गुरुदेव का गणपति कैसे बना जाता है?

जब ईश्वर-दर्शन की प्यास बर्दाश्त के बाहर चली जाए... जब दर्शन पाकर, प्यास बुझने की जगह और तीव्र हो जाए... जब हृदय गुरु-महिमा से इतना भर जाए कि गुरु भगवान से भी बढ़कर नज़र आएँ... जब कंठ मुक्त स्वर से गुरुदेव की अविरल वंदना कर उठे... जब गुरु-सेवा जीवन का एकमात्र उद्देश्य बन जाए... जब गुरु के लिए इतना जी-भर कर जिया जाए कि मृत्यु होने पर अनासक्त गुरु भी विचलित हो उठें... तब? तब कहीं जाकर बनता है, एक गणपति शास्त्री!


रमण महर्षि के इस एक शिष्य ने भक्ति की दुनिया में अनेक प्रेरणाओं की खुशबू बिखेरी है। शिष्यत्व की राह पर कदम रखने से लेकर मंज़िल को मिलने तक - गणपति की दीवानगी की हदों को जी भरकर तोड़ा है। अपने महर्षि की भक्ति का छक-छक कर आनंद लिया है।
गुरु-भक्तों, क्यों न हम भी इन हदों को तोड़ना सीख जाएँ? पर इसके लिए तो गणपति बनना सीखना होगा। तो चलिए, आज जानते हैं कि अपने आराध्य गुरुदेव का गणपति कैसे बना जाता है? गणपति बनने के मुख्यतः सात सोपान हैं। जब हम एक के बाद एक पड़ाव तय करते जाते हैं, तो अंततः गुरु हमारे और हम गुरु के बन पाते हैं।


पहला सोपान- जब ईश्वर-दर्शन बिन निकलें प्राण !


यूँ तो गणपति के पास भगवान का दिया सबकुछ था।लेकिन बस भगवान नहीं था। गणपति ने खूब विद्वता हासिल की। बुद्धि में शास्त्र-ज्ञान का भरपूर भंडार संचित कर लिया। परन्तु हृदय में फिर भी कोरा खालीपन रहा। ज्ञान के बाद मान-सम्मान से अंदर की कसक को शांत करने की कोशिश शुरू हुई। गणपति ने अपने ज्ञान-कोश से समाज में अनेकानेक रत्न बिखेरे। बहुत से विद्यार्थियों को शिक्षित कर नाम कमाया। पर अफसोस! भीतर की छटपटाहट को खत्म करने में वह भी काम न आया।


गणपति की हालत दिन-पर-दिन बिगड़ती चली गई- किंतु सिर्फ दुनिया की नज़रों में! क्योंकि ईश्वरीय साम्राज्य में तो इसे संवरना कहते हैं। जब इतना सब कुछ करने और पाने के बाद भी मन शांत न हुआ, तब गणपति ने शिक्षक पद से त्यागपत्र दे दिया। वैसे तो गणपति को 'काव्यकंठ' कहा जाता था। कारण की उसके कंठ में काव्य बसता था। उत्तम काव्य के झरने उसके मुख से धाराप्रवाह बहते थे। परंतु फिर भी उसका अंतःकरण शुष्क और मुर्झाया-सा रहता था। गणपति ने मंत्र, जप, तप- सबका आश्रय लेकर देख लिया। किन्तु किसी ने भी उसे चैन न दिया। इस तरह आंतरिक खालीपन प्रगाढ़ होता गया। भीतर व्याकुलता ने घमासान संग्राम छेड़ दिया। ओह! गणपति की स्थिति बिन पानी के तड़पती मीन की भाँति हो गई। अपने अस्तित्व के वास्तविक अर्थ की खोज में वह दिन-रात बदहवास हालत में भटकता रहा। रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता के ये कुछ शब्द गणपति की छटपटाहट को हू-ब-हू बयान करते हैं-


बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली (बेचैनी) है,


कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है।


तुम वेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ,


ध्रुव की कठिन घड़ी में पहचान माँगता हूँ।


...
जब हर प्रयास विफल हो गया, तब गणपति कराह उठा। उन पलों में उसके अंतर्मन से दिव्य प्रेरणा का स्वर फूटा- 'पहाड़ी वाले बाबा की शरण में जा।' गणपति की स्मृतियों में अचानक जैसे एक दस्तक हुई। कभी किसी ने उसे महर्षि रमण के विषय में बताया था। आज उसके भीतर से जब यह आवाज़ आई, वह एकदम उठ खड़ा हुआ। तपती दोपहरी में पहाड़ी की चढ़ाई करनी आरम्भ कर दी। पसीने से तरबतर... साँसें उखड़ी हुई... भीतर एक आतुरता कि शायद अब अंतस् की तड़प से राहत मिल जाए। शायद अपनी सच्ची पहचान मिल जाए। शायद जन्मों से खोया भगवान मिल जाए।!


हाँफता-हाँफता गणपति महर्षि रमण जी के द्वार पहुँचा। जैसे ही महर्षि को समक्ष देखा, तो स्वयं को रोक नहीं पाया। दंडवत लेट गया। मस्तक धरती पर और हाथ कसकर महर्षि के चरणों को थामे हुए। आज उसके काव्यकंठ से काव्य नहीं फूटा, बल्कि नेत्रों से जलधारा फूट पड़ी। गणपति खूब रोया। दिल खोलकर ज़ोर-ज़ोर से रोया। मानो इतने समय तक सहा सारा दर्द महर्षि रमण के आगे कह देना चाहता हो। किन्तु महर्षि कुछ नहीं बोले। मौन रहे। केवल अपनी स्नेहिल दृष्टि से गणपति को अपलक निहारते रहे। जैसे वे भी उसे उसकी सारी पीड़ा से निवृत्त कर देना चाहते हों। लगभग पंद्रह मिनटों तक यह अनूठी वार्ता चलती रही। आँसुओं की बोली से अपनी असहनीय स्थिति कह देने के बाद, गणपति ने शब्दों का सहारा लिया। लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी बस इतना ही क  पाया- 'जितने शास्त्र थे, सब पढ़ डाले। जितने मंत्र थे, सब जप डाले। फिर भी मेरा मन बेचैन है स्वामी! मेरी अंतरात्मा ईश्वर को पाने के लिए पल-पल तड़पती है। कृपया मेरी सहायता करें। मैं स्वयं को पहचानना चाहता हूँ। मैं सुकून से जीना चाहता हूँ।' इतना कहते-कहते उसका गला फिर भर आया। वह निष्प्राण-सा महर्षि के चरणों में लुढ़क गया।


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क्या है इसके बाकी के छह सोपान... पूर्णतः जानने के लिए पढ़िए सितंबर 2018  माह  की हिन्दी अखण्ड ज्ञान मासिक पत्रिका।

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