वेलेंटाइन युगल ऑफ त्रेता!

इस माह की 14 तारीख को विश्व-भर मे वेलेंटाइन दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस दिन प्रेमी-युगल एक-दूसरे के प्रति अपने प्रेम का इज़हार वेलेंटाइन कार्ड, फूल, चॉकलेट आदि देकर करते हैं। अमेरिका के ग्रीटिंग कार्ड ऐसोसिएशन के अनुसार इस दिन लगभग एक अरब वेलेंटाइन कार्ड  पूरी दुनिया में लोग खरीदते हैं। भारत के युवा भी अब  इस विदेशी पर्व को मनाने की होड़ में हैं। पर क्या आज के आधुनिक प्रेमी जोड़े प्रेम के सच्चे अर्थ, उसकी गहराई व उसके मोल को जानते हैं?  हम आज आपको भारतीय इतिहास के ऐसे सच्चे प्रेमी-युगल की गाथा सुनाते हैं, जिन्होंने न एक-दूसरे को कभी वेलेंटाइन कार्ड दिया, न गुलाब के फूल भेंट किए। पर आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में उनके प्रेम की अमिट गाथा दर्ज़ है और आज युगों बाद भी उसकी खुशबू इस धरा को पावन कर रही है। ऐसा पवित्र प्रेम जिसमें वासना की कामना नहीं; त्याग, बलिदान, निस्वार्थता की भावना थी। यह प्रेमी-युगल था- त्रेता काल के लक्ष्मण व उनकी भार्या उर्मिला।
लक्ष्मण ने माँ को प्रणाम किया। ' अच्छा हुआ लखन तुम आ गए। मैं अभी कौसल्या दीदी के पास ही जा रही थी।' सुमित्रा ने लक्ष्मण के लिए आशीर्वाद सूचक शब्दों का प्रयोग न कर केवल आशीर्वाद की मुद्रा में अपने दोनों हाथ उठाते हुए कहा, ' तुमने ऐसे समय में राम को अकेला क्यों छोड़ा हुआ है? तुम्हें तो उसके साथ होना चाहिए था।'

' माँ! मैं भाई के साथ ही था। वे वन जाने की त्वरा में अनिवार्य कार्यों को समेटने और औपचारिक व्यवस्थाओं को निबटाने में लगे हैं। तब से मैं...'

'...तभी तो कह रही हूँ कि तुम्हें राम के पास उसकी सहायता के लिए होना चाहिए था। तुम यहाँ क्या करने आए हो?' सुमित्रा ने लक्ष्मण की बात पूरी ही नहीं होने दी।

'मैं भ्राता  श्रीराम और माँ सीता के साथ चौदह वर्षों के लिए वन को जा रहा हूँ। भाई ने तो मना ही कर दिया था; किन्तु मेरे हठ के आगे उनकी एक न चली और उन्होंने मुझे अपने साथ वन जाने की अनुमति दे दी है। मैं आपसे भी अनुमति लेने आया हूँ।' लक्ष्मण ने एक साँस में कह डाला।

उर्मिला अभी तक तो इस राजनीतिक भूचाल के समाचार के ऊहापोह से उबरी भी न थी कि लक्ष्मण की इस घोषणा ने उसे चिंतित कर दिया। वह सोचने लगी कि ये यह क्या कर रहे हैं कि जेठ जी ने उनको अपने साथ चौदह वर्षों के लिए वन जाने की अनुमति दे दी है और अब वे अपनी माता से आज्ञा लेने आए हैं। क्या उर्मिला का कोई अस्तित्व ही नहीं? उससे वे पूछेंगे भी नहीं?  उससे इस विषय पर चर्चा भी नहीं करेंगे? कहाँ तो वे उसे प्रतिदिन घटी छोटी से छोटी घटना भी बताते थे और कहाँ जीवन का इतना महान निर्णय वे स्वयं और अपनी माता की इच्छानुसार कर रहे हैं। वे तो वनवास में जेठ जी के साथ जाने के लिए इस प्रकार कह रहे हैं, जैसे वे वन विहार के लिए जा रहे हों और संध्याकाल तक लौट आएँगे। चौदह वर्ष अर्थात् इस अवस्था के अनुसार जीवन का सुन्दरतम काल... और वे यह काल उसके बिना वन में बिताएँगे। उर्मिला के मन में आया कि वह लक्ष्मण के समक्ष अपने मन के ये सारे भाव कह डाले। लक्ष्मण से पूछे कि वे उसे इस प्रकार उपेक्षित छोड़ कर कैसे जा सकते हैं? किन्तु कहे कैसे? माँ के सम्मुख पति को इस प्रकार उपालंभ देना उसे मर्यादा के अनुकूल नहीं लग रहा था और उसका मन था कि उसे बोलने के लिए लगातार धक्के मार रहा था।
क्या यही प्रेमी युगल वेलेंटाइन ऑफ त्रेता बना? कैसे ? जानने के लिए पढ़िए फरवरी'16 माह की अखण्ड ज्ञान हिंदी मासिक पत्रिका।

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