मशीनी हुई माँ की गोद!

एक समय था, जब 'माँ' कहते ही बहुत से नाज़ुक अहसास दिल में जाग जाते थे। माँ की गर्म और नर्म गोदी! ममता भरी थपकियाँ! चाँद और तारों की दुनिया से उतरी लोरियाँ! राजकुमार-राजकुमारियों की ढेरों कहानियाँ! फूलोँ सी खिली मुस्कान... ! समरसता और शीतलता का जीवंत भाव थी माँ! 

पर... अब वह बात कहाँ? आधुनिकता के इस दौर में माँ का आँचल भी इलैक्ट्रॉनिक हो चला है।  मशीनीकरण ने माँ की गोद तक को मशीनी बना दिया है। भागम-भाग में 'माँ' या 'मइया' कहीं खो गई है। 'मम्मी' या 'मॉम' नए-नए डिजिटल अवतारों में अपनी ममता जाता रही है।

देखिए... यह है 'वीडियो मॉनीटर। इस उपकरण के कारण माँ को हर समय अपने शिशु के साथ रहने की आवश्यकता नहीं है। हर वक़्त उसके साथ बैठकर उसकी निगरानी करने की भी चिंता नहीं है। क्योंकि यह यंत्र अपने कैमरे के द्वारा आपके बचे पर २४ घंटे नज़र रखता है। आप कहीं पर भी हों, अपने स्मार्टफोन के ज़रिए शिशु को हर समय देख सकती हैं। यही नहीं, उसे लोरियाँ गाकर भी सुला सकती हैं। जो लोरी आप अपने फोन में गाएँगी, वह इस वीडियो मॉनीटर के ज़रिए सीधे आपके शिशु तक पहुँच जाएगी। ... है न कमाल का उपकरण!

अब यह अगला उपकरण देखिए... 'बेबी केयर टाइमर'! ...

यहीं नहीं, यदि आपके पास अपने शिशु की गोद में लेकर, सहला कर, स्तनपान करने तक का भी समय नहीं है, तो इसका भी उपाय है- ... 'ब्रेस्ट बस्तीअर'!...

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इसी तरह की अनेक मशीनें आज मार्केट में धड़ेले से बिक रही हैं। इनकी मदद से मॉडर्न बचे पल रहे हैं। उनकी मॉडर्न मम्मियों को अन्य ज़िम्मेदारियों व मनोरंजनों के लिए समय भी मिल रहा है। जीवन की गाड़ी खूब मज़े से, तेज़ रफ़्तार में दौड़ रही है। माँ बनने पर भी कुछ पीछे छूटे न, खोए न... अब यह दर नहीं।

पर तनिक विचार करें! क्या शिशु-पालन की इन आधुनिक प्रक्रियाओं से सच में कुछ नहीं खोया, कुछ पीछे नहीं छूटा? ...

....क्या भावों के अभाव में एक भावनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण हो सकता है? इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए पढ़िए पूर्णतः दिसम्बर'१७ माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका!

 

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