ताकि हम आज़ाद भारत में साँस ले सकें!

प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को, हम भारतीय पूरे जोश व उल्लास से स्वतंत्रता दिवस मनाते है। यही वह तारीख है, जब सन् 1947 में अंग्रेज़ी हुकूमत से हम सभी को आज़ादी मिली थी। इतिहास की एक ऐसी उज्ज्वल सुबह, जब भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की कड़ी तपस्या रंग लाई थी। तब हर भारतीय के होठों पर गुंजायमान था, सिर्फ एक ही तराना- ' अब हम आज़ाद हैं!'

पर हाँ, यह युग सत्य है कि इस आज़ादी को पाना आसान न था। इसके लिए स्वतंत्रता सेनानियों को शूलों से भरे लम्बे रास्तों पर नंगे पाँव चलना पड़ा था। बेइंतहां ज़ुल्म और पीड़ा के दरिया को पूरी दिलेरी से पार करना पड़ा था। इस स्वतंत्रता के महासंग्राम में कई दिल दहला देने वाली घटनाएँ घटीं... जिनको सुन कर कभी नयन नम, तो कभी मस्तक गौरवान्वित हो उठता है। तो पढ़ते हैं, वीर-रस से ओतप्रोत भारतीय सपूतों के कुछ ऐसे ही बलिदानों को!

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भारत का सूर्य पुत्र... जिसने आज़ादी का स्वप्न देखा!

सूर्य सेन बंगाल के क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। खासकर चटगाँव में जो ' ब्रिटिश विरोधी आंदोलन' हुआ, उसके ये मुख्य नायक थे। 18 अप्रैल, 1930 को सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने चटगाँव में स्थित ब्रिटिश शस्त्रागार को लूट लिया था और चटगाँव कुछ दिनों के लिए अंग्रेज़ी शासन से मुक्त हो गया था। बंगाल भर में क्रांति की अलख सूर्य ने बड़ी तेज़ी से जगाई थी।

इसी वजह से अंग्रेज़ी हुकूमत सूर्य को धर-दबोचने के लिए लगातार प्रयासरत थी। पर उनसे बचने के लिए सूर्य निरन्तर निवास-स्थान बदलते रहते।एक बार उन्होंने' नेत्र सेन' नामक एक व्यक्ति के घर में शरण ली। सूर्य सेन के ऊपर अंग्रेजों ने 10,000 रुपये का ईनाम रखा हुआ था। इसी लालच में आकर नेत्र सेन विश्वासघात कर बैठा। उसने ब्रिटिश अधिकारियों को सूचना दे दी।...

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फिर कैसे यह क्रांतिवीर निरन्तर सूर्य के समान धधकता रहा... आज़ादी की गर्जना करता रहा पूर्णत: जानने के लिए पढ़िए अगस्त'16 माह की हिंदी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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