सोशल मिडिया से क्या खोया, क्या पाया?

दोस्तों! 'दिल खोल के बोल' नामक इस शो में आप सभी का स्वागत है। मैं हूँ रजत खन्ना और आज हम एक बहुत ही खास विषय पर चर्चा करने वाले हैं। एक ऐसा विषय, जो हम सब की ज़िन्दगी के साथ इस हद तक जुड़ चुका है जिसके बिना जीवन जीना सम्भव नहीं लगता। जी हाँ, आप बिल्कुल सही समझे- हम बात करने जा रहे हैं- सोशल मिडिया यानी फेसबुक, ट्विटर, वट्स-ऐप की!

इस विषय पर बात करने के लिए एक खास पैनल हमारे स्टूडियो में मौजूद है। सोशल मिडिया का समर्थन करते हुए- आज की युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं- रोहित जी। ये एक इंजीनियर हैं और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करते हैं। डॉ. ए. एल. अग्रवाल जी एक जाने-माने मनोचिकित्सक एवं सलाहकार हैं। आलोक जी, एक समाज विशेषज्ञ हैं और रीमा जी, बैंक मैनेजर हैं। आप सभी मेहमानों का हमारे शो में आने के लिए धन्यवाद!

रोहित जी, मैं आपसे शुरुआत करना चाहूँगा। यदि मैं कहूँ कि युवा और सोशल मीडिया आजकल एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं, तो क्या यह सही नहीं होगा?

रोहित- बेशक! खुद को टैक्नॉलजी के साथ एकदम अपडेटिड रखना ही युवाओं का गुण है। ...यदि ये न होते तो हमारी ज़िन्दगी कितनी फीकी और बोरिंग होती! ...

डॉ. अग्रवाल ( काउंसलर)-...पर मेरा मत है कि सोशल मीडिया पर बनने वाले रिश्ते वास्तविक न होकर, वास्तविकता का आभास भर कराते हैं।...

रोहित- ऐसा कैसे कह रहे हैं आप?...

रीमा- कैसे? ...किसी भी की-पैड पर ऐसा कोई बटन न लगा सकते हैं, न दबा सकते हैं जो आपके दिल की गहराइयों को छू सके।

रोहित- ...यह सोशल मीडिया की ही देन है कि आज नैनोसैकेन्ड में एक-दूसरे से बात हो जाती है। इसलिए कहते हैं कि अब F2F यानी फेस-टू-फेस बातचीत का ज़माना गया।

डॉ. अग्रवाल- पर रिसर्च बताती है कि फेस-टू-फेस बातचीत की मात्रा  जितनी कम होती है, ज़िन्दगी में उदासी, मायूसी, खोखलेपन की भावना उतनी ही ज़्यादा होती है। ...

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तो आखिर सोशल मीडिया से वास्तविकता में क्या खोया और क्या पाया, पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए जनवरी’16 माह की  अखण्ड ज्ञान हिन्दी मासिक पत्रिका।

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