फरवरी, 2016- एक युवक कॉलेज में फॉर्म जमा कराकर लौट रहा था... पढ़-लिख कर कुछ बनने के लिए, अपने माँ-बाप का नाम रोशन करने के लिए, दिल में कई अरमान लिए- घर से बस कुछ ही मिनटों की दूरी पर था। लेकिन चंद मिनटों का वह फासला हमेशा-हमेशा के लिए फासला बनकर ही रह गया। क्योंकि सड़क पर खुदे एक गड्ढे ने उसकी मौत का फैसला सुना दिया था। उस युवक की मोटरबाइक गड्ढे में जा गिरी। चोटें इतनी गहरी आईं कि दुर्घटना स्थल पर ही उसने अपना दम तोड़ दिया। आँखों में अथाह पीड़ा लिए, उस युवक के पिता आज भी सबसे यही कहते हैं- 'मेरा बेटा बहुत होशियार और मेहनती था। वह हमारे कुल की शान था, क्योंकि वह हमारे परिवार का पहला सदस्य था जिसने अंग्रेजी मीडियम वाले अच्छे स्कूल से पढ़ाई की थी... ।'
इसी तरह... कर्नाटक की सड़क पर 19 वर्षीय एक युवा पूरे 25 मिनट तक खून से सना पड़ा रहा। कई लोग वहाँ से गुजरे, लेकिन कोई ठहरा नहीं। अफसोस! इतने में उस युवक की ज़िन्दगी ही ठहर गई।
... योर्क अस्पताल में काम करने वाला सैम साइकिल से ड्यूटी पर जा रहा था कि तभी गोल चक्कर पर एक नौजवान कार दौड़ाता हुआ आया... नहीं-नहीं बल्कि कार उड़ाता हुआ आया और सैम को साइकिल समेत उड़ाकर चला गया। 'उसने मुझे ज़रा सा भी रास्ता नहीं दिया! टक्कर खाकर मैं हवा में उछल गया। ओह! मेरी साइकिल का तो जो हुआ सो हुआ, लेकिन मेरा सिर बुरी तरह ज़ख्मी हो गया... हाथों पर इतने मोटे दस्तानों के बावजूद मेरे हाथ की हड्डी टूट गई और वे बुरी तरह छिल गए। मैं दर्द से कराहता रहा, पर किसी ने मुझे नहीं उठाया... हर कोई मुझे देखते हुए, तेज़ी से वहाँ से आगे बढ़ गया। क्या ऐसा होता है मानव समाज?'
ऐसी दर्दनाक दुर्घटनाएँ, पूरी दुनिया में, हर रोज़, बल्कि हर मिनट मौत का तांडव कर रही हैं। कुछ वर्ष पहले के आँकड़ों के अनुसार- अमेरिका की नेशनल हाईवे ट्रैफिक सेफ्टी एडमिनिस्ट्रेशन का कहना है कि अमेरिका में 'हर 10 सैकंड' में एक व्यक्ति सड़क हादसे का शिकार होता है। यदि भारत की बात करें, तो यह दर और स्तर हर वर्ष तेज़ी से बढ़ रहा है।... WHO के अनुसार, हर वर्ष 12 लाख से भी अधिक लोग सड़क हादसों में कुचले जाते हैं और लगभग 5 करोड़ लोग घायल या अपंग हो जाते हैं।
जानकारों का मानना है कि यदि जल्द ही इस समस्या को रोकने के लिए ज़रूरी व ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो सन् 2030 तक सड़क हादसे लोगों की मौत की सातवीं सबसे बड़ी वजह बन जाएँगे! हैरान कर देने वाली बात यह है कि ये सड़क दुर्घटनाएँ इस कदर बढ़ गई हैं कि आज इतनी मौतें आतंकवादी हमलों में नहीं होतीं, जितनी इन हादसों में हो जाती हैं।
यहाँ पर एक यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है- क्यों?
आखिर क्यों ये दर्दनाक हादसे थमने की जगह, दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से अपना विस्तार कर रहे हैं? पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए सितम्बर'17 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।