एक घर के बाहर एक कुतिया रहती थी। पता नहीं, कहाँ से आयी थी! पर उसने उस घर के आगे के फुटपाथ को ही अपना घर बना लिया था। वह इतनी सीधी- सादी थी कि किसी ने कभी उसके भौंकने की आवाज़ तक नहीं सुनी थी। उनके माता-पिता को कभी भय नहीं होता था कि वह उनके बच्चों का कोई नुकसान कर देगी।
फिर एक दिन, उसने उस घर के सामने वाले खाली प्लॉट में छ: बच्चों को जन्म दिया। प्यारे- प्यारे, छोटे-छोटे! उस घर के अड़ोसी-पड़ोसी उसका और उसके बच्चों का खाने-पीने आदि का ख्याल रखने लगे। पर जैसे-जैसे उसके बच्चे बड़े होने लगे, उस मोहल्ले की शांति खत्म होने लगी। कुतिया और उसके बच्चे दिन-रात भौंकते रहते। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ऐसा क्या हो गया कि इतनी शांत कुतिया अचानक से इतनी झगड़ालू कैसे हो गई! एक दिन एक व्यक्ति ने फैसला किया कि वह इस स्वान परिवार की गतिविधियों पर नज़र रखेगा और इस बदलाव का पता लगा कर रहेगा। दो-तीन दिनों तक उनकी गतिविधियों की निगरानी करने पर उसने पाया कि जैसे ही कोई अजनबी मनुष्य या पशु, विशेषकर कुता, उन बच्चों के आस-पास जाने का प्रयास करता, तो वह कुतिया भौंकना शुरु कर देती। फिर उसके पीछे-पीछे उसके सारे बच्चे भी भौंकने लगते।
अब उसकी समझ में आया कि चिंता, भय और असुरक्षा की भावना के कारण ही कुते भौंकते हैं। जब तक कुतिया अकेली थी, तब तक उसे कोई चिंता नहीं थी, भय नहीं था, असुरक्षा की भावना नहीं थी। बच्चों के आने के बाद उसके मन में बच्चों की सुरक्षा की चिंता उत्पन्न हुई। इसी का परिणाम था, यह दिन-रात की भौं-भौं।
कुतों के प्रति किए गए इस शोध का परिणाम मानवीय व्यवहार पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है। जो व्यक्ति जितना ज़्यादा चिंतित, भयभीत और असुरक्षित महसूस करता है, वह उतना ही ज़्यादा शोर मचाता है। जो जितना निश्चिंत, निर्भय और निर्द्वंद्व होता है, वह उतना ही शांत होता है।
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अब सवाल यह उठता है कि आखिर अपने जीवन की भौं- भौं अर्थात् चिंता, भय, अशांति, असुरक्षा, दुविधा, द्वंद्व और परेशानी खत्म कैसे की जाए, जानने के लिए पूर्णतः पढिए अगस्त'१५ माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।