गुरु का शासन अपने प्यारों पर होता है!

गुरुदेव क्या हैं? कैसे होते हैं? कितने गहरे... कितने प्यारे... कितने अपने- से... कितने मीठे... कितने नर्म... और शायद भगवान से भी बढ़कर! ऐसी हूकें इतिहास के हर उस शिष्य से उठी हैं, जिसे सच्चे गुरु रूपी महाग्रंथ के थोड़े-बहुत भी अध्याय पढ़ने का मौका मिला है। मन जब भी उन पन्नों को दोबारा-दोबारा पलटता है, नयन रो देते हैं और होंठ विहंस उठते हैं। हृदय गद्गद होकर कहता है- 'हर जन्म में आप मुझे यूँ ही मिलते रहना, गुरुवर!... क्योंकि आप न होते, तो मेरा क्या बनता?'

कुछ ऐसे ही अनुभव 'दया' के थे, जिसे योगानंद परमहंस जी ने 'दया माँ' कहकर प्यार दिया था। आज 'दया' हमें अपने गुरु की महिमा का एक अध्याय पढ़कर सुना रही हैं।

मैं बहुत सेन्सिटिव थी। माने... भावुक सी, नाज़ुक सी। किसी ने कुछ कहा नहीं कि एकदम सिकुड़ गई, चिड़चिड़ा गई। छोटी-छोटी बातें मुझे सड़ा जाती थीं। कई-कई दिन उन बातों को सोच-सोच कर मैं कुढ़ती, घुटती और घुलती रहती। मस्त मौले पन का तो शायद मुझमें फिलामेंट ही नहीं था। शर्मीली इतनी थी कि बस पूछो मत। चार लोगों के साथ घुलना-मिलना मेरी शान के खिलाफ था। हो सकता है, यह मेरा अहंकार हो!... या फिर 'लोग क्या कहेंगे' वाला डर!... क्या कहूँ, मैं ऐसी सी ही थी!! वैसे सच कहूँ, पूरी तरह तो मैं भी नहीं जानती कि 'मैं कैसी थी?' मगर गुरुजी जानते थे। मेरे स्वभाव के कमज़ोर बिंदुओं पर उनकी बड़ी पैनी नज़र थी।

उस दिन... आश्रम में उत्सव जैसा माहौल था। गुरुजी काफी विनोदी मूड में थे। बड़े ही मतवाले अनुयायियों से घिरे हुए थे। हर बात पर ज़ोरदार ठहाके लग रहे थे। हवा में मस्ती भरी रवानगी थी, शोखी थी। फिज़ा में अलग ही धूम थी। खुशियों के उस आलम में सबकी हिस्सेदारी थी। पर जानते हैं, मैं कहाँ खड़ी थी? हॉल की एक दीवार से सटकर... चुपचाप! सबसे अलग-थलग! बस, मुस्कुराती हुई, एक साक्षी बनकर।

... तभी, गुरुजी बिल्कुल बच्चों जैसे हो गए। उनके सामने मेज पर कुछ अखबार पड़े थे। वे उनके साथ खेलने लगे।... ...पर गुरुदेव कुछ भी ऐसे-वैसे करते हैं क्या?

लीला का राज़ कुछ ही क्षणों में खुलने लगा। गुरु जी अखबार के कागज़ से 'डंस कैप' (Dunce Cap) बना रहे थे। तीन नोक वाली अमरीकी टोपी! जो पहने वही जोकर लगे। 'पर... गुरु जी यह जोकर किसे बनाने वाले हैं??... माई गॉड... उनके मन में क्या चल रहा है? वे क्या करने वाले हैं?'- मेरे दिमाग के घोड़े रेस लगाने लगे। 'किसे पहनाएँगे यह जोकर टोपी?... उम्र के लिहाज़ से मैं यहाँ सबसे छोटी हूँ- मात्र 17 वर्ष की! कहीं मुझ बच्ची को तो इस सर्कस का स्टार चुन लिया जाएगा?'- ऐसे कई सर्पीले प्रश्न मेरे अंदर फन फैला चुके थे।...

टोपी उठा कर, मुस्कुराते हुए गुरु जी बोले- 'इधर आओ, दया।'...

...क्या गुरु का सबके सामने शिष्या की यूँ खिल्ली उड़ाना सही है? जानने के लिए पढ़िए जुलाई'17 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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