यूनान में कब और कैसे पहुँचे-श्रीकृष्ण?

यूनान में श्रीकृष्ण

प्रमाण पुरातत्त्व विज्ञान से!
1970 के दशक में, अफगानिस्तान के अय-खनुम जिले में, पुरातत्त्व विशेषज्ञों ने एक बड़ी खोज की। वहाँ की गई खुदाई में उनको लगभग 180 ई.पू. के चाँदी के सिक्के मिले। इन चोकोर सिक्कों के दोनों तरफ दो आकृतियाँ उकेरी हुई थीं। विश्लेषण करने पर सिक्के के एक तरफ श्रीकृष्ण और दूसरी तरफ बलराम चित्रित मालूम हुए। श्रीकृष्ण ने एक हाथ में छह आरे वाला चक्र और दूसरे में शंख पकड़ा है। श्री बलराम ने एक हाथ में हल और दूसरे में मूसल थामा हुआ है। दिलचस्प बात यह है कि सिक्के के दायीं तरफ 'राजाने' और बायीं तरफ 'अगथुक्लयेश' अंकित है। इसका अर्थ हुआ, 'यूनानी राजा अगोथक्लीस के ईश- श्री कृष्ण और श्री बलराम'। पुरातत्त्व विज्ञान के इस तथ्य से साफ हो जाता है कि यूनानी परम्पराओं में श्रीकृष्ण-बलराम को अत्यंत वंदनीय स्थान प्राप्त था।


यूनान में श्रीकृष्ण

प्रमाण इतिहास से!
बाद में अफगानिस्तान के इसी स्थान पर खुदाई करने पर 'हीराक्लीस' की तांबे की मूर्ति भी प्राप्त हुई। पहली सदी के रोमन इतिहासकार 'क्वींटस कर्टियस' के अनुसार जब चौथी सदी ई. पू. में सिकंदर ने भारतीय राजा पोरस पर आक्रमण किया था, तब पोरस के सिपाही भी यूनानी देव 'हीराक्लीस'की पताका को सेना के सबसे अग्रभाग में लहराते ले जा रहे थे। इसी घटना को क्वींटस ने अपनी पुस्तक, 'हिस्टरी ऑफ अलेक्ज़ेंडर द ग्रेट' में भी दर्ज़ किया है।
भारतीय राजा के एक यूनानी देवता से लगाव को विख्यात इतिहासकार 'एडविन ब्रयांत' सरल एवं स्थापित तथ्यों से समझाते हैं। जब हम 'मेगस्थीनीज़' ( चौथी सदी ई. पू. के यूनानी राजदूत) के लेखों के संदर्भ इकट्ठे करते हैं, तो पाते हैं कि जब उन्होंने भारत के बारे में विवरण दिया तो भारतीय नामों, परम्पराओं का यूनानी-करण कर दिया। ताकि वे ग्रीस (यूनान) की सभ्यता में आसानी से घुलमिल जाएँ। एक जगह मेगस्थीनीज़ लिखते हैं- 'भारत में 'सौरसेनोई' नामक एक जनजाति अपने प्रदेश में 'हीराक्लीस' को पूजती है। इस प्रदेश में दो नगर 'मेथोरा' और 'क्लैसबोरा' और एक 'जोबारस' नदी भी है।... 'गौर करने वाली बात है, इन जगहों का विवरण और नामों की बनावट भारतीय नामों से हू-ब-हू मेल खाती है। उदाहरण के तौर पर सौरसेनोई- शूरसेना, मेथोरा- मथुरा, क्लैसबोरा- कृष्णपुरा, जोबारस- यमुना और हीराक्लीस-हरि कृष्ण! भारतीय इतिहासकार ईश्वरीय प्रसाद के अनुसार 'पोरस' शूरसेन कुल से सम्बन्ध रखता था। जो उस समय श्री कृष्ण को अपना ईष्ट मानते थे, तो उनके सैनिक भी कृष्ण की ही पताका को लहराते हुए युद्ध में बढ़ते थे। इसलिए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि एतिहासिक यूनानी पुस्तकों के हीराक्लीस और कोई नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण ही थे।
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चाहे वे पुरातत्त्व-विज्ञान की खोजे हों, इतिहास के पन्नों में अंकित सत्य, तर्क-आधारित तथ्य हों या फिर पौराणिक-गाथाओं में छिपे राज़- सब एक ही ओर इशारा करते हैं। यह कि यूनानी सभ्यता में श्री कृष्ण की पग-धूलि हर ओर बिखरा हुई है। अंतर सिर्फ जानने या न जानने का है। कब और कैसे श्रीकृष्ण यूनान की सभ्यता, संस्कृति,प्राचीन किस्से-कहानियों का हिस्सा बन गए, पूर्णतः जानने के लिए  पढ़िए जनवरी'17 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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