आज के युवाओं का अध्यात्म, धर्म और भगवान- इन सबके बारे में क्या सोचना है? इसके लिए हमने अलग-अलग समय पर, अलग-अलग क्षेत्रों में हुए शोध व सर्वे इकट्ठे किए। उन सबके परिणामों में हमें एक ही स्वर सुनाई दिया, जिसकी झलक कुछ इस प्रकार है-
विश्व में सबसे प्रचलित विचार-धर्म की आवश्यकता नहीं!
(नेशनल जियोग्राफिक, 22 अप्रैल 2016)
-कई वर्ष पहले, 'टाइम' पत्रिका ने अपने कवर पेज़ पर बड़े-बड़े अक्षरों में ये शब्द छापे थे- ' Is God Dead?' ( क्या ईश्वर मृत हो चुका है?) यह प्रश्न समाज की, विशेषकर युवाओं की, धर्म में लगातार घटती रुचि को ध्यान में रखकर पूछा था। हैरानी की हदें तो वहाँ पार होती नज़र आईं, जब इस हैडलाइन को पढ़कर कुछ 'अत्यधिक माडर्न' युवाओं ने यह कहा- 'भगवान! वह कौन है?'
सिंगापुर के युवाओं ने अध्यात्म को नकारा!
(द स्ट्रेट्स टाइम्स, सिंगापुर, 21मार्च 2016)
'मुझे यह बात बिल्कुल बेतुकी लगती है कि भगवान होता है! इसका कोई प्रमाण नहीं है।'
2015 के 'द डिपार्टमेंट ऑफ स्टेटिस्टिक्स जनरल हाउसहोल्ड' सर्वे के अनुसार धर्म एवं अध्यात्म को बिल्कुल न मानने वालों की संख्या में काफी उछाल आया है।
अब और ज़्यादा भारतीयों ने ईश्वर को मानना छोड़ा!
(द टाइम्स ऑफ इंडिया सर्वे, 27 मई 2013)
- ग्लोबल इन्डेक्स ऑफ रिलीजिओसिटी एण्ड ऐथीज़्म' के ताज़ा सर्वे के मुताबिक, भारत में ईश्वर को न मानने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है।
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मेल ऑनलाइन, 22 जून 2009
- 59% बच्चों का मानना था कि धर्म और भगवान जैसी चीज़ें समाज पर गलत असर डालती हैं।
- 47% बच्चों के अनुसार धर्म का विश्व में कोई स्थान नहीं है।
- 60% बच्चे कहते हैं कि धर्म से संबंधित...
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एपिक इंटरव्यू
- युवाओं से पूछा गया- 'क्या तुम ईश्वर को मानते हो?' जवाब कुछ इस प्रकार मिले-
'नहीं, मैं भगवान में विश्वास नहीं रखती! एक बार मैंने उन्हें दसवीं कक्षा में मदद करने के लिए कहा था... मैंने 90% माँगे थे; उन्होंने सिर्फ 60% ही दिए!'
कुछ भी स्कूलों में पढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं है।
'मैं पूरी तरह तो नहीं मानती भगवान को... हाँ कभी-कभी परीक्षा के समय में प्रार्थना कर लेती हूँ। मैंने आखिरी बार प्रार्थना तब की थी, जब मेरा ATM कार्ड खो गया था... फिर कार्ड मिल गया।
इसी प्रकार अन्य शोध भी धर्म और भगवान के सम्बन्ध में युवाओं में ऐसे ही नकारात्मक भाव दर्शाते हैं। इन सब अनुसंधानों द्वारा धर्म पर लगाए जाने वाले कुछ मुख्य आरोप उजागर होते हैं।
...आरोप 1- धर्म और भगवान से समाज को कोई लाभ नहीं ये सब बेकार की बातें हैं...
...आरोप 2- धर्म राष्ट्र के लिए खतरनाक है! इसी के कारण राष्ट्र में तनाव और बिखराव का माहौल पैदा होता है...
... आरोप 3- धर्म और भगवान जैसी बातें पिछड़े ज़माने की हैं आज के विकसित और तकनीकी युग में इन सब बातों का कोई स्थान नहीं है...
...आरोप 4- आज के युवा के पास शक्ति भी है और हासिल करने को बहुत से ऊँचे मुकाम भी... फिर धर्म जैसे विषयों में वह समय क्यों बर्बाद करें?
धर्म पर युवाओं के ये आरोप कितने जायज़ हैं? जानने के लिए पढ़िए मई'17 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।