ठेस पहुंचाने वाले कुछ ठोस प्रश्र-
- क्या आपको साधना में नींद के झटके आते हैं?
- क्या कभी स्थिति इस हद तक भी पहुंच जाती है कि अनुभव की जगह स्वप्न दिखने लगते हैं? अनहद के स्थान पर खर्राटे चलने लगते हैं?
- क्या मन सुमिरन में रमने की बजाय विचारों में गुम हो जाता है?
- साधना करते हुए आप किस आसन में होते हैं- पद्मासन? सुखासन? या फिर अदला-बदली आसन? ( जिसमें टांगें खोलने से लेकर मोड़ने, सहारा लेने, लुढ़कने, लेटने तक के कई तरीके शामिल होते हैं?)*
*( वृद्ध एवं रोग-ग्रस्त साधकों पर लागू नहीं।)
संभवतः इन प्रर्शनों ने हमारी दुखती नफरत को छुआ होगा। हमें कहीं न कहीं ग्लानि का अहसास भी कराया होगा। साथ ही अंतर्मन से हमारी व्यथा को बताता एक स्वर भी उभरा होगा- 'क्या करें? बहुत कोशिश करते हैं, फिर भी ऐसा हो जाता है।'
जानते हैं, क्यों ऐसा होता है? क्योंकि हम समस्याओं के समाधान से अनजान हैं। ज़रा गौर कीजिए, इन सभी समस्याओं के मूल में है- हमारी 'तन की अस्थिरता'और 'मन की चंचलता'। इन दोनों ही बातों का सीधा व गहरा सम्बन्ध हमारे भोजन से है। जी हां, हमारी आहार प्रणाली से! हम कब, क्या और कितना खाते हैं- इस पर बहुत हद तक निर्भर करती है हमारी साधना! हमारी स्थिरता! हमारी एकाग्रता! इस विषय को समझने के लिए, सबसे पहले नीचे लिखे फार्मूले को लगाकर अपनी 'फिटनेस' या 'स्वास्थ्य का स्तर' मापिए।
BMI (शरीर द्रव्यमान सूचकांक)= वज़न/(लम्बाई)२ (वज़न कि.ग्राम में और लंबाई मीटर में)
जांचिए आप किस श्रेणी में आते हैं-
कम वज़न...
सामान्य वज़न...
सामान्य से अधिक वज़न...
मोटापा...
अनुसंधान बताते हैं कि आज ज़्यादातर लोग 'सामान्य श्रेणी' से बाहर पाए जाते हैं। हो सकता है कि आप भी उन्हीं में से एक हों! यह इंडेक्स हमारे शरीर के भार का अनुमान लगाता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमारी भोजन शैली कितनी दुरुस्त है या कितनी पस्त- यह दर्शाता है।
बंधुओं, वास्तव में इस वज़न की गड़बड़ी हमारी साधना की मात्रा एवं गुणवत्ता की भी परिचायक है। ...
पद्मासन बनाम भोजन!...
साधना में नींद आना बनाम भोजन!...
साधना में विचार आना बनाम भोजन!... कैसे?
पूर्णत: जानने के लिए पढ़िए जुलाई' 2018माह की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।