आजकल अच्छाई का ज़माना कहाँ है?

एक बार करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक ने अपने बेटे से कहा- 'आज मैं तुम्हें बिज़नेस के बारे में कुछ ज़रूरी जानकारी दूँगा। चलो मेरे साथ!' ऐसा कह कर पिता अपने पुत्र को कारखाने में ले गया। वहाँ पर एक 15 फीट ऊँची दीवार के पास ले जाकर उसे कहा-'इस पर चढ़ जाओ!' बेटा पिता के कहे अनुसार दीवार पर चढ़ गया। पिता ने नीचे से आवाज़ लगाई- 'अगर मैं कहूँगा कि नीचे कूद जाओ; मैं तुम्हें संभाल लूँगा... तो क्या कूद जाओगे?' बेटे का तुरंत जवाब आया- 'क्यों नहीं पिताजी... आप हैं तो मुझे किस बात का डर?' तब पिता ने सारी बत्तियाँ बुझा दीं। चारों तरफ घुप अंधेरा हो गया। पिता ने दोबारा पूछा- 'क्या अब कूद सकोगे?'

बेटा- परन्तु पिताजी, मुझे आप दिख नहीं रहे हैं...

पिता- चिंता मत करो! मैं ठीक तुम्हारे नीचे खड़ा हूँ... कूदो!

पिता के आश्वासन पर बेटे ने छलांग लगा दी! और... धड़ाम! वह पिता के हाथों में नहीं, बल्कि ज़मीन पर जाकर गिरा और दर्द के कारण ज़ोर से चिल्ला उठा। पिता पास आकर बोले- 'बेटे, बिज़नेस का सबसे पहला उसूल यही है- किसी पर विश्वास मत करो! अपने बाप पर भी नहीं। यहाँ कोई किसी का सगा नहीं होता। वो दिन गए जब लोग एक दूसरे के लिए अच्छा सोचते थे और भलाई भी करते थे।'

क्या सच में अच्छाई, सच्चाई, ईमानदारी- ये सब ज़िन्दगी जीने के सिद्धांत नहीं रहे? क्या अब सिर्फ झूठ, फरेब, धोखाधड़ी के सहारे ही ज़िन्दा रहा जा सकता है? क्या वास्तव में अच्छाई की कोई कीमत नहीं रही? क्या आज यह बात सबके दिलो-दिमाग में घर कर गई है कि अच्छे लोगों के साथ हमेशा बुरा ही होता है?... इसलिए अच्छा बनने का कोई फायदा नहीं है। यदि इन सब प्रश्नों के उत्तर स्वरूप, अपने निजी अनुभवों के आधार पर, आपके भीतर एक ही स्वर गूँजा- 'हाँ'... तो कुछ पलों के लिए ज़रा ठहरिए!
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इस संदर्भ में हम आपके साथ कुछेक दृष्टांत साँझा करना चाहते हैं। ये समस्त घटनाएं सच्ची हैं! किंतु हमारी धारणाओं से हटकर, उनके बिल्कुल विपरीत! ये हम तक आज भी इन्हीं प्रेरणा तरंगों को प्रवाहित कर रही हैं- 'अच्छा

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