अपने न बनें कभी बेगाने!

यह ज़िन्दगी क्या है? भावनाओं का ताना-बाना ही तो है। कहीं एक भावना से अंधेरे और आँधियों भरे रास्तों पर उम्मीद की किरण फूट जाती है। कहीं भावना को ठेस पहुँचने पर परिवारन में दरारें पड़ जाती हैं और कुनबे बिखर जाते हैं। तो कहीं भावनाएँ इतनी शक्ति दे देती हैं कि फिर से जीने की चाह स्पंदित हो जाती है। प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत हैं कुछ घटनाएँ। ये सभी दृष्टांत सच्चे हैं... लोगों के जीवन में घटे हैं। इनमें वर्णित आँखों की नमी, दिल का दर्द, अकेलापन, खोकर भी मुस्कुराने की कोशिश- सब कुछ सच्चा है- जिनसे ये लोग होकर गुज़रें हैं, जो कुछ सहा है और जिया हैं। इन घटनाओं को पढ़ते वक्त ज़रा सोचिएगा कि कैसा लगा होगा, जब... ...

... जीवन-साथी जीवन का साथ छोड़ गया!

आर्मी, मिलट्री, ऐयर फोर्स... हालांकि इनमें शामिल होने वालों को अपने मरने की चिंता नहीं होती। पर उनके अपनों को उन्हें खो देने का डर  रहता है। दीपिका की कहानी भी इसी श्रृंखला में शामिल है। दीपिका और रोनाल्ड- दोनों ऐयर फोर्स अकादमी के साथी थे और जीवन के साथी भी। सन 2006 में दोनों परिणय सूत्र में बंधे और सन 2007 में ही यह सूत्र एक दर्दनाक दुर्घटना की बलि चढ़ गया। खुद दीपिका के शब्दों में हमें डर, निराशा, गिरने पर तड़पन-इन सारे पहलुओं की जीवंत झलक मिलती है।

17 जनवरी 2007 को दीपिका ने रोनाल्ड को फोन पर जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। 18 जनवरी को दीपिका की छुट्टी थी। उसने रोनाल्ड को फोन मिलाया... 

बहुत देर तक ट्राई किया। पर कोई जवाब नहीं आया। ऐसे में, वही डर जो इस क्षेत्र में काम करने वालों के परिजनों में हर समय बना रहता है, वह तुरंत बाहर गया। दीपिका के मन में एक अजीब सी बेचैनी छिड़ गई।... डर सही था। रोनाल्ड की कुछ घंटों पहले जैसलमेर में ऐयर क्रैश में मौत हो चुकी थी।

दीपिका एक कहना है- 'ऐयर क्रैश की न्यूज़ के साथ मेरी दुनिया भी क्रैश हो गई। मेरे दिल को इतना गहरा सदमा लगा कि उसे बाद मेरी ज़िन्दगी कभी पहले जैसी नहीं हो पाई।... उस दिन के बाद मैं

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