जहाँ सफाई नहीं, वहाँ खुदाई नहीं!

भारतवासी बनाम विदेशी- क्या लगता है आपको, इतिहास की दृष्टि में कौन ज़्यादा सफाई-परस्त लोगों की श्रेणी में आते होंगे?... आप सोच रहे होंगे, इसमें लगने की क्या बात है... साफ-सफाई के मामले में विदेशियों से भारतवासियों का क्या मुकाबला? शुचिता में हम तो उनके कहीं इर्द-गिर्द भी नहीं ठहरते। वर्तमान हालत देखते हुए, आपकी ऐसी प्रतिक्रिया बिल्कुल सही है।परन्तु वास्तव में आपकी यह सोच, यह धारणा एवं यह उत्तर बिल्कुल गलत है। प्रमाण के तौर पर नीचे लिखे कुछ तथ्यों पर ज़रा एक बार नज़र डालिए-

पुराने ज़माने में यूरोप के सैनिकों का नहाने से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।सन् 1750 में कहीं जाकर यह नियम बना कि कम से कम 8-10 दिनों में उन्हें एक बार तो नहाना ही है। ऐसा भी तब हुआ, जब वे सैनिक न नहाने के कारण आए दिन बीमार पड़ने लगे।

मॉरिस, ज़िम्बाब्वे के एक राजनेता, सन् 1930 में एक बार 'Orange free state' के दौरे पर निकले। अपने लेख में वे इस दौरे के दौरान हुए अनुभव का वर्णन करते हैं। कहते हैं- 'लोगों को देखकर ऐसा लगा मानो साफ-सफाई, नहाना-धोना जैसे शब्द उनके शब्दकोश में ही नहीं थे। पूरी बिल्डिंग में जैसे मक्खियों का सैलाब आया हुआ था। जगह-जगह लोगों के बाल गिरे हुए थे। कोई कहीं भी थूक देता था, कहीं भी नाक की गंदगी निकाल देता था... यहाँ तक कि भोजन करने वाले स्थान के पास भी!'

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स्कॉटिश इतिहासकार एवं लेखक विलियम डेलरिम्पल ने एक किताब लिखी थी- 'व्हाईट मुगलस (White Mughals)'। उसमें वे साफ शब्दों में इस बात का उल्लेख करते हैं- 'अंग्रेजों ने रोज़ाना नहाने के गुण भारत में आकर, भारतवासियों से सीखा। जब नहाने की आदत सीखकर ये अंग्रेज अपने देश लौटे, तो वहाँ पहले तो उनका स्वागत बेहद विचित्र अंदाज में हुआ। उनके लोगों ने उन्हें इस प्रकार देखा, मानो वे किसी अजीबो-गरीब ग्रह से होकर आए हों। पर धीरे-धीरे उन्हें भी साफ-सफाई की अहमियत समझ में आने लगी।'

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करते-करते जल्द ही वह समय आ गया, जब यूरोपवासी, अमेरिकावासी- जिनकी जीवनशैली में नहाने का कोई अस्तित्व नहीं था- उन्होंने स्वच्छता को इस कदर अपनाया कि स्वच्छता एवं शुचिता उनकी पहचान बन गई। यह सूक्ति विश्व भर में प्रचलित हो गई- 'Cleanliness is next to Godliness'। वहीं भारत में, जहाँ इस सूक्ति को और भी गहराई से रखा जाता था, यह कहकर- 'जहाँ सफाई नहीं, वहाँ खुदाई नहीं', वहाँ क्या हुआ?...

...दुनिया भर को स्वच्छता एवं शुचिता का पाठ पढ़ाने वाले भारत की आज क्या दशा हो चुकी है?  स्वच्छता संबंधित, शिक्षाएँ, प्रेरणाएँ व प्रयासों को भी जानने के लिए पढ़िए नवम्बर'17 माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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