आओ प्रकृति से अपनी प्रवृति सँवारें!

प्रकृति से हमें जीवन जीने के लिए सबकुछ मिलता है- भोजन, हवा, पानी... और यहाँ तक कि अनमोल प्रेरणाएँ भी। जी हाँ! यदि हम प्रकृति को गौर से देखेंगे, तो उसमें ऐसे बहुत से सूत्र पाएँगे जो हम साधकों की प्रवृत्ति संवारने में सहायक हैं। आइए, इस माह अपने शारीरिक भोजन के साथ-साथ साधकता की खुराक का बंदोबस्त भी प्रकृति के ज़रिए करते हैं।

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...जीव का नाम 'प्रेयिंग मेंटिस' है यानी 'प्रार्थनारत कीट'। अपने नाम के अनुरूप यह बिल्कुल सादगी से अपने हाथों को हमेशा जोड़ कर रखता है। साथ ही, इसमें बहुत सी अन्य खूबियाँ भी मौजूद हैं। जैसे- यह जिस वातावरण में रहता है अर्थात जिस भी पेड़-पौधे का संग करता है, खुद को उसी के रंग में बदल लेता है। यहाँ तक कि बाहरी आकृति भी उनके पत्तों और टहनियों जैसी बना लेता है। और तो और इसके पास कम्पाऊंड (संयोजित) दृष्टि होती है। कहने का मतलब, इतनी पैनी और तेज़ दृष्टि कि कोई इसकी आँखों से बचकर नहीं निकल सकता। यह अपनी गर्दन भी 180° तक घुमा सकता है।


है न क्या खूब बनावट इसकी! लेकिन क्या आपको पता है, अपनी ये सारी खूबियाँ यह किस कार्य में लगाता है? किसी के प्राणों का अंत करने के लिए यानी अपने शिकार को फँसाने के लिए। अपने जिन दो हाथों को यह प्रणाम मुद्रा में जोड़कर रखता है- वास्तव में उन्हीं हाथों से यह अपने शिकार को दबोच लेता है।


साधकों! संभवतः आप इस कीड़े से मिलने वाला संदेश समझ गए होंगे। साधकता की जिस राह पर हम बढ़ रहे हैं, उस पर हमें भी कुछ ऐसे लोग मिल सकते हैं जो बाहर से दिखने में बेहद गुणवान और सधे हुए लगें। वे खुद को हू-ब-हू हमारे जैसे रंग में ही ढाल लेंगे। हमसे ऐसे लहज़े में बात करेंगे मानो इस पथ पर हमारे सच्चे हितैषी हों। हो सकता है, उनके ऐसे हाव-भाव व बातों से हम उनकी तरफ आकर्षित भी हो जाएँ। परन्तु साधकों, सावधान! ऐसे सभी लोगों से सतर्क हो जाइए। क्योंकि उनके समस्त गुणों का भी केवल एक ही मकसद होता है- हमें फाँसना! हमारी साधकता को क्षति पहुँचाना... उसके प्राण हर लेना... और हमें इस मार्ग से हमेशा के लिए तोड़ देना, अलग कर देना।
इसलिए, गुणों और अच्छाई का केवल आवरण ओढ़ने वालों से बच कर रहें। उनके चंगुल में फँसकर अपनी साधकता को खतरे में न डालें।

कैसे हमारी साधकता पूर्ण रूप से पुष्पित- पल्लवित हो, ताकि हमारी आतंरिक प्रकृति की खूबसूरती से दूसरे भी प्रेरणा ले पाएँ, ऐसी प्रकृति से मिलने वाली असंख्य और शिक्षाओं को जानने के लिए पढ़िए पूर्णतः दिसम्बर'१६ माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका...

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