुरु-दरबार में नहीं। यहाँ से प्राप्त किए गए शिष्यत्व की कोई समाप्ति या रिटायरमेंट तिथि नहीं होती। जीवन के समाप्त हो जाने के बाद भी नहीं! गुरु-सेवा के क्षेत्र में एक बार नियुक्ति हो जाने के पश्चात्, फिर कोई निवृति नहीं होती। इस दायित्व को तो हर जन्म में निभाना होता है।

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सचमुच! गुरु-भक्तों का अंदाज़ निराला ही होता है। संसार से बिल्कुल अलग! आज दुनिया को बहुत चिंता रहती है, परवाह होती है- अपने जीने और मरने को लेकर! कहते हैं- अमरीका के लोग जीते-जी तो अपनी ज़िन्दगी को ऐशो-आराम से सजाते ही हैं, लेकिन उन्हें यह चिंता भी लगी रहती है कि मरने के बाद वे जिस जगह पर दफन हों, वह स्थान भी उच्चवर्गीय और शानदार हो। इसलिए वे पहले ही अपनी कब्र के लिए अपना पसंदीदा स्थान निर्धारित कर लेते हैं। शिष्यों को भी अपने जीने-मरने की परवाह होती है। लेकिन चिंता-चिंता में भी फर्क है। उनकी चिंता यह नहीं होती कि जीते-जी उनके देह को कितने ऐशो-आराम के साधन मिले और मरने के बाद उनके छ: फुट के शरीर को किस मिट्टी में दबाया जाएगा, किन लकड़ियों पर भस्मीभूत किया जाएगा! उनकी तो बस एक ही चाहत होती है- जीते जी भी गुरु के हृदय में बसे रहें और मरने के बाद भी गुरु के हृदय में ही स्थान मिल सके। और अपनी इस चाहत को पूरा करने के लिए, वे जीते-जी तो वफा निभाते ही हैं, मरने के बाद भी इसे मिटने नहीं देना चाहते!

हम भी इसी तरह दीवानगी की हदों को तोड़ पाएँ, इसके लिए कैसी शपथ लें, जानने के लिए पूर्णतः पढिए अगस्त'१५ माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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